Radioactive Iodine Therapy in Hindi: थायराइड वर्तमान में एक आम समस्या बन चुका है। कम उम्र में ही कई लोगथायराइड का शिकार बन रहे हैं । ऐसे में कई बार इसे नजरअंदाज करने और सही समय पर दवाइयां लेना शुरू न करने के कारण कुछ गंभीर समस्याएं बढ़ सकती हैं। रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी एक खास तरह का मेडिकल ट्रीटमेंट है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर थायराइड ग्लैंड से जुड़ी गंभीर समस्याओं को ठीक करने के लिए किया जाता है। दरअसल, जब थायराइड ग्लैंड शरीर की जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है या फिर कैंसर सेल्स बनाने लगती है तो डॉक्टर थायराइड के मरीजों को यह थेरेपी लेने की सलाह देते हैं। इस इलाज के दौरान रेडियोएक्टिव आयोडीन का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे मरीज आमतौर पर कैप्सूल या लिक्विड दवा के रूप में दिया जाता है। ऐसे में आइए दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजी और डायबिटीज विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. हिमिका चावला से जानते हैं इसके बारे में डिटेल में।
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के फायदे
डॉ. हिमिका चावला की मानें तो रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी थायराइड की बीमारी या कैंसर के खराब सेल्स को बहुत आसानी से और सही तरीके से खत्म करने में मदद कर सकती है। यह एक ऐसा ट्रीटमेंट है, जिससे बिना किसी सर्जरी के थायराइड का इलाज किया जा सकता है।
2025 में Endocrine and Metabolic Science में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, हाइपरथायरायडिज्म के इलाज के लिए रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी एक अहम तरीका है। इलाज की सफलता का पता रेडियोएक्टिव आयोडीन ट्रीटमेंट के 6 महीने के अंदर यूथायरायडिज्म और हाइपोथायरायडिज्म के विकसित होने से चलता है। इस स्टडी में यह भी बताया गया है कि, "तय डोज वाले ट्रीटमेंट से 6 और 12 महीनों में 75.6% सफलता दर देखी गई है, जिसमें महिलाओं, ग्रेव्स डिजीज और टॉक्सिक नोड्यूल्स में तुरंत रिएक्शन देखा गया है। महिलाओं में बायोकेमिकल में सुधार तेजी से हुआ, जबकि बुजुर्ग मरीजों में FT4 पहले सामान्य हो गया और कुल मिलाकर TSH का लेवल FT4 के लेवल से पहले स्थिर हो गया, जिससे RAI की प्रभावशीलता बढ़ती है। यह थेरेपी कई तरह से फायदेमंद हो सकती है, जिसमें-
1. बहुत ज्यादा प्रभावी होता है
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी हइपरथायरायडिज्म को कंट्रोल करने में बहुत कारगर माना जाता है। ज्यादातर मरीजों में एक ही खुराक के बाद थायराइड हार्मोन का लेवल नॉर्मल हो जाता है या ग्लैंड इनएक्टिव हो जाता है, जिससे थायराइड दोबारा होने की संभावना कम हो जाती है।
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2. नॉन-सर्जिकल ऑप्शन
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी एक नॉन सर्जिकल विकल्प होता है, जिसमें आपके शरीर पर किसी तरह की सर्जरी की जरूरत नहीं होती है। इसलिए, यह उन लोगों के लिए एक सुरक्षित विकल्प है, जो सर्जरी नहीं करवाना चाहते हैं, उनके लिए यह ऑप्शन बेहतर होता है।
3. शरीर के अन्य अंगों पर कम प्रभाव
थायराइड सेल्स शरीर में आयोडीन को सोखने वाले मुख्य सेल्स होते हैं। जब रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी की जाती है तो यह थायराइड ग्लैंड द्वारा ही सोखा जाता है, जिससे शरीर के बाकी हिस्सों और अंगों पर इसका कम प्रभाव पड़ता है।
4. कैंसर सेल्स को खत्म करना
थायराइड कैंसर में इस थेरेपी की मदद से सर्जरी के बाद शरीर में बचे हुए कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद मिलती है। यह कैंसर को शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने के जोखिम को कम कर देता है।
5. आसान प्रोसेस
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी आमतौर पर एक कैप्सूल या लिक्विड के रूप में दी जाता है। ज्यादा मामलों में इस थेरेपी के लिए मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती है और मरीज इलाज के तुरंत बाद घर जा सकता है।
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी कैसे होती है?
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी एक सिंपल प्रोसेस है, जिसे करने के लिए आप इन स्टेप्स को अपना सकते हैं-
स्टेप-1 थेरेपी की तैयारी
सबसे पहले आप अपने आपको इस थेरेपी के लिए तैयार करें और इसके लिए डॉक्टर आपको कुछ समय के लिए कम आयोडीन वाली डाइट पर रहने की सलाह दे सकते हैं। आपकी थायराइड की दवाएं अस्थायी रूप से बंद करवाई जा सकती हैं। इसके साथ ही आपका ब्लड टेस्ट और स्कैन किया जाता है।
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स्टेप-2 दवा या लिक्विड देना
इस स्टेप में मरीज को कैप्सूल या लिक्विड के रूप में आयोडीन-131 दिया जाता है। मरीज को इसे इंजेक्शन के रूप में नहीं दिया जाता है, बल्कि निगलना होता है।
स्टेप-3 आइसोलेशन
इस थेरेपी के बाद मरीज को कुछ दिनों के लिए खुद को दूसरों से दूर रहना होता है, खासकर बच्चों और प्रेग्नेंट महिलाओं से।
स्टेप-4 फॉलो-अप लेना
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के बाद कुछ हफ्तों या महीनों के बाद स्कैन किया जाता है और आपके हार्मोन लेवल को चेक किया जाता है। इसलिए, थेरेपी के बाद फॉलो-अप लेना भी बहुत जरूरी है।

रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स
2023 में StatPearls मेडिकल रिसोर्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी में अगर डोज की मात्रा ज्यादा हो जाए तो यह आपके लिए हानिकारक हो सकता है, जिसके कारण मरीज के अंदर हल्के से गंभीर लक्षण नजर आ सकते हैं। इन लक्षणों में शामिल हैं-
- मतली और उल्टी
- सीने में दर्द की समस्या
- पित्ती या खुजली होना
- एनीमिया होना
- ल्यूकोपेनिया
- थ्रोम्बोसाइटोपेनिया
- टेराटोजेनिसिटी
- सियालाडेनाइटिस
- इनफर्टिलिटी
- ड्राई आई की समस्या
- देर से होने वाली समस्याएं
- पेट का कैंसर
- मूत्राशय का कैंसर
- ब्रेस्ट कैंसर
- हाइपोथायरायडिज्म
इसके अलावा प्रेग्नेंट और ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाओं को ये थेरेपी नहीं दी जाती है क्योंकि इसके कुछ नुकसान हो सकते हैं।
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के बाद महिला और पुरुष में होने वाली समस्याएं
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के बाद महिला और पुरुष दोनों में अलग-अलग तरह के साइड इफेक्ट्स नजर आ सकते हैं।
पुरुषों पर असर
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के दौरान इसकी डोज ज्यादा होने के कारण पुरुषों का स्पर्म काउंट कम हो सकता है। 2026 में Molecular Imaging and Radionuclide Therapy में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, कई बार RAI ट्रीटमेंट करवाने से टेस्टिकुलर को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है, जिसके कारण स्पर्म की संख्या में 50% और FSH के लेवल में 40% की कमी आ जाती है। ये प्रभाव उन 20% मरीजों में देखे जाते हैं जो कई बार ट्रीटमेंट करवाते हैं और उन 10% मरीजों में जो सिर्फ एक बार ट्रीटमेंट करवाते हैं। इसलिए, इस ट्रीटमेंट के बाद पुरुषों को कुछ समय तक पिता बनने से बचने की सलाह दी जाती है।
महिलाओं पर असर
2022 में Scientific Reports में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, जिन महिलाओं को रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट दिया गया, उनमें से 40% महिलाओं में समय से पहले मेनोपॉज की समस्या देखी गई है। इसके अलावा, ओवेरियन रिजर्व में भी कमी देखी गई है। ट्रीटमेंट के बाद महिलाओं में एंटी-मुलरियन हार्मोन (AMH) के लेवल में गिरावट देखने को मिलती है। AMH का कम लेवल यह दिखाता है कि महिलाओं के शरीर में अंडों की संख्या में कमी हो रही है, जिससे उनके कंसीव करने की संभावना कम हो सकती है। इसलिए महिलाओं को ट्रीटमेंट के कम से कम 6-12 महीने तक प्रेग्नेंसी नहीं प्लान करना चाहिए।
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रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के बाद किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के बाद भी जरूरी है कि आप अपने शरीर में नजर आने वाले बदलावों पर फोकस करें। इसके साथ मॉनिटरिंग करना भी बहुत जरूरी है। 2023 में StatPearls मेडिकल रिसोर्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार रेडियोएक्टिव थेरेपी करवाने वाले मरीजों के लिए मॉनिटरिंग और नियमित जांचें लाइफटाइम के लिए जरूरी हो जाती हैं। 6 महीने तक हर 4 से 6 हफ्ते में थायराइड फंक्शन टेस्ट की जांच की जानी चाहिए, जब तक मरीज यूथायराइड या हाइपोथायरॉइड स्थिति में न पहुंच जाए। इलाज के बाद फ्री थायरॉक्सिन के लेवल की नियमित रूप से निगरानी करनी जरूरी है, क्योंकि मरीज में यूथायराइड होने के बाद भी TSH लेवल लंबे समय तक कम रह सकता है। इसलिए, जरूरी है कि आप नियमित रूप से अपनी स्थिति की जांच करें।
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी की जरूरत कब होती है?
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी की जरूरत आमतौर पर थायराइड कैंसर के इलाज के बाद पड़ती है, ताकि उन सेल्स को खत्म किया जा सके, जो कैंसर सर्जरी के बाद बच जाती हैं। इसके अलावा डॉक्टर आमतौर पर इन स्थितियों में रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी करवाने की सलाह देते हैं-
- अगर थायराइड कैंसर के फैलने का खतरा बहुत ज्यादा है, जैसे कैंसर ट्यूमर बहुत बड़ा हो गया है या फिर कैंसर थायराइड की बाहरी परत को पार करके आस-पास के टिशू में फैल रहा हो।
- कैंसर की सर्जरी के बाद अगर डॉक्टर को लगता है कि थायराइड का कुछ हिस्सा या कैंसर के छोटे सेल्स अभी भी शरीर में मौजूद हैं तो उन्हें पूरी तरह खत्म करने के लिए इस थेरेपी को करवाने की सलाह दे सकते हैं।
- अगर कैंसर ट्रीटमेंट के बाद कैंसर दोबारा हो जाता है तो उसे कंट्रोल करने के लिए रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है।
- सर्जरी के बाद अगर ब्लड टेस्ट में थायरोग्लोबुलिन का लेवल ज्यादा बढ़ने लगता है, जो थायराइड सेल्स द्वारा बनाया जाने वाला प्रोटीन है तो भी इस थेरेपी को करवाने की जरूरत पड़ सकती है।
- हाइपरथायरॉयडिज्म की समस्या में जब दवाएं काम नहीं करती हैं या बार-बार हाइपरथायरायड बढ़ता है तो भी इस थेरेपी की मदद से थायराइड को कंट्रोल किया जा सकता है।
- ग्रेव्स डिजीज (Graves disease), जो एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इसमें थायराइड के ज्यादा एक्टिव होने पर भी रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी की जरूरत पड़ सकती है।
डॉक्टर से कब मिलें?
थायराइड की समस्या में रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी के बाद अगर मरीज के गर्दन में सूजन, सांस लेने में तकलीफ या निगलने में मुश्किल महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. इसके अलावा, इस थेरेपी के बाद कान के नीचे या जबड़े के पास लार ग्लैंड में दर्द और सूजन, लगातार उल्टी या स्वाद न आने की समस्या आती है तो भी डॉक्टर से कंसल्ट करना जरूरी हो जाता है।
निष्कर्ष
थायराइड कैंसर और हाइपरथायराइडिज्म की समस्या में रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी काफी सुरक्षित और प्रभावी मानी जाती है। हालांकि, इस थेरेपी के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। इसलिए कुछ खास सावधानियां बरतनी और समय-समय पर ब्लड टेस्ट और डॉक्टर से फॉलो-अप लेना बहुत जरूरी है। इसके अलावा, महिला और पुरुष दोनों पर इस थेरेपी का असर अलग-अलग हो सकता है, खासकर उनकी फर्टिलिटी पर इसका प्रभाव पड़ता है। इसलिए, थेरेपी से पहले और बाद में डॉक्टर द्वारा दी गई सलाह का पालन करना बहुत जरूरी है।
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FAQ
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी कितने दिन में असर दिखाता है?
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी का असर आमतौर पर 1 से 3 महीने में नजर आ सकता है और इसका ज्यादा फायदे 3 से 6 महीने बाद मिल सकता है।रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी कितनी बार होती है?
रेडियोएक्टिव आयोडीन थेरेपी आमतौर पर हाइपरथायरायडिज्म के लिए एक बार दी जाने वाली खुराक के रूप में इस्तेमाल होती है। हालांकि, थायराइड कैंसर या गंभीर मामलों में अगर कैंसर बना रहता है या वापस आता है तो इसे हर 3 से 6 महीने में दोहराया जा सकता है।प्रेग्नेंसी में थायराइड का लेवल कितना होना चाहिए?
प्रेग्नेंसी में थायराइड का लेवल यानी TSH लेवल मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होता है। आमतौर पर पहली तिमाही में TSH लेवल 0.1 से 2.5 mIU/L के बीच होना चाहिए। जबकि दूसरी और तीसरी तिमाही में यह लेवल 0.3 से 3.0 mIU/L तक हो सकता है। अगर यह लेवल बढ़ता है, तो डॉक्टर की सलाह पर दवाइयां शुरू कर सकते हैं।गर्भवती महिला का थायराइड कितना होना चाहिए?
प्रेग्नेंसी में महिला में थायराइड का लेवल नॉर्मल से कम होना चाहिए। आमतौर पर 0.1 से 4.0 mIU/L के बीच होना चाहिए। पहली तिमाही में TSH स्तर 2.5 mIU/L से नीचे रहना अच्छा माना जाता है।
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Current Version
Apr 24, 2026 15:43 IST
Modified By : Katyayani Tiwari Apr 24, 2026 15:43 IST
Published By : Katyayani Tiwari
Reviewed By : Dr Himika Chawla