थायराइड को महिलाओं की बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन इस बीमारी से पुरुष और बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं। थायराइड की बीमारी में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार लोगों को कई सालों तक पता ही नहीं चलता कि उनके शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगड़ चुका है। MOHFW के अनुसार, NFHS 4 में थायराइड के मामले 2.2% थे, जो NFHS 5 में बढ़कर 2.9% हो गया है। इससे पता चलता है कि थायराइड के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि समय पर चेकअप और सही इलाज से ज्यादातर मामलों में थायराइड को कंट्रोल किया जा सकता है। थायराइड से जुड़ी हर जानकारी के लिए हमने Dr. Himika Chawla, Senior Consultant, Endocrinology and Diabetology, PSRI Hospital, Delhi से बात की।
थायराइड क्या है?
Dr. Himika Chawla ने कहा, “थायराइड एक तितली के आकार की छोटी सी एंडोक्राइन ग्लैंड है, जो गर्दन के सामने सांस की नली के दोनों ओर होती है। हालांकि, इसका आकार बहुत छोटा होता है, इसके बावजूद यह शरीर के लगभग सभी अंगों के काम करने की स्पीड को कंट्रोल करती है। थायराइड आमतौर पर दो हार्मोन बनाती है, जिन्हें ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) और थायरॉक्सिन (T4) कहा जाता है। ये दोनों हार्मोन आयोडीन की मदद से बनते हैं। इसलिए हमेशा कहा जाता है कि शरीर में आयोडीन की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए।”
थायराइड ग्लैंड कैसे काम करती है?
Cleveland Clinic के अनुसार, थायराइड मुख्य रूप से थायरॉक्सिन (T4) हार्मोन ज्यादा बनाता है, लेकिन इसका मेटाबॉलिज्म पर ज्यादा असर नहीं पड़ता। जब थायराइड T4 को ब्लड फ्लो में पहुंचता है, तो फिर डिआयोडिनेशन प्रक्रिया के जरिए यह ट्रायआयोडोथायरोनिन (T3) में बदल जाता है। थायराइड T3 हार्मोन कम बनाता है, लेकिन मेटाबॉलिज्म पर इसका ज्यादा असर पड़ता है। इसके अलावा, कैल्सीटोनिन हार्मोन ब्लड में कैल्शियम की मात्रा को कंट्रोल करने में मदद करता है। इस तरह थायराइड हार्मोन मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकता है।
Statpearls Publishing के अनुसार, थायराइड ग्लैंड करीब 90 फीसदी निष्क्रिय थायरॉक्सिन (T4) और 10% एक्टिव थायराइड हार्मोन यानी ट्रायआयोडोथायरोनिन (T3) बनाती है। T3 पूरे शरीर में कई अंगों और टिश्यू को प्रभावित करती है, जिसमें मेटाबोलिक रेट और प्रोटीन को बढ़ाने में मदद करती है। वहीं T4 शरीर में एनर्जी, ग्रोथ और इंटरनल बैलेंस के लिए इस्तेमाल होता है।
Dr. Himika Chawla कहती हैं, “इसमें TSH बहुत जरूरी हार्मोन है। थायराइड-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (TSH), जिसे आमतौर पर थायरोट्रोपिन (Thyrotropin) भी कहा जाता है, इसे पिट्यूटरी ग्लैंड बनाती है। यह हार्मोन थायराइड ग्लैंड के हार्मोन्स T3 और T4 को बनाने और रिलीज करने में मदद करता है।”
Dr. Himika Chawla ने बताया कि अगर TSH बढ़ा हुआ हो और T4 कम हो, तो हाइपोथायराइडिज्म की संभावना होती है। अगर TSH कम हो और T3-T4 बढ़े हुए हों, तो हाइपरथायराइडिज्म हो सकता है। हालांकि, रिपोर्ट के अलावा, डॉक्टर मरीज के लक्षण और अन्य चेकअप के आधार पर ही बताते हैं कि मरीज को कौन-सा थायराइड हुआ है।
थायराइड कितनी तरह का होता है?
Cleveland Clinic के अनुसार, आमतौर पर लोगों में थायराइड मुख्य रूप से दो तरह का होता है, लेकिन कई दुर्लभ मामलों में कैंसर या स्टॉर्म भी हो सकता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह लेकर ही थायराइड की जांच कराना बेहतर रहता है।
- हाइपोथायरायडिज्म - इसमें थायराइड बहुत कम एक्टिव रहता है।
- हाइपरथायरायडिज्म - इसमें थायराइड ज्यादा एक्टिव रहता है।
- थायराइड कैंसर - इसमें थायराइड के टिश्यू के DNA में बदलाव आता है।
- दोनों होना - कुछ कंडीशन हाइपोथायरायडिज्म और हाइपरथायरायडिज्म दोनों बनाती हैं।
- थायराइड स्टॉर्म - यह एक दुर्लभ मेडिकल कंडीशन है।
थायराइड होने के कारण
Dr. Himika Chawla कहती हैं कि थायराइड होने के कई कारण होते हैं, जिन पर नजर रखना जरूरी होता है।
हाइपोथायरायडिज्म का कारण
यह कंडीशन इन कारणों से हो सकती है।
- हाशिमोटो थायराइडाइटिस - यह क्रोनिक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो अंडरएक्टिव थायराइड बनने का कारण बनती है।
- आयोडीन की कमी - थायराइड को हार्मोन बनाने के लिए आयोडीन की जरूरत होती है। अगर डाइट में आयोडीन की कमी होती है, तो हाइपोथायरायडिज्म हो सकता है। इस कारण कई मामलों में गोयाटर रोग का बढ़ना भी देखा गया है।
- जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म - कुछ शिशु बिना थायराइड ग्लैंड या अंडरएक्टिव ग्लैंड के साथ जन्म लेते हैं।
हाइपरथायरायडिज्म का कारण
इसके होने के कई कारण होते हैं।
- ग्रेव्स बीमारी - यह ऑटोइम्यून बीमारी है, जो ओवरएक्टिव थायराइड का कारण बनती है। यह हाइपरथायरायडिज्म का सबसे मुख्य और आम कारण है।
- थायराइड नोड्यूल - इसमें थायराइड ग्लैंड में असामान्य गांठें बनने लगती हैं। आमतौर पर ये गांठें कैंसर की नहीं होतीं। इसे थायराइड नोड्यूल कहा जाता है।
- बहुत ज्यादा आयोडीन होना - जब शरीर में जरूरत से ज्यादा आयोडीन हो जाता है, तो थायराइड जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगता है।
थायराइड कैंसर
Mayo Clinic के मुताबिक, थायराइड कैंसर में थायराइड की कोशिकाओं के डीएनए में म्यूटेशन होने लगते हैं। इस वजह से सेल्स तेजी से बढ़ने लगते हैं और इससे गले के पास ट्यूमर बन जाता है। यह ट्यूमर बढ़कर आस-पास के टिश्यू को प्रभावित कर सकता है और गर्दन की लिम्फ नोड्स तक फैल सकता है। अगर समय पर इलाज न हो, तो ये सेल्स गर्दन से बढ़कर फेफड़ों, हड्डियों और अन्य भागों तक भी फैल सकते हैं।
Global Cancer Observatory 2024 के अनुसार, दुनिया भर में थायराइड कैंसर का छठा स्थान है। इसके करीब साल में साढ़े नौ लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे।
थायराइड स्टॉर्म
Dr. Himika Chawla कहती हैं कि अगर किसी सर्जरी, चोट या स्ट्रेस की वजह से थायराइड ग्रंथि जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है, तो यह थायराइड स्टॉर्म को ट्रिगर कर सकते हैं। यह एक बहुत ही दुर्लभ मेडिकल कंडीशन है, जिसमें शरीर का मेटाबॉलिज्म इतना तेज हो जाता है कि हार्ट, दिमाग और फेफड़े जैसे जरूरी अंगों पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ सकता है। इसलिए इसका तुरंत इलाज कराना जरूरी है।
कंडीशन जो हाइपर और हाइपो दोनों का कारण बन सकती हैं
- थायराइडाइटिस - इस कंडीशन में थायराइड ग्लैंड में सूजन हो सकती है, जो शुरुआत में तो हाइपरथायरायडिज्म होती है और बाद में हाइपोथायरायडिज्म में बदल जाती है।
- पोस्टपार्टम थायराइडाइटिस - इस कंडीशन में कुछ महिलाओं को प्रेग्नेंसी के बाद थायराइड की समस्या हो सकती है। हालांकि, यह काफी दुर्लभ स्थिति है, जो पहले हाइपरथायरायडिज्म का कारण बनती है, जिसके बाद हाइपोथायरायडिज्म होता है।
थायराइड के लक्षण क्या हो सकते हैं?
Dr. Himika Chawla ने बताया कि आमतौर पर लोग थायराइड से जुड़े लक्षणों को रोजाना की थकान या कमजोरी समझकर इग्नोर कर देते हैं और इस वजह से समय पर इलाज न मिलने के कारण कई बार कंडीशन गंभीर भी हो सकती है।
हाइपोथायराइडिज्म के लक्षण
Dr. Himika Chawla ने कहा कि हाइपोथायराइडिज्म में जरूरत से कम हार्मोन बनते हैं, जिससे शरीर का फंक्शन धीमा पड़ सकता है। इसमें मरीज को ये लक्षण महसूस हो सकते हैं।
- वजन बढ़ना
- थकान
- कब्ज
- ठंड ज्यादा लगना
- स्किन में रूखापन
- बाल झड़ना
- याददाश्त कमजोर होना
हाइपरथायराइडिज्म के लक्षण
Dr. Himika Chawla ने कहा कि इस कंडीशन में मरीजों के हार्मोन जरूरत से ज्यादा बनने लगते हैं, जिस वजह से मरीजों को ये लक्षण महसूस हो सकते हैं।
- वजन तेजी से घटना
- हार्ट बीट तेज होना
- घबराहट
- हाथ कांपना
- ज्यादा पसीना आना
- नींद कम आना
थायराइड होने का खतरा किन लोगों को ज्यादा होता है?
Dr. Himika Chawla कहती हैं कि थायराइड होने के कई कारण हो सकते हैं।
- महिलाओं को थायराइड होने की समस्या ज्यादा हो सकती है।
- अगर परिवार में थायराइड की हिस्ट्री है।
- बढ़ती उम्र में थायराइड होने का रिस्क हो सकता है।
- ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित मरीजों को यह समस्या हो सकती है।
- प्रेग्नेंसी में हार्मोनल बदलावों की वजह से समस्या हो सकती है।
- रेडिएशन थेरेपी लेने वाले मरीजों को थायराइड होने का रिस्क बढ़ सकता है।
- कुछ खास दवाएं भी थायराइड का रिस्क बढ़ा सकती हैं।
- आयोडीन की कमी या अधिक मात्रा थायराइड का रिस्क बढ़ा सकती है।
थायराइड का शरीर पर असर
Dr. Himika Chawla कहती हैं कि थायराइड सिर्फ गर्दन से जुड़ी बीमारी नहीं है, हार्मोन शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करता है।
थायराइड का हार्ट पर असर
IJC Heart & Vasculature के अनुसार, थायराइड हार्मोन सीधे तौर पर हार्ट सिस्टम से जुड़ा होता है और इसके लक्षण हार्ट पर भी दिखाई दे सकते हैं। हाइपरथायरायडिज्म के कारण हार्ट की गति और संकुचन बढ़ सकता है। अगर थायराइड लंबे समय तक बना रहे, तो एट्रियल फाइब्रिलेशन हो सकता है। इसके अलावा, हाइपरथायरायडिज्म के मरीजों में सांस फूलना, तेज धड़कन होना और हार्ट फेलियर की समस्या हो सकती है।
हाइपोथायरायडिज्म के कारण मरीज का कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और हाइपरटेंशन की समस्या हो सकती है। इसके अलावा, हाइपोथायरायडिज्म टाइप 2 डायबिटीज के खतरे को 26% बढ़ा देता है। इस कंडीशन के मरीजों में खून के थक्के जमने की आशंका भी बढ़ सकती है।
थायराइड का फर्टिलिटी पर असर
Clinical Endocrinology & Metabolism के मुताबिक, रिप्रोडक्टिव उम्र की महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म की व्यापकता 2% से 4% के बीच होती है। इसमें बार-बार होने वाले मिसकैरेज से पीड़ित महिलाओं में थायराइड एंटीबॉडीज की मौजूदगी 25% तक हो सकती है। हाइपरथायराडिज्म में 22 फीसदी महिलाओं में अनियमित पीरियड्स देखे गए हैं। इस कंडीशन में अगर महिला को सही इलाज न मिले, तो यह प्रेग्नेंसी के शुरुआती दौर में मिसकैरेज का कारण बनता है।हाइपोथायराइड की स्थिति में महिलाओं में 25% से 60% तक पीरियड्स अनियमित देखे गए हैं। इसका असर प्रेग्नेंसी में देखा गया है।
थायराइड का किडनी पर असर
Scientific Reports के अनुसार, थायराइड डिस्फंक्शन होने से क्रोनिक किडनी डिजीज हो सकती है। थायराइड हार्मोन किडनी की संरचना और उसके फंक्शन को प्रभावित कर सकता है। हाइपोथायरायडिज्म से किडनी का फंक्शन घटता है और क्रोनिक किडनी डिजीज सीधे तौर पर मृत्यु दर और हार्ट से जुड़ी बीमारियों का एक बड़ा रिस्क फैक्टर है।
थायराइड का ब्लड शुगर पर असर
Diabetes Metabolism Journal के अनुसार, थायराइड और डायबिटीज मेलिटस दोनों ही एंडोक्राइन से जुड़ी बीमारियां होती हैं। ऐसे में थायराइड के मरीजों को डायबिटीज होने का रिस्क ज्यादा होता है। हाशिमोटो और ग्रेव्स दोनों ही ऑटोइम्यून थायराइड बीमारियां हैं और टाइप 1 डायबिटीज भी ऑटोइम्यून बीमारी है ऐसे में दोनों बीमारियों के लिए एक समान जीन जिम्मेदार हो सकते हैं।
वहीं हाइपरथायरायडिज्म, ग्लूकोज का अवशोषण और इंसुलिन का डिग्रेडेशन बढ़ाता है, जिससे ब्लड शुगर अनियंत्रित हो सकता है। हाइपोथायरायडिज्म में मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और मांसपेशियों में इंसुलिन सेंसिटिविटी में कमी के कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ सकता है।
थायराइड का मेंटल हेल्थ पर असर
थायराइड का मेंटल हेल्थ पर भी बहुत असर पड़ता है। थायराइड के मरीजों को अक्सर इन परेशानियों से जूझना पड़ सकता है।
- डिप्रेशन
- एंग्जायटी
- पैनिक अटैक
- बेचैनी महसूस होना
- फोकस करने में दिक्कत
- फैसला लेने में परेशानी
थायराइड का मेनोपॉज पर असर
Journal of the Brazilian Medical Association में बताया गया है कि जैसे-जैसे महिलाओं की उम्र बढ़ती है, थायराइड ग्लैंड में भी बदलाव होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में मेनोपॉज भी शुरू हो जाता है। ऐसे में कई बार महिलाएं मेनोपॉज और हाइपरथायरायडिज्म या हाइपोथायरायडिज्म के लक्षणों में कंफ्यूज हो जाती हैं। इस वजह से कई बार थायराइड के चेकअप में देरी भी हो सकती है। इसके अलावा, एस्ट्रोजन और थायराइड हार्मोन दोनों ही दिमाग को कंट्रोल करते हैं। अगर ऐसे में एस्ट्रोजन कम होने लगता है, तो महिलाओं के लिए यह जानना जरूरी है कि लक्षण मेनोपॉज के हैं या फिर थायराइड के।
महिलाओं में थायराइड
Johns Hopkins Medicine में कहा गया है कि महिलाओं में थायराइड की समस्या के कारण प्यूबर्टी और पहला पीरियड समय से पहले या देर से शुरू हो सकता है। थायराइड हार्मोन के कारण पीरियड्स के दौरान ब्लीडिंग बहुत ज्यादा या बहुत कम हो सकती है। इसके अलावा, पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं या फिर कई महिलाओं में पीरियड्स आना पूरी तरह से बंद हो सकते हैं। इस कंडीशन को एमेनोरिया कहा जाता है।
थायराइड से पीड़ित महिलाओं को ओव्यूलेशन की समस्या आ सकती है। इस वजह से प्रेग्नेंसी में दिक्कत हो सकती है। इसके साथ ही डिलीवरी के बाद महिलाओं को ब्रेस्टफीड कराने के लिए दूध निकलने की परेशानी से भी दो-चार होना पड़ सकता है।
पुरुषों में थायराइड
The Journal of Clinical Endocrinology & Metabolism के अनुसार, थायराइड की वजह से पुरुषों में सेक्शुअल परफॉर्मेंस पर भी असर पड़ता है। इस अध्ययन में पुरुषों के सेक्शुअल डिस्फंक्शन और थायराइड हार्मोन के लेवल की जांच की गई है। इसमें 48 पुरुषों को शामिल किया गया। इसमें 34 हाइपरथायरायडिज्म और 14 हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित थे। इसमें पहली बार आने और थायराइड की बीमारी मैनेज होने के 8 से 16 हफ्तों बाद चेक किया गया, तो पाया कि हाइपरथायरायडिज्म के मरीजों में पहले दिन 50 फीसदी शीघ्रपतन की समस्या थी, वह घटकर 15% रह गई। इलाज के बाद TSH और थायराइड हार्मोन तेजी से सामान्य हो गए।
बच्चों में थायराइड
MDPI में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, कई मामलों में बच्चों में थायराइड जन्मजात हो सकता है, जिसकी वजह से बच्चों में बौद्धिक विकलांगता हो सकती है। थायराइड की समस्या से 64.2% लड़कियां (बच्चियां) और 35.8% लड़के (बच्चे) पीड़ित थे। बच्चों में हाइपोथायरायडिज्म की समस्या सबसे आम थी। इसमें ऑटोइम्यून हाशिमोटो थायराइडाइटिस के मामले सबसे ज्यादा थे। दूसरे नंबर पर 39.6% मामलों में जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म था।
थायराइड की जांच कैसे करें?
National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases (NIDDKD) में थायराइड की जांच करने के ये तरीके हो सकते हैं। थायराइड की जांच करने के लिए ब्लड टेस्ट और इमेजिंग टेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है।
- TSH - ब्लड टेस्ट में थायराइड की जांच के लिए TSH का लेवल चेक किया जाता है। अगर TSH हाई होता है, तो इसका मतलब है कि हाइपोथायरायडिज्म है और लेवल कम होने का मतलब है कि पिट्यूटरी ग्लैंड ने TSH बनाना बंद कर दिया है। इसका अर्थ है कि मरीज को हाइपरथायरायडिज्म की समस्या है।
- T4 टेस्ट - हाइपरथायरायडिज्म होने पर हाई T4 होता है और कम T4 होने पर हाइपोथायरायडिज्म का संकेत है।
- फ्री T4 - प्रेग्नेंसी में या फिर गर्भनिरोधक टैबलेट लेने से T4 का लेवल बढ़ सकता है, जबकि गंभीर बीमारी या स्टेरॉयज लेने से T4 घट सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर थायराइड मापने के लिए फ्री T4 टेस्ट कराने की सलाह देते हैं।
- T3 टेस्ट - अगर T4 टेस्ट का लेवल सामान्य है और डॉक्टर को हाइपरथायरायडिज्म का शक है, तो वे T3 टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।
- थायराइड एंटीबॉडी टेस्ट - यह टेस्ट ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे ग्रेव्स रोग या हाशिमोटो रोग में किया जाता है।
- थायराइड इमेजिंग टेस्ट - गर्दन पर एक ट्रांसड्यूसर घुमाकर सुरक्षित साउंड वेव द्वारा तस्वीर बनाई जाती है। इसमें थायराइड की गांठों को देखा जाता है कि कहीं ये गांठें कैंसर से जुड़ी हुई तो नहीं हैं।
- थायराइड स्कैन - रेडियोवेव आयोडीन की बहुत कम खुराक इंजेक्शन या कैप्सूल के जरिए दी जाती है। इसके बाद 30 मिनट से 24 घंटे बाद स्पेशल कैमरा तस्वीरें लेता है। इसमें थायरायड के आकार, बनावट और कंडीशन को देखने व नोड्यूल्स या ग्रेव्स बीमारी का पता लगाने के लिए स्कैन किया जाता है।
- RAIU टेस्ट - इसमें आयोडीन का कैप्सूल निगलने के बाद चार से छह घंटे और 24 घंटे बाद एक गामा प्रोब से आयोडीन के अवशोषण को मापा जाता है। इसमें चेक किया जाता है कि थायराइड खून से कितना आयोडीन सोख रहा है।
थायराइड का इलाज
Cleveland Clinic के अनुसार, थायराइड का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज किस तरह की थायराइड बीमारी से जूझ रहा है।
- हाइपरथायरायडिज्म का इलाज - इसमें आमतौर पर मरीज को एंटी थायराइड दवाएं दी जाती हैं और रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी, बीटा-ब्लॉकर्स दवाएं और सर्जरी की सलाह दी जा सकती है।
- हाइपोथायरायडिज्म का इलाज - थायराइड हार्मोन को मैनेज करने के लिए सिंथेटिक थायराइड दवा दी जाती है, जो सुबह खाली पेट लेनी होती है। इससे मेटाबॉलिज्म को बेहतर किया जाता है।
थायराइड से बचाव के लिए डाइट
डाइटिशियन एवं न्यूट्रिशनिस्ट अर्चना जैन ने कहा, "हाइपोथायराइडिज्म के मरीज दाल, पनीर, साबुत अनाज, सूखे मेवे, ब्राजील नट्स और सीफूड ले सकते हैं। इन फूड्स में प्रोटीन और आयोडीन जैसे कई जरूरी न्यूट्रिशन होते हैं।
हाइपोथायराइडिज्म के मरीजों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए ताकि शरीर में हाइड्रेशन और ऊर्जा बनी रहे। इन मरीजों को सोया प्रोडक्ट्स, कैफीन और पैकेज्ड फूड से परहेज करना चाहिए।
हाइपरथायराइडिज्म में डाइट
डायटिशियन स्मिता सिंह के अनुसार, इस कंडीशन में वजन तेजी से कम होता है, इसलिए शरीर को ताकत देने वाले प्रोडक्ट्स लेने चाहिए। हाइपरथायराइडिज्म में डाइट ऐसी होनी चाहिए।
- कम आयोडीन वाले प्रोडक्ट्स लेने चाहिए।
- ब्रोकली और फूलगोभी जैसी क्रूसिफेरस सब्जियां खानी चाहिए।
- कैल्शियम से भरपूर फूड्स को डाइट में शामिल करें।
- कैफीन, प्रोसेस्ड फूड और चीनी वाले प्रोडक्ट्स से बचना चाहिए।
- स्मोकिंग और शराब का सेवन बिल्कुल न करें।
लाइफस्टाइल में बदलाव
थायराइड के मरीजों को रेगुलर एक्सरसाइज, पर्याप्त नींद और स्ट्रेस मैनेज करना चाहिए। इसके साथ, रेगुलर थायराइड चेक कराते रहना चाहिए।
डॉक्टर से कब मिलें?
Dr. Himika Chawla ने कहा कि अगर वजन तेजी से कम या बढ़ रहा हो, बिना वजह थकान रहे, बाल बहुत ज्यादा झड़ने लगे, मांसपेशियों में कमजोरी महसूस हो, स्किन में ड्राईनेस हो और महिलाओं को पीरियड्स रेगुलर न हो या प्रेग्नेंसी में दिक्कत आ रही हो, तो तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
निष्कर्ष
थायराइड के कई लक्षण मेनोपॉज या डायबिटीज जैसी बीमारियों से मिल सकते हैं। इसलिए थायराइड के लक्षणों की पहचान करना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही थायराइड को मैनेज करने के लिए मरीजों को अपनी डाइट, लाइफस्टाइल के साथ दवाओं को भी सही तरीके से लेना जरूरी है। कई बार लोगों को गलतफहमी रहती है कि अगर थायराइड मैनेज हो गया है, तो दवा लेना बंद किया जा सकता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे थायराइड गंभीर हो सकती है।
