Fri Sep 11, 2026 | 09:50 PM IST

डायबिटीज

डायबिटीज एक गंभीर और क्रोनिक बीमारी है, जिसमें पैंक्रियाज पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या शरीर अपने बनाए गए इंसुलिन का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो ब्लड में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है। डायबिटीज के कारणों और इसके लक्षणों को जानना बहुत जरूरी है। इस बारे में दिल्ली स्थित PSRI Hospital में Senior Consultant, Endocrinology and Diabetology Dr. Himika Chawla से बात की। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक ब्लड शुगर कंट्रोल न रहने पर इसका असर आंखों, किडनी, नसों, हार्ट और पैर समेत शरीर के कई अंगों पर पड़ सकता है।

डायबिटीज के मामले

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, डायबिटीज से पीड़ित मरीजों की संख्या 1990 में 20 करोड़ से बढ़कर साल 2022 में 83 करोड़ हो गई है। साल 2022 में डायबिटीज से पीड़ित आधे से ज्यादा लोगों ने बीमारी के लिए कोई दवा नहीं ली। साल 2021 में डायबिटीज के कारण किडनी की बीमारी से 20 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। इसके अलावा, हार्ट से जुड़ी बीमारियों से होने वाली मृत्यु में लगभग 11% मौत हाई ग्लूकोज स्तर (हाइपरग्लाइसीमिया) के कारण हुईं।

डायबिटीज के लक्षण

Dr. Himika Chawla कहती हैं, “डायबिटीज को आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है कि हम जो खाना खाते हैं, उससे शरीर को ग्लूकोज मिलता है, जिसका इस्तेमाल शरीर एनर्जी के लिए करता है। ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने और उसका इस्तेमाल करने के लिए इंसुलिन की जरूरत होती है। इंसुलिन अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज से बनने वाला हार्मोन है। जब शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता या शरीर उसका सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो ग्लूकोज खून में जमा होने लगता है। इस कंडीशन को हाइपरग्लाइसीमिया कहते हैं।”

National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases (NIH) के अनुसार, डायबिटीज के कुछ आम लक्षणों की पहचान करना जरूरी है, ताकि समय रहते इसका इलाज शुरू किया जा सके।

  • बार-बार पेशाब आना
  • बहुत ज्यादा प्यास लगना
  • बहुत ज्यादा भूख लगना
  • धुंधला दिखाई देना
  • बहुत ज्यादा थकान महसूस होना
  • जख्म का जल्दी न भरना
  • बार-बार इंफेक्शन होना
  • हाथों या पैरों में दर्द होना
  • सुन्नता या झुनझुनी जैसा महसूस होना
  • सेक्शुअल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं

डायबिटीज कितने प्रकार की होती है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, डायबिटीज के कई प्रकार हैं, लेकिन मुख्यतः तीन तरह की होती है।

Dr. Himika Chawla का भी मानना है कि आमतौर पर लोगों में डायबिटीज के ये तीन प्रकार ज्यादा देखने को मिलते हैं।

टाइप 1 डायबिटीज

यह ऑटोइम्यून कंडीशन है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियाज की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला कर देता है, जिससे शरीर में इंसुलिन बनना बहुत कम या बंद हो सकता है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है।

टाइप 2 डायबिटीज

इस कंडीशन में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता और धीरे-धीरे पर्याप्त इंसुलिन बनाना बंद कर देता है। डायबिटीज से पीड़ित 95% से ज्यादा लोगों को टाइप 2 डायबिटीज होती है। इसके कारणों में जेनेटिक फैक्टर्स, फैमिली हिस्ट्री, बढ़ती उम्र और अनहेल्दी लाइफस्टाइल शामिल हो सकते हैं।

जेस्टेशनल डायबिटीज

प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली डायबिटीज को जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। इसमें ब्लड में ग्लूकोज का स्तर सामान्य से ज्यादा हो सकता है, लेकिन यह इतना ज्यादा नहीं होता कि इसे सामान्य डायबिटीज माना जाए। जिन महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज होता है, उनके बच्चों को आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज होने का रिस्क हो सकता है।

प्री-डायबिटीज क्या है?

Dr. Himika Chawla का कहना है, “प्री-डायबिटीज ऐसी स्थिति है, जिसमें ब्लड शुगर सामान्य से ज्यादा होती है, लेकिन डायबिटीज की रेंज तक नहीं पहुंची होती। ऐसे में प्री-डायबिटीज के लक्षणों पर नजर रखना जरूरी है। हालांकि, इस मामले में लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव करके टाइप 2 डायबिटीज को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसलिए अगर किसी को डायबिटीज का रिस्क है या ब्लड शुगर बढ़ा हुआ है, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।”

सामान्य ब्लड शुगर, प्री-डायबिटीज और डायबिटीज की रेंज क्या है?

Cleveland Clinic के अनुसार, डायबिटीज के टेस्ट के लिए अलग-अलग तरह की जांच की जाती है, ताकि प्री-डायबिटीज या डायबिटीज का पता किया जा सके। आमतौर पर इसके लिए ब्लड शुगर की रेंज चेक की जाती है।

टेस्ट 

सामान्य स्तर

प्री-डायबिटीज

डायबिटीज

फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज टेस्ट

100 mg/dL से कम

100 से 125 mg/dL

126 mg/dL या अधिक

रैंडम ब्लड ग्लूकोज टेस्ट 

NA

NA

200 mg/dL या अधिक 

HbA1c टेस्ट 

5.7% से कम

5.7% से 6.4%

6.5% या अधिक

डायबिटीज होने के कारण

Dr. Himika Chawla कहती हैं कि टाइप 1 डायबिटीज तो ऑटोइम्यून समस्या है, लेकिन टाइप 2 डायबिटीज होने के कई कारण हो सकते हैं। हालांकि, इनमें से किसी एक कारण को अकेले डायबिटीज होने की वजह नहीं माना जा सकता। इसलिए डायबिटीज कई कारणों के चलते हो सकती है, इसलिए इन रिस्क फैक्टर्स पर ध्यान देना जरूरी है।

  • परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री होना
  • ज्यादा वजन या मोटापा
  • फिजिकल एक्टिविटी न करना
  • अनहेल्दी डाइट होना
  • हाई ब्लड प्रेशर
  • महिलाओं में PMOS जैसी कुछ कंडीशन होना
  • प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज की हिस्ट्री
  • बढ़ती उम्र

डायबिटीज का शरीर के विभिन्न अंगों पर असर

Dr. Himika Chawla का कहना है, “जिन लोगों को लंबे समय तक डायबिटीज रहती है या फिर ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं रहता, उनके शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंच सकता है। ब्लड शुगर का लंबे समय तक बढ़ा हुआ स्तर डायबिटीज ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, डायबिटीज का असर शरीर के अंगों पर तुरंत नहीं दिखता, इसलिए मरीज कई बार ब्लड शुगर पर ध्यान नहीं देते।”

डायबिटीज का हार्ट पर असर

NIDDK के मुताबिक, डायबिटीज, हार्ट से जुड़ी बीमारियां और स्ट्रोक का आपस में गहरा कनेक्शन है। ब्लड में ग्लूकोज का हाई लेवल समय के साथ ब्लड वेसल्स और हार्ट व उसकी धमनियों को नियंत्रित करने वाली नर्व्स को नुकसान पहुंचा सकता है। डायबिटीज के मरीजों को हार्ट से जुड़ी बीमारियां होने की संभावना ज्यादा होती है। डायबिटीज से पीड़ित वयस्कों में सामान्य लोगों के मुकाबले हार्ट से जुड़ी बीमारियां या स्ट्रोक होने का खतरा लगभग दोगुना होता है।

डायबिटीज का किडनी पर असर

Dr. Himika Chawla ने बताया कि डायबिटीज में ब्लड शुगर का बढ़ा हुआ स्तर किडनी की बहुत ही छोटी ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचा सकता है। जब ये ब्लड वेसल्स क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो वे सही तरीके से काम नहीं कर पाती हैं। कई मरीजों को हाई ब्लड प्रेशर भी हो सकता है, जो किडनी को अतिरिक्त नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, इसके शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इसलिए डॉक्टर डायबिटीज के मरीजों को किडनी की रेगुलर जांच कराने की सलाह देते हैं।

डायबिटीज का आंखों पर असर

NIDDK के अनुसार, ब्लड शुगर का लगातार बढ़ा हुआ स्तर आंखों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। शुरुआती दौर में हाई ब्लड शुगर के कारण आंखों को ज्यादा परेशानी नहीं होती, लेकिन अगर ब्लड शुगर कंट्रोल में नहीं रहता, तो बढ़ा हुआ शुगर आंखों के टिश्यू को नुकसान पहुंचाने लगता है। इससे कई बार मरीजों को धुंधलेपन की समस्या आ सकती है। नजर आ सकता है।

अगर लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ा हुआ हो, तो यहआंखों के पिछले हिस्से में मौजूद ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे आंखों की क्षतिग्रस्त वाहिकाओं से तरल पदार्थ का रिसाव होने लगता है और सूजन आ जाती है।

डायबिटीज का पैरों पर असर

Dr. Himika Chawla का कहना है, “पैरों में नर्व डैमेज और ब्लड फ्लो की समस्या के कारण छोटी सी चोट भी गंभीर हो सकती है। डायबिटीज के कुछ मरीजों में फुट अल्सर का रिस्क भी बढ़ सकता है। इसलिए डायबिटीज के मरीजों को रोज अपने पैरों की त्वचा, उंगलियों और तलवों पर नजर रखनी चाहिए। अगर कुछ भी बदलाव दिखाई देता है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।”

डायबिटीज का सेक्शुअल हेल्थ पर असर

NIDDK के अनुसार, डायबिटीज महिलाओं और पुरुषों दोनों की सेक्शुअल हेल्थ को प्रभावित कर सकता है।

प्रभावित अंग 

पुरुषों में असर 

महिलाओं में असर

सेक्शुअल हेल्थ 

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन 
वीर्य का मूत्राशय में जाना
लिंग का टेढ़ापन और दर्द

योनि में सूखापन
संबंध बनाते समय दर्द होना
सेक्शुअल इंटिमेसी की कमी

फर्टिलिटी

स्पर्म की क्वालिटी और गतिशीलता में कमी
टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर गिरना

PMOS
बांझपन का खतरा
जेस्टेशनल डायबिटीज 

इंफेक्शन 

मूत्राशय
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) का रिस्क 

बार-बार यीस्ट या फंगल इंफेक्शन
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) का बहुत ज्यादा खतरा

हार्ट हेल्थ

कम उम्र में हार्ट अटैक होना
स्ट्रोक का खतरा

पुरुषों की तुलना में हार्ट की बीमारी से मृत्यु का रिस्क ज्यादा
मेनोपॉज के बाद हार्ट अटैक की संभावना कई गुना बढ़ना

शरीर पर असर 

मांसपेशियों में कमजोरी
पेट के निचले हिस्से में चर्बी जमा होना

डिप्रेशन
एंग्जायटी के मामले पुरुषों से अधिक होना

बच्चों में डायबिटीज होना

Mayo Clinic के मुताबिक, बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज होने का कारण जेनेटिक या वायरल इंफेक्शन हो सकता है। ज्यादातर मामलों में इसका सटीक कारण अभी पता नहीं चलता। इसमें बच्चे के शरीर में इंसुलिन हार्मोन बनना बंद हो सकता है। बिना इंसुलिन शरीर सही तरीके से काम नहीं कर पाता, इसलिए बच्चे को इंजेक्शन या पंप के जरिए इंसुलिन दी जाती है।

Dr. Himika Chawla कहती हैं, "कुछ बच्चों को टाइप 2 डायबिटीज भी हो सकती है। जिन बच्चों में छोटी उम्र से ही अनहेल्दी डाइट, फिजिकल एक्टिविटी की कमी या मोटापा होता है, उनमें टाइप 2 डायबिटीज का रिस्क बढ़ सकता है। अगर बच्चे में बहुत ज्यादा प्यास, बार-बार पेशाब, अचानक वजन कम होना या असामान्य थकान जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।"

डायबिटीज की जांच कैसे होती है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और Dr. Himika Chawla के अनुसार, डायबिटीज की पुष्टि ब्लड टेस्ट से की जाती है। डॉक्टर व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग-अलग टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।

  • फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज (FPG) - रातभर यानी करीब 8 से 10 घंटे फास्टिंग के बाद सुबह सबसे पहले ब्लड शुगर टेस्ट किया जाता है।
  • ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) - इसमें खाली पेट और फिर ग्लूकोज ड्रिंक पीने के निश्चित समय बाद ब्लड शुगर मापा जाता है, ताकि यह देखा जा सके कि शरीर शुगर को कैसे प्रोसेस करता है।
  • HbA1c (एचबीए1सी) - यह टेस्ट पिछले 2 से 3 महीनों के दौरान औसत ब्लड शुगर स्तर को दर्शाता है।
  • रैंडम प्लाज्मा ग्लूकोज - यह टेस्ट दिन में किसी भी समय किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल हाइपरग्लाइसीमिया (हाई ब्लड शुगर) के स्पष्ट लक्षणों वाले लोगों में डायबिटीज की पुष्टि के लिए किया जाता है।

डायबिटीज को मैनेज करने के तरीके

Dr. Himika Chawla का कहना है, “कई बार डायबिटीज के मरीज आकर बताते हैं कि कोई हर्बल प्रोडक्ट या सप्लीमेंट दावा करते हैं कि उसे लेने से डायबिटीज हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। ये दावे कई विज्ञापनों में किए जाते हैं, लेकिन मैं कहना चाहूंगी कि डायबिटीज को मैनेज किया जा सकता है, लेकिन इसे किसी भी दवा या सप्लीमेंट से हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता है। इसलिए डायबिटीज को मैनेज करने के लिए डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव करना जरूरी है।”

बैलेंस्ड डाइट

मरीजों को अपनी डाइट में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर फूड्स को शामिल करना चाहिए। मीठे और सोडा ड्रिंक्स, शुगर और प्रोसेस्ड फूड्स को सीमित करना फायदेमंद है। इसके अलावा, मरीजों को डॉक्टर की सलाह पर मौसमी फल जरूर अपनी डाइट में शामिल करने चाहिए। डायबिटीज के मरीजों को नाश्ते में अपने खाने का ध्यान रखना चाहिए।

एक्सरसाइज

नियमित एक्टिविटी जैसे वॉकिंग, साइकिलिंग, स्विमिंग या अन्य एक्सरसाइज को रूटीन में शामिल करना चाहिए। अगर कोई डायबिटीज का मरीज हैवी एक्सरसाइज करना चाहता है, तो पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें। इसके अलावा, अगर मरीज इंसुलिन या ऐसी कोई दवा ले रहा है, जिससे ब्लड शुगर कम होने का रिस्क है, तो एक्सरसाइज रूटीन डॉक्टर से पूछकर तय करना चाहिए।

दवा

डायबिटीज के मरीजों को इंसुलिन की दवा को सही समय पर और सही डोज लेना जरूरी है। मरीजों को खुद से डोज या उसे लेने के समय में बदलाव नहीं करना चाहिए। बिना डॉक्टर की सलाह लिए किसी भी तरह की दवा में बदलाव नहीं करना चाहिए। अगर डॉक्टर ने दवा में बदलाव किया है और इससे मरीज को परेशानी हो रही है, तो दवा बंद नहीं करनी चाहिए और डॉक्टर को साइड इफेक्ट्स के बारे में बताना चाहिए।

शराब और स्मोक से दूरी

डायबिटीज के मरीजों को शराब और सिगरेट से बिल्कुल दूरी बना लेनी चाहिए। इससे ब्लड शुगर को कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है। जो लोग लंबे समय तक स्मोक या ड्रिंक करते हैं, उनमें दवाओं का असर भी कम हो सकता है।

ब्लड शुगर का रेगुलर चेकअप

मरीज घर पर ही ग्लूकोमीटर किट के जरिए अपना ब्लड शुगर चेक कर सकते हैं। अगर ब्लड शुगर में लगातार बदलाव दिखता है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ब्लड टेस्ट कराएं। रेगुलर ब्लड शुगर चेक करने से उसमें होने वाले बदलावों की जानकारी बेहतर तरीके से मिलती है।

रेगुलर बॉडी चेकअप

डायबिटीज के मरीजों को हार्ट, किडनी, पैरों और आंखों का रेगुलर चेकअप कराते रहना चाहिए। इसके लिए डॉक्टर की सलाह जरूर लें और अगर शरीर में कोई बदलाव नजर आता है, तो तुरंत डॉक्टर को बताएं। कई बार लोग छोटे-छोटे बदलावों को इग्नोर कर देते हैं, लेकिन डायबिटीज के मामले में ऐसा करना रिस्की हो सकता है।

डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

Dr. Himika Chawla कहती हैं कि अगर किसी मरीज को ये लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।

  • लगातार बहुत ज्यादा प्यास लगना
  • बार-बार पेशाब आना
  • बिना वजह वजन कम होना
  • लगातार थकान होना
  • धुंधला दिखाई देना
  • पैरों में घाव होना

निष्कर्ष
डायबिटीज मेटाबोलिक से जुड़ी बीमारी है, जिसमें शरीर ब्लड ग्लूकोज और इंसुलिन हार्मोन को नियंत्रित नहीं कर पाता। अगर डायबिटीज के लक्षणों की समय पर पहचान करके जांच कराई जाए और दवा ली जाए, तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है। इसके साथ मरीजों को डाइट और लाइफस्टाइल पर भी ध्यान देना जरूरी होता है। इसके अलावा, यह समझना भी जरूरी है कि डायबिटीज को मैनेज करना हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। इसलिए इंटरनेट या किसी की डाइट या लाइफस्टाइल को फॉलो करने के बजाय डॉक्टर की सलाह लें।

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