पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस प्रसव के बाद यानी शिशु के जन्म के बाद महिला को होने वाली समस्या है। यह थायरॉइड ग्लैंड की सूजन से संबंधित समस्या है। Cleveland Clinic की मानें, तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस गर्भावस्था के पहले वर्ष के भीतर लगभग 5-10 महिलाओं को प्रभावित करता है। हालांकि, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के मामले कम देखने को मिलते हैं। इसके बावजूद यह जरूरी है कि हर किसी को इस बीमारी के बारे में पता हो। इस लेख में दिए गए सभी तथ्यों की पुष्टि खुद दिल्ली स्थित PSRI hospital में Senior Consultant Endocrinology and Diabetology डॉ. हिमिका चावला ने की है।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस क्या है?
बच्चे को जन्म देने के बाद महिला के थायरॉइड ग्लैंड में आई सूजन को हम पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के नाम से जानते हैं। डॉ हिमिका के अनुसार इसे तीन चरणों में विभाजित किया जाता है। इसके विभिन्न चरणों को समझने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि थायरॉइड क्या है? थायरॉइड तितली के आकार का छोटा सा ग्लैंड है, जो गर्दन के सामने के निचले हिस्से में स्थित है। यह हार्मोन रिलीज करता है, जिसकी वजह से हमारा शरीर सुचारू ढंग से काम करने में सक्षम होता है। जब इसमें दिक्कत आ जाती है तो सभी तरह से हार्मोन रिलीज नहीं हो पाते हैं और शरीर के कई फंक्शन प्रभावित होने लगता हैं। बहरहाल, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। जो डिलीवरी के बाद पहले साल में महिलाओं को प्रभावित करती है। पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस साइलेंट समस्या है और 50% महिलाओं में यह बिना किसी गंभीर लक्षण के होकर गुजर जाती है, लेकिन भविष्य में उन्हें स्थायी हाइपोथायरायडिज्म का खतरा बना रहता है।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के चरण
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- चरण-1ः इस चरण को हाइपरथायरायडिज्म कहा जा सकता है। इसमें थायरॉइड ग्लैंड में सूजन के कारण हार्मोन स्राव बढ़ जाता है। यह स्थिति आमतौर पर डिलीवरीके एक से छह महीने के अंदर होने लगती है। विशेषज्ञों की मानें, तो यह कंडीशन एक सप्ताह से तीन महीनों तक बनी रह सकती है।
- चरण-2ः इसे हम हाइपोथायरायडिज्म के नाम से जानते हैं। इस चरण में प्रसव के बाद महिलाओं का थायरॉइड ग्लैंड बहुत कम मात्रा में हार्मोन रिलीज करता है। अमूमन इस तरह की स्थिति डिलीवरी के चार से आठ महीने बाद शुरू होती है और यह साल भर के लिए बनी रह सकती है।
- चरण-3ः पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का तीसरा चरण एक तरह से सामान्य होता है। इसका मतलब है कि थायरॉइड ग्लैंड एक बार फिर सामान्य हार्मोन रिलीज कर देता है।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के कारण
American Thyroid Association के अनुसार, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस ऑटोइम्यून इंफ्लेमेशन के कारण होने वाली समस्या है। जैसा कि पहले भी बताया गया है कि यह बीमारी प्रसव के बाद इम्यून सिस्टम के फिर से एक्टिव होने के कारण शुरू होती है। हालांकि, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने के पीछे कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं, जैसे-
- ऑटोइम्यून रिबाउंडः डॉ हिमिका कहती हैं, "प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर के ज्यादातर अंगों पर दबाव बनने लगता है। इसी वजह से महिलाओं को कई तरह की शारीरिक समस्याएं होने लगती हैं। इसी तरह, गर्भावस्था में भ्रूण को सपोर्ट करने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली भी दब जाती है। वहीं, डिलीवरी के बाद यह सामान्य स्थिति में लौट आती है, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली रिबाउंड हो जाती है यानी तेजी से सक्रिय हो जाती है। नतीजतन, थायरॉइड ग्लैंड सही तरह से काम नहीं कर पाता है। ऐसे में हाइपरथायरॉइडिज्म और हाइपोथायरायडिज्म जैसी कंडीशन पैदा हो जाती है।"
- एंटी-थायरॉयड एंटीबॉडीज का पहले से मौजूद होनाः डॉ हिमिका आगे बताती हैं, गर्भावस्था से पहले या शुरुआती दौर में एंटी-थायरॉयड एंटीबॉडीज की मौजूदगी भी इस बीमारी का एक संकेत है।
- ऑटोइम्यून बीमारियों का इतिहासः डॉ हिमिका की मानें, तो जिन महिलाओं को टाइप 1 डायबिटीज या अन्य किस्म के ऑटोइम्यून डिजीज हैं, उन्हें भी पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने का जोखिम बना रहता है।
- मेडिकल हिस्ट्रीः यदि किसी महिला को पहले भी कभी पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस या थायरॉइड संबंधी समस्या रही हो, तो अगली प्रेग्नेंसी के बाद दोबारा इस समस्या के होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के लक्षण
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चूंकि, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस थायरॉइड ग्लैंड में आई अस्थायी सूजन है। आमतौर पर यह समस्या 1-6 माह बाद भी हो सकती है। इसलिए, इसके हर चरण में कुछ एक जैसे और कुछ बिलकुल अलग नजर आ आते हैं। इस लेख में हम चरणों के अनुसार लक्षणों का जिक्र करेंगे-
हाइपरथायरॉइड फेज (शुरुआती 1 से 4 महीने में)
- एंग्जाइटी, चिड़चिड़ापन और नर्वसनेस होना
- हार्ट रेट तेज होना
- अचानक वजन घटना
- बहुत ज्यादा गर्मी लगना और पसीना आना
- हाथ-पांव में कंपकंपी छूटना
- नींद न आना या इंसोम्निया
हाइपोथायरॉइड फेज (पोस्ट डिलीवरी 4 से 8 महीने में)
- थकान और कमजोरी महसूस करना
- एनर्जी का स्तर कम होना
- वजन बढ़ना
- कब्ज होना
- ठंड बहुत ज्यादा लगना
- त्वचा ड्राई होना
- बालों का झड़ना
- मसल्स में दर्द होना
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का शरीर पर असर
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पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस एक ऐसी कंडीशन है, जो 12-18 महीनों में अपने आप ठीक हो जाती है। इसके बावजूद, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह समस्या महिलाओं के शरीर को कई तरह से प्रभावित सकती है, जैसे-
मानसिक स्वास्थ्य पर असरः आमतौर पर पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने पर हम शारीरिक स्वास्थ्य की बात अधिक करते हैं, जबकि यह महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। डॉ. हिमिका चावला की मानें, तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस एंग्जाइटी, डिप्रेशन और बहुत ज्यादा थकान जैसी चीजों से भी संबंध रखता है। ज्यादातर महिलाएं इस स्थिति को पोस्टपार्टम फटीग से जोड़कर देखती हैं। ऐसे में उनका ट्रीटमेंट भी देरी से शुरू होता है। यह कंडीशन सही नहीं है।
शारीरिक स्वास्थ्य पर असरः यह सच है कि हमें पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने पर मानसिक स्वास्थ्य पर भी बात करनी चाहिए, लेकिन शारीरिक स्वास्थ्य पर असर गहरा असर पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें, तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने पर महिलाओं को शुरुआती दिनों में हाइपरथायरॉइडिज्म या थायरोटॉक्सिक फेज (शरीर में थायरॉइड हार्मोन (T3/T4) की अधिकता से होने वाली स्थिति है, जिससे मेटाबॉलिज्म तेज हो जाता है) में वजन कम होना, हार्ट रेट बढ़ना, हाथ कांपना, घबराहट और गर्मी बर्दाश्त न कर पाना जैसे लक्षण दिखते हैं। जैसी परेशानियां होने लगती हैं।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का निदान
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के निदान के लिए डॉक्टर सबसे पहले शरीर में नजर आ रहे लक्षणों पर बात करते हैं। अगर लक्षण पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस से मिलते-जुलते हों, तो ब्लड में थायरॉइड हार्मोन (T3, T4 या TSH) के स्तर की जांच करने के लिए ब्लड टेस्ट की सलाह दी जाती है। आमतौर पर पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट पर्याप्त होता है। हां, कई बार पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के लक्षण किसी अन्य बीमारी से मिलते-जुलते हो सकते हैं।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का इलाज
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का ट्रीटमेंट इसके विभिन्न चरणों पर आधारित होता है। इसके तहत अनियमित हार्ट बीट को संतुलित करने की कोशिश की जाती है और कई बार हार्मोन रिप्लेसमेंट की भी मदद ली जाती है। यहां आगे जानते हैं पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के ट्रीटमेंट के बारे में-
हाइपरथायरॉइड चरणः आमतौर पर इस चरण में मरीज को इलाज की जरूरत नहीं होती है। इसके लक्षण अपने आप कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं। इसमें हार्ट पैल्पिटेशन (धड़कन तेज होना), एंग्जाइटी, थकान और कमजोरी आदि शामिल हैं। हालांकि, कई बार स्थितियां अपने आप नियंत्रित नहीं होती हैं। ऐसे में डॉक्टर मरीज को कुछ दवा परामर्श के तौर पर देते हैं।
हाइपोथायरॉइड चरणः यह अवस्था 4 से 8 माह के बीच नजर आने लगती है। इस स्थिति में अगर किसी महिला के लक्षण गंभीर हो जाते हैं, तो उन्हें हार्मोन रिप्लेसमेंट करवाने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा, इस चरण में टीएसएच का स्तर भी देखा जाता है।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के इलाज के दौरान किन बातों का ध्यान रखें
- वैसे तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का इलाज कितना लंबा चलेगा, यह मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस में जो भी लक्षण नजर आते हैं, उनसे उबरने पर जोर दिया जाता है।
- पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के इलाज के बाद TSH और T4 के स्तर को मॉनिटर करने की जरूरत होती है। कम से कम एक साल तक के लिए यह अनिवार्य होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ महिलाओं में पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने के बाद यह स्थायी भी हो जाता है।
- जो महिलाएं ब्रेस्टफीड करा रही हैं, उन्हें भी अपनी कंडीशन पर विशेष नजर रखनी चाहिए। वैसे तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस की दवाएं लेना ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पूरी तरह सेफ होता है। इसके बावजूद, अगर शरीर में कोई अन्य लक्षण दिखे तो मरीज को डॉक्टर से अपनी कंडीशन का जिक्र करना चाहिए।
- कुछ गंभीर मामलों में देखा जाता है कि थायरॉइड ग्लैंड में आई सूजन कम नहीं होती है, तो स्टेरॉयड यूज किए जाते हैं। अगर किसी के साथ ऐसा हो, तो उन्हें भी पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।
क्या पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस स्थायी है?
Cleveland Clinic की मानें, तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस स्थायी समस्या नहीं है। लगभग 70 से 80 प्रतिशत मामलों में महिलाओं की कंडीशन पूरी तरह सही हो जाती है और दवा की भी जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसा इसलिए क्योंकि समय के साथ-साथ थायरॉइड ग्लैंड पर्याप्त मात्रा में थायरॉइड हार्मोन रिलीज करने लगता है। वहीं, अगर हम बाकी बचे 20-30 फीसदी लोगों की बात करें, तो उनमें यह समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है या ताउम्र ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ सकती है। यह पूरी तरह समस्या की गंभीरता पर निर्भर करता है।
क्या पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस अगली प्रेग्नेंसी को प्रभावित करता है?
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पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस अगली प्रेग्नेंसी को काफी गहराई से प्रभावित कर सकता है। डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, "जिन महिलाओं को एक बार यह समस्या हो चुकी है, उनमें अगली डिलीवरी के बाद इसके दोबारा यह समस्या होने की संभावना होती है। हालांकि यह स्थिति आमतौर पर अस्थायी होती है, लेकिन कुछ मामलों में यह स्थायी हाइपोथायरायडिज्म का रूप ले लेती है। यही नहीं, अगर अगली प्रेग्नेंसी में महिला का थायरॉयड लेवल संतुलित नहीं है, तो यह गर्भपात या भ्रूण के विकास में भी बाधा आ सकती है। ऐसे में पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस से गुजर रही महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे डॉक्टर की दी हुई सलाह के बाद ही प्रेग्नेंसी प्लान करें और गर्भावस्था के दौरान नियमित रूप से TFT (Thyroid Function Test) करवाते रहना चाहिए। इससे स्वास्थ्य पर नजर राखी जा सकती है।
पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के लिए कब जाएं डॉक्टर के पास
कई बार देखने में आता है कि पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने के बावजूद महिलाओं को इसके शुरुआती लक्षणों का पता नहीं चलता है और समय के साथ-साथ यह समस्या अपने आप ठीक हो जाती है। फिर भी डॉक्टर यह सलाह देते हैं कि पोस्ट डिलीवरी हर महिला को अपनी सेहत पर विशेष नजर रखनी चाहिए। अगर परिवार में पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का इतिहास रहा है, तो महिलाओं को और भी सजग होना चाहिए। जहां तक सवाल इस बात का है कि पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के लिए डॉक्टर के पास जाने का सही समय क्या है? इस बारे में डॉक्टर बताते हैं कि अगर डिलीवरी के बाद शुरुआती महीनों में महिलाएं अक्सर थकान, कमजोरी, ऊर्जा की कमी महसूस करती हैं, तो उन्हें एक बार पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस की जांच करवा लेनी चाहिए। इसके अलावा, जिन महिलाओं को प्री-डायबिटीज या थायरॉइड रहा है, उनके लिए भी स्क्रीनिंग करवाना फायदेमंद होता है। American Thyroid Association के अनुसार जिन महिलाओं को टाइप 1 डायबिटीज है, उनमें पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने की संभावना 25% तक बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
यूं तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस जैसी समस्याएं दुर्लभ मामलों में देखने को मिलती हैं। फिर भी हमें किसी भी बीमारी के प्रति लापरवाही नहीं करनी चाहिए और न ही शरीर में नजर आ रहे लक्षणों को इग्नोर करना चाहिए। ऐसा ही पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के साथ भी है। अगर किसी महिला को पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का इतिहास रहा है या परिवार में इसकी हिस्ट्री रही है, तो उन्हें और भी सावधानी बरतनी चाहिए और जरूरत अनुसार डॉक्टर के पास नियमित रूप से जांच करवाने के लिए जाना चाहिए।
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FAQ
क्या पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस स्थायी है?
लगभग 80 फीसदी महिलाओं के लिए पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस अस्थायी है यानी प्रसव के 12 से 18 महीनों के भीतर थायरॉयड फंक्शन नॉर्मल हो जाता है। हालांकि, कुछ महिलाओं में यह समस्या स्थायी हाइपोथायरायडिज्म का रूप ले सकती है।क्या पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस में स्तनपान कराना सेफ होता है?
डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस में स्तनपान कराना सेफ होता है। हालांकि इस संबंध में विस्तार से जानने के लिए डॉक्टर से सीधे संपर्क करना सही होता है। डॉक्टर सुरक्षित दवा और सही डोज की जानकारी देते हैं।थायरॉइड बढ़ने से क्या दिक्कत होती है?
थायरॉइड बढ़ने से कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, जैसे मेटाबॉलिज्म बहुत तेज हो सकता है, जिससे तेजी से वजन घट सकता है। इसके अलावा, दिल की धड़कनों का बढ़ना, बहुत ज्यादा पसीना आना, नींद न आना, मांसपेशियों में कमजोरी आना, गर्दन में सूजन आना आदि। कभी-कभी ये सामान्य-सी लगने वाली समस्याएं गंभीर भी हो सकती हैं।थायरॉइड किसकी कमी से हो जाता है?
शरीर में आयोडीन की कमी के कारण थायरॉइड जैसी समस्या हो सकती है। इसके अलावा, यह ऑटोइम्यून डिजीज है, इसलिए खराब जीवनशैली, तनाव, थायरॉइड ग्लैंड में सूजन, आनुवंशिक जैसे कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। माना जाता है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह समस्या अधिक आम है।थायरॉइड की जांच कब करानी चाहिए?
थायराइड टेस्ट (टी3, टी4, टीएसएच) सुबह के समय खाली पेट कराने की सलाह दी जाती है। वैसे तो इस तरह के टेस्ट की सलाह डॉक्टर ही देते हैं। हां, अगर किसी का वजन तेजी से बढ़ रहा है और रोजमर्रा के काम करने में थकान और कमजोरी महसूस होती है और महिलाओं के पीरियड्स अनियमित होते हैं, तो आप खुद भी थायरॉइड की जांच करवा सकते हैं। इसके अलावा, अधिक उम्र वालों को भी हर एक-दो साल में थायरॉइड का टेस्ट करवाना चाहिए।
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Apr 07, 2026 19:07 IST
Modified By : Meera Tagore Apr 07, 2026 19:07 IST
Modified By : Meera TagoreApr 07, 2026 19:07 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Himika Chawla