Cleveland Clinic के अनुसार, अगर किसी महिला को लगातार 12 महीने तक पीरियड्स नहीं होते, तो उसे मेनोपॉज मान लिया जाता है। यह आमतौर पर 45 से 55 साल की उम्र के बीच में हो सकता है और एवरेज उम्र 51-52 साल मानी जाती है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें ओवरी रिप्रोडक्टिव हार्मोन बनाना लगभग बंद कर देती हैं। Institute for Quality and Efficiency in Health Care के अनुसार, थायराइड ग्रंथि गले के सामने वाले हिस्से में, वॉयस बॉक्स के ठीक नीचे होती है। तितली के आकार की इस ग्लैंड में छोटे-छोटे थैले होते हैं, जिन्हें फॉलिकल्स कहा जाता है। ये फॉलिकल्स थायराइड हार्मोन को स्टोर करके रखते हैं। जब थायराइड ग्रंथि जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है, तो हाइपरथायरायडिज्म कहा जाता है। वहीं, जब थायराइड पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाता, तो इसे हाइपोथायरायडिज्म कहते हैं। मेनोपॉज के दौरान थायराइड के कई लक्षण एक जैसे होने के कारण महिलाओं को इन्हें पहचानने में दिक्कत हो सकती है। क्या थायराइड के कारण मेनोपॉज में समस्याएं हो सकती हैं और इन्हें कैसे ठीक किया जा सकता है? ये जानने के लिए हमने दिल्ली स्थित PSRI Hospital में Senior Consultant, Endocrinology and Diabetology डॉ. हिमिका चावला से विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे महिलाओं की उम्र बढ़ती है, उनका एंडोक्राइन सिस्टम बदलता है। इससे महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म की संभावना बढ़ सकती है। मेनोपॉज के दौरान एक जैसे लक्षणों के कारण महिलाओं को हड्डियों, हार्ट और मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं।
मेनोपॉज और थायराइड के लक्षण क्या हैं?
डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, “हाइपोथायराइड, हाइपरथायराइड और मेनोपॉज के लक्षण काफी मिलते-जुलते हैं, इस वजह से महिलाएं अक्सर कन्फ्यूज हो जाती हैं। समय पर इलाज न कराने से कई बार जटिलताएं देखने को मिल सकती हैं। महिलाओं को हाइपोथायराइड और मेनोपॉज के लक्षणों की पहचान करना जरूरी है। जिन महिलाओं में खासतौर पर हाइपरथायरायडिज्म की समस्या होती है, उनके मेनोपॉज के लक्षण काफी हद तक एक जैसे हो सकते हैं।”
मेनोपॉज |
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मेनोपॉज में एस्ट्रोजन थायराइड को कैसे प्रभावित करता है?
Journal of Thyroid Research के अनुसार, एस्ट्रोजन ब्लड में थायरॉक्सिन-बाइंडिंग ग्लोब्युलिन के लेवल को बढ़ा सकता है। थायरॉक्सिन-बाइंडिंग ग्लोब्युलिन एक तरह का प्रोटीन है, जो थायराइड हार्मोन के लेवल को कम कर सकता है। इसके अलावा, एस्ट्रोजन सीधे तौर पर थायराइड के टिश्यू पर भी असर डाल सकता है। डॉ. हिमिका कहती हैं कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में थायराइड की समस्या ज्यादा देखी जा सकती है। थायराइड की समस्या रिप्रोडक्टिव उम्र में ही होने लगती है क्योंकि इस उम्र में हार्मोनल बदलाव होने लगते हैं। मेनोपॉज के दौरान महिलाओं में एस्ट्रोजन कम होने लगता है, जिसका असर थायराइड फंक्शन पर भी पड़ सकता है। इस वजह से महिलाओं में वजन बढ़ना और थकान जैसे लक्षण नजर आने लगते हैं और थायराइड हार्मोन में असंतुलन होने पर भी यही लक्षण होते हैं। इस वजह से कई बार मेनोपॉज के दौरान थायराइड की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
मेनोपॉज में हाशिमोटो थायराइड का असर
हाशिमोटो थायराइडाइटिस में इम्यून सिस्टम गलती से थायराइड ग्लैंड पर हमला कर देता है, जिससे सूजन हो जाती है। अधिकतर मामलों में, थायराइड ग्लैंड शरीर के लिए पर्याप्त हार्मोन नहीं बना पाती है। इससे मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और इस वजह से वजन बढ़ना, बालों का झड़ना और ठंड के प्रति सेंसेटिविटी बढ़ती है। डॉ. हिमिका कहती हैं, "मेनोपॉज के दौरान होनेे वाले हार्मोनल बदलाव हाशिमोटो के लक्षणों को और ज्यादा गंभीर बना सकते हैं। मेनोपॉज में आमतौर पर हॉट फ्लैशेज, मूड स्विंग्स, वजन बढ़ना, नींद पूरी न होना, मेटाबॉलिज्म में कमी और याददाश्त की समस्या हाशिमोटो के साथ मिलकर मरीज की कंडीशन को और ज्यादा मुश्किल बना देती है।

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क्या थायराइड की वजह से मेनोपॉज में जटिलताएं आ सकती हैं?
डॉ. हिमिका कहती हैं, "थायराइड की समस्या के कारण मेनोपॉज में महिलाओं को कई तरह की समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। थायराइड के कारण हार्ट से जुड़ी दिक्कतें और हड्डियों में कमजोरी होने का रिस्क बढ़ सकता है। इसलिए अगर किसी महिला को थायराइड की समस्या है और मेनोपॉज के दौर से गुजर रही है, तो उसे TSH टेस्ट जरूर कराना चाहिए।"
Deutsches Ärzteblatt International के अनुसार, हाइपरथायरायडिज्म में मेनोपॉज के दौरान जटिलताएं ज्यादा बढ़ सकती हैं क्योंकि हाइपरथायरायडिज्म और मेनोपॉज के लक्षण काफी मिलते-जुलते हैं और इस वजह से समय पर पहचान नहीं हो पाती है।
- हार्ट की समस्या - इस रिसर्च में बताया गया है कि जब महिलाओं की उम्र बढ़ने लगती है, तो थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (TSH) कम होने लगता है। अगर TSH लंबे समय तक कम रहे, तो पल्स रेट बढ़ सकता है। इससे हार्ट बीट अनियमित हो सकती है और हार्ट फेलियर का रिस्क बढ़ सकता है। इस रिसर्च में बताया गया कि अगर TSH का लेवल 10 mIU/L से ज्यादा होता है, तो कोरोनरी हार्ट डिजीज का रिस्क 1.89 गुना बढ़ सकता है।
- हड्डियों की परेशानी - जिन महिलाओं को हाइपरथायरायडिज्म होता है, उनमें हड्डियों की डेंसिटी कम होने लगती है, जिससे रीढ़ की हड्डी के फ्रैक्चर का रिस्क 3.57 गुना बढ़ सकता है। इस रिसर्च में बताया गया है कि मेनोपॉज के शुरुआती तीन सालों में महिलाओं की रीढ़ की हड्डी की डेंसिटी हर साल लगभग 2.5% तक कम हो सकती है।
मेनोपॉज में थायराइड टेस्ट कराना क्यों जरूरी है?
डॉ. हिमिका कहती हैं, "अगर किसी महिला को रेगुलर पीरियड्स नहीं होते और हॉट फ्लैशेस होने लगें, तो यह मेनोपॉज की शुरुआत हो सकती है। इस दौरान हर महिला को टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन मेनोपॉज कंफर्म करने के लिए FSH टेस्ट कराया जा सकता है। इसमें पता चलता है कि मेनोपॉज में FSH बढ़ने लगता है और एस्ट्रोजन कम होने लगता है। जिन महिलाओं को हाइपरथायरायडिज्म होता है, वे इसे चेक करने के लिए TSH टेस्ट करा सकती है।”
मेनोपॉज के दौरान थायराइड का क्या इलाज है?
डॉ. हिमिका कहती हैं, "मेनोपॉज के दौरान थायराइड को मैनेज करने के लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी या थायराइड की दवाइयां दी जा सकती है। हार्मोनल रिप्लेसमेंट थेरेपी सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए क्योंकि इससे यूटरस के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। गलत तरीके से इस्तेमाल करने पर ब्लड क्लॉट्स हो सकते हैं और लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क भी बढ़ सकता है। इसलिए हार्मोनल रिप्लेसमेंट थेरेपी कितने समय तक लेनी है, यह डॉक्टर मरीज की मेडिकल कंडीशन को देखते हुए सलाह देते हैं। थायराइड की दवाई आमतौर पर सुबह खाली पेट ली जाती है, ताकि हार्मोन का लेवल बेहतर तरीके से मैनेज हो सके। डॉक्टर TSH लेवल को देखकर ही मरीज की दवाई का डोज तय करते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि ज्यादातर थायराइड समस्याएं खासतौर पर हाइपोथायरायडिज्म को दवाइयों से लंबे समय तक मैनेज किया जाता है। मरीज की मेडिकल कंडीशन देखकर दवाइयां लेने की सलाह दी जाती है, ताकि लक्षणों में सुधार हो सके। इसके साथ महिलाओं को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि दवाई शुरू करने के बाद लक्षणों में सुधार आने में कई बार हफ्ते भी लग सकते हैं और साथ ही थायराइड की दवाई को बिना डॉक्टर की सलाह पर न छोड़ें क्योंकि दवाई छोड़ने पर लक्षण वापस आ सकते हैं।"
इसके अलावा, थायराइड का टेस्ट करने के लिए T3 और T4 हार्मोन टेस्ट कराने की सलाह दी जा सकती है। कुछ मामलों में ऑटोइम्यून थायराइड की संभावना होने पर थायराइड एंटीबॉडी टेस्ट भी कराए जा सकते हैं। दरअसल, कुछ मामलों में ऑटोइम्यून थायराइड डिजीज जैसे Hashimoto’s में शरीर थायराइड के खिलाफ एंटीबॉडी बनाता है। इसलिए थायराइड एंटीबॉडी टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है।
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर कोई महिला मेनोपॉज या थायराइड की समस्या से गुजर रही हैं, तो उन्हें डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए। अगर किसी महिला को थकान, हॉट फ्लैशेस, वजन बढ़ना और चिड़चिड़ापन बहुत ज्यादा होने लगे और ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, साथ ही पहले से थायराइड की समस्या है, तो डॉक्टर से मिलकर चेकअप जरूर कराना चाहिए। इसके अलावा, अगर थायराइड की फैमिली हिस्ट्री है, तो भी मेनोपॉज में ऐसे लक्षणों के लंबे समय तक रहने पर डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।
निष्कर्ष
मेनोपॉज और थायराइड के लक्षण काफी हद तक एक जैसे हो सकते हैं, इसलिए दोनों में फर्क कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। थकान, वजन बढ़ना और अनियमित पीरियड्स होने पर डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है। अगर थायराइड की समस्या का समय पर इलाज न हो, तो मेनोपॉज में हार्ट की बीमारियां और ऑस्टियोपोरोसिस का रिस्क बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। डॉक्टर की सलाह लेकर थायराइड के टेस्ट कराने चाहिए और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयां और डाइट लेना महत्वपूर्ण है। रोजाना कसरत करने से मेटाबॉलिज्म में सुधार होता है, जो हार्मोनल बैलेंस में मदद कर सकता है।
FAQ
क्या हाइपोथायरायडिज्म के कारण मेनोपॉज जल्दी शुरू हो सकता है?
वैसे तो दोनों के बीच सीधे तौर पर कोई संबंध स्पष्ट नहीं है, लेकिन दोनों के लक्षण और हार्मोनल बदलाव एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए जिन महिलाओं को थायराइड की समस्या है, उन्हें TSH और थायराइड एंटीबॉडी टेस्ट जरूर कराना चाहिए।अगर मुझे पहले कभी थायराइड नहीं रहा है, तो क्या मेनोपॉज के दौरान जांच करानी चाहिए?
अगर पहले से थायराइड नहीं है और 45 साल के बाद मेनोपॉज के लक्षण दिखाई देते हैं, तो थायराइड टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन अगर बिना वजह वजन बढ़ने लगे, हार्ट बीट अनियमित हो, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।थायराइड की वजह से पीरियड न आए तो क्या करें?
थायराइड के कारण पीरियड न आने पर तुरंत थायराइड प्रोफाइल टेस्ट (TSH, T3 और T4) करवाएं और एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह लेकर दवाई शुरू करें। इसके साथ डाइट में आयोडीन, सेलेनियम और जिंक से भरपूर फूड्स जरूर शामिल करें।पीरियड मिस होने के 3 महीने बाद भी टेस्ट नेगेटिव आए तो क्या समझें?
अगर तीन महीने तक पीरियड मिस रहे और टेस्ट नेगेटिव आए, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि प्रेग्नेंसी नहीं है, लेकिन इसका कारण PCOS, थायराइड की समस्या और गलत लाइफस्टाइल हो सकता है। ऐसी कंडीशन में डॉक्टर हार्मोन चेक करने के लिए ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की सलाह देते हैं।क्या थायराइड की दवा के साथ मेनोपॉज सप्लीमेंट्स लेना सुरक्षित है?
थायराइड की दवाई के साथ मेनोपॉज से जुड़े सप्लीमेंट्स लिए जा सकते हैं, लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि थायराइड की दवाई सुबह खाली पेट लें। दवाई लेने के कम से कम आधे घंटे तक कुछ न खाएं और पिएं और कैल्शियम जैसे सप्लीमेंट दवाई लेने के कम से कम चार से पांच घंटे बाद ही लें।
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Current Version
Apr 14, 2026 13:05 IST
Modified By : Aneesh Rawat Apr 14, 2026 13:05 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Himika Chawla