किडनी के रोग - Kidney Diseases in Hindi

किडनी या गुर्दे हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग हैं क्योंकि हमें जीवित रखने के लिए शरीर में होने वाले सैकड़ों फंक्शन किडनी के माध्यम से होते हैं। किडनियां हमारी पसलियों के नीचे स्थित होती हैं। आमतौर पर किडनी का काम हमारे खून में मौजूद गंदगी, अतिरिक्त पानी और शरीर के लिए हानिकारक तत्वों को छानकर अलग करना है। ये सभी हानिकारक तत्व हमारे ब्लैडर में इकट्ठा होते हैं और फिर पेशाब के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं। इसके अलावा किडनी हमारे शरीर में सोडियम, पोटैशियम और पीएच लेवल को भी संतुलित करती है। ये ऐसे हार्मोन्स का निर्माण करती हैं, जो हमारे ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करते हैं और रेड ब्लड (लाल रक्त कणिकाएं) सेल्स के उत्पादन में मदद करते हैं। इसके साथ ही किडनियां हमारे शरीर में विटामिन डी को एक्टिवेट करती हैं, ताकि हमारी हड्डियां कैल्शियम को एब्जॉर्ब (अवशोषित) कर सकें।

आजकल गलत खान-पान के कारण किडनी रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। किडनी की बीमारियां तब होती हैं, जब किडनी डैमेज हो जाती है या इसे फंक्शन करने में कोई परेशानी आती है। आमतौर पर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य किसी लंबी बीमारी के कारण ही किडनियां डैमेज होती हैं। किडनी का रोग होने पर इसका प्रभाव मरीज के दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है जैसे- नर्व डैमेज, हड्डियों की कमजोरी, कुपोषण आदि समस्याएं हो सकती हैं। किडनी की बीमारियों का अगर सही समय पर इलाज न किया जाए, तो किडनी पूरी तरह डैमेज हो जाती हैं और काम करना बंद कर देती हैं। ऐसी स्थिति में डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

एक्यूट किडनी समस्याएं

एक्यूट किडनी समस्याएं किडनी में अचानक होने वाली समस्याएं हैं। जैसे- किसी दवा, इंफेक्शन या रेडियोएक्टिव डाई के कारण किडनी की किसी टिशू (ऊतक) में कोई समस्या आ जाना, किसी कारण से पेशाब बाहर न निकल पाने पर किडनी का प्रभावित होना आदि। कुछ लोगों में ऐसी समस्या थोड़े दवा-इलाज के बाद ठीक हो जाती है, वहीं कुछ लोगों में लंबे समस्या तक रहने पर ये समस्या क्रॉनिक किडनी रोग का रूप ले लेती है। ये समस्याएं ज्यादातर मामलों में गंभीर नहीं होती हैं और इलाज के बाद किडनियां ठीक से अपना काम करने लगती हैं।

क्रॉनिक किडनी रोग

किडनी की सबसे ज्यादा आम बीमारी क्रॉनिक किडनी रोग है, जो लंबे समय तक रहती है और आसानी से ठीक नहीं होती है। आमतौर पर ये रोग हाई ब्लड प्रेशर के कारण होता है। ब्लड प्रेसर के कारण किडनी में मौजूद रक्त को छानने वाली महीन कोशिकाओं पर दबाव पड़ता है, जिसके कारण किडनी को फंक्शन करने में परेशानी आती है। जब किसी व्यक्ति की एक या दोनों किडनियां काम करना बंद कर देती हैं, तो उसे डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा किडनी ट्रांसप्लांट भी इस समस्या का हल है।
डायबिटीज भी क्रॉनिक किडनी डिजीज का एक प्रमुख कारण है। डायबिटीज में ब्लड में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। ब्लड शुगर बढ़ जाने के कारण किडनियां की रक्त वाहिकाएं डैमेज हो जाती हैं और किडनी काम करना बंद कर देती हैं। आमतौर पर किडनी फेल्योर तब होता है जब शरीर में टॉक्सिन्स की मात्रा बहुत ज्यादा हो जाती है।

किडनी की पथरी

किडनी की पथरी भी किडनी की एक गंभीर और आम समस्या है। यूं तो इसके कई कारण होते हैं, लेकिन पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना और खान-पान की गलत आदतें व अनियमित जीवनशैली इसके प्रमुख कारण हैं। अधिकतर मामलों में पथरी का कारण किडनी में कुछ खास तरह के साल्ट्स का जमा हो जाना होता है। पहले स्टोन का छोटा खंड (निडस) बनता है, इसके जिसके चारों तरफ सॉल्ट जमा हो जाता रहता है। जेनेटिक कारण, हाइपरटेंशन, मोटापा, मधुमेह और आंतों से जुड़ी कोई अन्य समस्या होना भी पथरी का का वजह बन सकते हैं।

पॉलीसिस्टिक किडनी रोग

पॉलीसिस्टिक किडनी रोग भी किडनी से जुड़ी एक गंभीर समस्या है। इस रोग में एक किडनी या दोनों किडनियों में बड़ी संख्या में सिस्ट( पानी से भरे बुलबुले) बन जाते हैं। समय के साथ ये सिस्ट बढ़ते जाते हैं, जिससे किडनी का आकार बढ़ता जाता है और उसे काम करने में परेशानी आती है। कई बार ये रोग हाई ब्लड प्रेशर का भी कारण बन सकता है। पॉलीसिस्टिक किडनी रोग के कारण मरीज को क्रॉनिक किडनी फेल्योर भी हो सकता है। यह एक अनुवांशिक रोग है इसलिए मां-बाप से भी बच्चे में ये रोग आ सकता है।

नेफ्रॉटिक सिंड्रोम

नेफ्रॉटिक सिंड्रोम अन्य उम्र की तुलना में बच्चों में अधिक पाया जाता है। आमतौर पर इस सिंड्रोम के कारण शरीर में बार-बार सूजन आती है। इस रोग में पेशाब में प्रोटीन का जाना, खून परीक्षण की रिपोर्ट में प्रोटीन का कम होना और कोलेस्ट्रोल का बढ़ जाना होता है। इस बीमारी में खून का दबाव नहीं बढ़ता है और किडनी खराब होने की संभावना बिलकुल कम होती है।

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई)

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन या यूटीआई पेशाब की नली से जुड़ी समस्या है मगर इसके कारण किडनियां भी प्रभावित होती हैं। इस रोग में मूत्रमार्ग में संक्रमण हो जाता है, जिसके कारण पेशाब करते समय जलन या दर्द की समस्या शुरू हो जाती है। कई बार पेशाब के मवाद भी आने लगता है। बच्चों में यूटीआई बहुत खतरनाक हो सकता है और कई बार किडनियों को पूरी तरह खराब कर सकता है।

 

एक्यूट किडनी रोग के लक्षण

  • शरीर के अंगों में सूजन
  • पेशाब करते समय जलन और दर्द
  • पेट या पीठ में दर्द होना
  • पेशाब रुक-रुक कर आना या कम आना
  • भूख न लगना

क्रॉनिक किडनी रोग के लक्षण

  • पैरों, चेहरे और आंखों के चारों तरफ सूजन आना (यह सुबह में ज्यादा दिखाई देती है)।
  • भूख कम लगना, मितली व उल्टी आना, कमजोरी लगना, थकान होना एवं शरीर में रक्‍त की कमी।
  • कम उम्र में उच्च रक्‍तचाप होना या अनियंत्रित उच्च रक्‍तचाप होना।
  • सामान्य से कम पेशाब आना।
  • ऊतकों में तरल पदार्थ रुकने से सूजन आना।
  • ज्‍यादा थका हुआ महसूस करना या अधिक नींद आना।
  • भूख न लगना, वजन कम होना और सोने में परेशानी होना।
  • सिर दर्द या किसी चीज के बारे में सोचने में परेशानी होना।
  • कमर में पसलियों के नीचे के हिस्से में दर्द होना।

 किडनी की पथरी के लक्षण

  • पीठ या पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द होता है, जो कुछ मिनटो या घंटो तक बना रह सकता है।
  • दर्द के साथ जी मिचलाने तथा उल्टी की शिकायत भी हो सकती है।
  • बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, पेशाब आने के साथ-साथ दर्द होना आदि
  • मूत्र के साथ रक्त आना
  • पेशाब करते समय दर्द होना

पॉलीसिस्टिक किडनी रोग के लक्षण

पॉलीसिस्टिक किडनी रोग में सामान्यतः 30 से 40 वर्ष की उम्र तक लक्षण नहीं नजर आते हैं। इसके बाद ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

  • ब्लड प्रेशर बढ़ जाना
  • पेट में दर्द होना,
  • पेट में गांठ का होना या पेट का बढ़ना।
  • पेशाब के साथ खून आना
  • पेशाब की नली में बार-बार संक्रमण होना (यूटीआई)।
  • किडनी में पथरी हो जाना
  • किडनी में सिस्ट हो जाना
  • मस्तिष्क, लिवर, आंत आदि में भी किडनी की तरह सिस्ट हो सकते हैं।
  • सिरदर्द की समस्या

नेफ्रॉटिक सिंड्रोम के लक्षण

  • शरीर में बार-बार सूजन का आना
  • पेशाब के साथ प्रोटीन का बह जाना
  • कोलेस्ट्रोल का बढ़ जाना

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का लक्षण

  • पेशाब के दौरान दर्द होना।
  • वजाइना या पीनस में हर समय दर्द या जलन होना।
  • यूरिन पास करने के दौरान अधिक समय लगना।
  • सेक्स के दौरान अधिक दर्द होना।
  • बार-बार पेशाब आना।
  • मूत्र से दुर्गंध आना।
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द होना।
  • हल्का बुखार होना।
  • कभी-कभी मूत्र के साथ खून भी आना।

 

किडनी की सामान्य समस्या को चिकित्सक लक्षण के आधार पर पहचानकर दवा दे सकते हैं जबकि कुछ गंभीर किडनी रोगों में लक्षणों के आधार पर डॉक्टर कई तरह के टेस्ट करते हैं, जिनसे बीमारी की सही जानकारी हो सके।

ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (GFR)

इस टेस्ट के द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि आपकी किडनी कितना और कैसे काम कर रही है। किडनी में होने वाले अलग-अलग रोग किस स्टेज तक किडनी को नुकसान पहुंचा चुके हैं, इस बात का पता इस जांच से लगाया जा सकता है।

अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन

अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन द्वारा किडनी या पेशाब की नली की जांच की जाती है। इन दोनों टेस्ट में अंदरूनी अंग की तस्वीर देखकर रोग का पता लगाया जाता है। इन जांचों के द्वारा किडनी का आकार या उसके आकार में परिवर्तन का भी पता लगाया जाता है। इसके अलावा किडनी में सिस्ट या ट्यूमर की पहचान भी इन जांचों के द्वारा आसानी से की जा सकती है।

किडनी बायोप्सी

किडनी बायोप्सी टेस्ट में किडनी से एक छोटा टिशू (ऊतक) का टुकड़ा निकाला जाता है और इसी टिशू की जांच से रोग के प्रकार और उसकी स्टेज के बारे में पता लगाया जाता है। इस जांच से यह भी पता चल जाता है कि किडनियां कितनी खराब हो चुकी है।

यूरिन टेस्ट

यूरिन टेस्ट के द्वारा यूरिन में एल्बुमिन की जांच की जाती है। एल्बुमिन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो किडनी के खराब होने पर पेशाब के रास्ते से शरीर से बाहर निकलने लगता है।

ब्लड क्रिएटिनिन टेस्ट

क्रिएटिनिन हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म (भोजन को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया) में सहायता करता है।  मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया के बाद ये पदार्थ शरीर के लिए व्यर्थ हो जाता है और पेशाब के रास्ते से बाहर निकल जाता है। जब किडनियां ठीक से काम नहीं करती हैं, तो यही क्रिएटिन मरीज के खून में घुलने लगता है। ऐसे में ब्लड में क्रिएटिनिन की जांच करके किडनी के रोग का पता लगाया जाता है।

किडनी की डायलिसिस

गुर्दे की किसी बीमारी का या ऐसी किसी बीमारी का जिससे गुर्दे प्रभावित हो सकते हैं अगर लंबे समय तक इलाज नहीं किया जाता है तो इससे शरीर में गंभीर समस्याएं शुरू हो जाती हैं और गुर्दा फेल होने का खतरा बढ़ जाता है। मरीज के दोनों गुर्दे फेल हो जाएं तो वो नहीं जी सकता इसलिए गुर्दों के पूरी तरह से फेल होने से पहले ही डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। अगर मरीर को एक्यूट किडनी फेल्योर हुआ है तो डायलिसिस की प्रक्रिया थोड़े समय के लिए होती है। आमतौर पर गुर्दों के ठीक हो जाने के बाद या नया गुर्दा लग जाने के बाद इस प्रक्रिया को बंद कर दिया जाता है। मगर यदि मरीज को क्रॉनिक किडनी फेल्योर हुआ है और गुर्दे इस स्थिति में नहीं हैं कि उन्हें बदला जा सके तो डायलिसिस की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है।
किडनी की गंभीर बीमारी यानि क्रॉनिक किडनी डिजीज होने पर किडनी जब शरीर में मौजूद अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटिन को 15 प्रतिशत या उससे भी कम मात्रा में बाहर निकाल पाए तो डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। कई बार किडनी की समस्या के कारण शरीर में पानी इकट्ठा होने लगता है यानि फ्लूइड ओवरलोड होने लगता है तो भी मरीज को डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। शरीर में पोटैशियम की मात्रा बढ़ने पर भी डायलिसिस की जरूरत पड़ती है क्योंकि पोटैशियम की मात्रा बढ़ने पर दिल की गंभीर बीमारियों को खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह शरीर में एसिड की मात्रा बढ़ने पर भी डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

यूटीआई का इलाज

यूटीआई से संबंधित ट्रीटमेंट के तहत आपको विशेषज्ञों से संपर्क करने के बाद ही दवा लेनी चाहिए। इसके लिए डाक्टर कुछ एंटीबायोटिक दवा देते हैं जो कि यूटीआई में कारगर होते हैं। कई स्थिति में वे लो डोज एंटीबायोटिक देते हैं, जो लंबे समय तक चलती है। ऐसी दवा तब दी जाती है जब महिला विशेष को बार-बार यूटीआई होता है। बहरहाल इसके अलावा पीड़ित मरीज को चाहिए वे नियमित डाक्टर के कहे मुताबिक दवा  खाए और पानी ज्यादा से पिए। असल में पानी पीने से बैक्टीरिया के बाहर निकलने की संभावना ज्यादा रहती है। एक बात और हमेशा ध्यान रखें कि पेशाब के बाद अपने गुप्तांग की अच्छी तरह सफाई करें।

यही नहीं संबंध बनाने के बाद भी सफाई बहुत जरूरी होती हैं क्योंकि कई मामलों में संबंध बनाने के बाद भी यूटीआई होने की आशंका में इजाफा हो जाता है। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि अपने गुप्तांग को हमेशा सूखा रखें। दरअसल गीले होने के कारण भी बैक्टीरिया होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा अपने बाथरूम को साफ रखें, गुप्तांग की सफाई के लिए अच्छे प्रोडक्ट का इस्तेमाल करें। आप चाहें तो इस संबंध में भी डाक्टर की सलाह ले सकती हैं।

शॉक वेव लीथोट्रिप्सी

किडनी में होने वाली पथरी के लिए शॉक वेव लीथेट्रिप्सी भी एक इलाज है। ये एक नॉन सर्जिकल ट्रीटमेंट है। इस ट्रीटमेंट में किडनी की पथरी पर दबाव के साथ तरंगें छोड़ी जाती हैं, जिससे पथरी टूट जाती हैं और पेशाब के रास्ते से बाहर निकल जाती हैं। हालांकि इस ट्रीटमेंट के द्वारा बहुत बड़ी पथरी का इलाज नहीं किया जा सकता है। आमतौर पर 2 सेन्टीमीटर से कम आकार की पथरी का इलाज इस तकनीक से किया जा सकता है। गर्भवती महिलाओं के लिए ये ट्रीटमेंट सुरक्षित नहीं है इसलिए उन्हें इसे नहीं करवाना चाहिए। इसके अलावा, वे लोग जिन्हें रक्तस्राव संबंधी बीमारियां, इन्फेक्शन, मोटापा आदि समस्याएं होती हैं, उनके लिए भी एसडब्ल्यूएल ट्रीटमेंट आदर्श नहीं है। इसलिए, ये ट्रीटमेंट लेने से पहले संबंधित डॉक्टर को अपनी हेल्थ हिस्ट्री जरूर बताएं।

सर्जरी द्वारा इलाज

आमतौर पर किडनी में जमा पथरी को बाहर निकालने के लिए सर्जरी सबसे उपयुक्त उपाय माना जाता है। इस ट्रीटमेंट में ऑपरेशन के द्वारा मरीज के जिस भी अंग में पथरी होती है, उसे बाहर निकाल दिया जाता है।

किडनी प्रत्यारोपण (किडनी ट्रांस्प्लांट)

जब किडनी पूरी तरह खराब हो जाती है, तो मरीज को बचाने के सिर्फ दो उपाय होते हैं। एक लगातार डायलिसिस या किडनी ट्रांस्प्लांट। किडनी ट्रांस्प्लांट में किसी अन्य व्यक्ति की स्वस्थ किडनी को मरीज की खराब किडनियों के स्थान पर लगा दिया जाता है, जिससे मरीज के शरीर में किडनी से संबंधित सभी फंक्शन होने लगते हैं और समस्या समाप्त हो जाती है। लेकिन किडनी ट्रास्प्लांट एक मंहगी प्रक्रिया है और किडनी का दाता मिलना भी बहुत मुश्किल होता है।

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