Fri Sep 11, 2026 | 07:29 PM IST

Medically Reviewed by Dr Himika Chawla , Senior Consultant – Endocrinology & Diabetology

स्मोकिंग से थायराइड पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर से जानें

स्मोकिंग करने से थायराइड पर क्या असर पड़ सकता है? इस लेख में डॉक्टर ने विस्तार से स्मोकिंग से थायराइड की दवाइयों  का प्रभाव, ब्लड टेस्ट रिपोर्ट और थायराइड कैंसर के बारे में बताया है। 

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स्मोकिंग करना शरीर के लिए नुकसानदायक है और अगर किसी को थायराइड की बीमारी है, तो स्मोकिंग इसके लक्षणों को और ज्यादा बढ़ा सकती है। PLOS One के 2019 जर्नल में चीन के प्रमुख शहरों के 15 हजार से ज्यादा लोगों पर स्मोकिंग से होने वाले थायराइड के असर को जांचने के लिए स्टडी की गई। इस रिसर्च में पाया गया कि जो लोग रेगुलर स्मोकिंग करते हैं, उनमें TSH का लेवल उन लोगों के मुकाबले काफी कम था, जिन्होंने कभी स्मोकिंग नहीं की। TSH कम होने से यह थायराइड के लक्षणों को बढ़ा सकता है, इसलिए यह अच्छा संकेत नहीं है। स्मोकिंग करने वालों में थायराइड पेरोक्सीडेज एंटीबॉडी (TPOAb) और थायरोग्लोबुलिन एंटीबॉडी का लेवल भी कम पाया गया। इसमें रोजाना पी जाने वाली सिगरेट की मात्रा भी मायने रखती है। रिसर्च में सामने आया है कि जिन लोगों ने ज्यादा समय तक स्मोकिंग की थी, उनमें TSH और TPOAb का स्तर उतना ही कम पाया गया। यह ध्यान रखना चाहिए कि एंटीबॉडी कम होना किसी बीमारी के कम होने का संकेत नहीं है। इसलिए हमने दिल्ली स्थित PSRI Hospital में Senior Consultant, Endocrinology and Diabetology डॉ. हिमिका चावला से जाना कि स्मोकिंग से थायराइड मरीजों को कितना नुकसान पहुंचता है और इससे बचाव के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

स्मोकिंग का थायराइड पर क्या असर पड़ सकता है?

डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, “सिगरेट के धुएं में साइनाइड मौजूद होता है, जो शरीर में थायोसायनेट में बदल जाता है और यह प्रोसेस थायराइड ग्रंथि द्वारा आयोडीन के अवशोषण को कम कर देती है। इसके अलावा, जो लोग स्मोकिंग करते हैं, ऐसे कुछ मामलों में थायराइड हार्मोन का लेवल बढ़ सकता है, जिस वजह से दिमाग की पिट्यूटरी ग्रंथि TSH का प्रोडक्शन कम कर देती है। स्मोकिंग करने वाले लोगों में टी-सेल्स और नेचुरल किलर सेल्स पर भी असर पड़ता है। स्मोकिंंग करने वाले लोगों में माइल्ड हाइपरथायरॉडिज्म जैसा पैटर्न बन सकता है। इसलिए जो लोग स्मोकिंग करते हैं और उन्हें थायराइड की समस्या है, तो ऐसी कंडीशन में जब थायराइड का टेस्ट कराया जाता है, उससे पहले डॉक्टर को यह जानकारी होना जरूरी है कि मरीज स्मोकिंग करता है या नहीं। इससे डॉक्टर को TSH की रिपोर्ट समझने में आसानी होती है। हालांकि, थायराइड के मरीजों को स्मोकिंग से परहेज करना चाहिए।”

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क्या स्मोकिंग ब्लड टेस्ट रिपोर्ट को प्रभावित कर सकती है?

डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, "जो लोग स्मोकिंग करते हैं, उनके न सिर्फ फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है, बल्कि थायराइड पर भी असर पड़ता है। थायराइड के स्मोकिंग वाले मरीजों का जब ब्लड टेस्ट किया जाता है, तो उसमें थायराइड हार्मोन जैसे FT4 और FT3 का लेवल बढ़ा हुआ पाया जा सकता है, जबकि TSH का लेवल कम आ सकता है। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि स्मोकिंग छोड़ने पर भी TSH बढ़ा हुआ आ सकता है, इसलिए कहा जा सकता है कि थायराइड के मरीजों पर स्मोकिंग का असर काफी समय तक रह सकता है।"

क्या स्मोकिंग से थायराइड कैंसर का रिस्क बढ़ सकता है?

Endocrinology and Metabolism रिसर्च में 24 अध्ययनों को शामिल किया गया है। इस रिसर्च के अनुसार, आमतौर पर स्मोकिंग को कैंसर का कारण माना जाता है, लेकिन थायराइड के मामले में ऐसा नहीं होता। इस रिसर्च में बताया गया है कि स्मोकिंग करने वाले लोगों में 12 तरह के कैंसर हो सकते हैं, लेकिन स्मोकिंग और थायराइड कैंसर के संबंध को लेकर वैज्ञानिकों में मतभेद रहा है। हालांकि, कुछ अध्ययनों में यह रिस्क कम देखा गया है, लेकिन यह निष्कर्ष अभी स्पष्ट नहीं है। स्मोकिंग से गले, मुंह और फेफड़ों के कैंसर का रिस्क काफी बढ़ जाता है। इस बारे में डॉ. हिमिका कहती हैं, "सिर्फ स्मोकिंग करने से थायराइड कैंसर नहीं हो सकता, बल्कि थायराइड कैंसर होने के कई और भी कारण होते हैं, जिसमें थायराइड की बीमारी को सही तरीके से मैनेज न करना, लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव हो सकते हैं। थायराइड के मरीजों को मैं हमेशा यह सलाह देती हूं कि उन्हें इस बीमारी की अनदेखी नहीं करनी चाहिए और न ही घरेलू उपचारों से इसे मैनेज करने की कोशिश करनी चाहिए, बल्कि समय पर डॉक्टर से सलाह लेकर इलाज कराएं। इससे थायराइड कैंसर का रिस्क काफी हद तक कम हो सकता है।"

स्मोकिंग का थायराइड की दवाइयों पर असर

डॉ. हिमिका कहती हैं, "स्मोकिंग से शरीर के मेटाबॉलिज्म और थायराइड हार्मोन दोनों पर असर पड़ता है और जो लोग थायराइड की दवाई लेते हैं, उन पर भी स्मोकिंग का असर पड़ता है। स्मोकिंग करने वाले लोगों में दवाई का असर कम होता है क्योंकि स्मोकिंग के कारण शरीर के हार्मोन का लेवल स्टेबल नहीं रहता और यह दवाई के असर को कम करता है। कई मामलों में स्मोक करने वाले लोगों को दवाई की ज्यादा खुराक देने की जरूरत होती है। स्मोकिंग करने वाले लोगों को रेगुलर थायराइड चेकअप की जरूरत होती है। और अगर किसी ने दवाई लेते समय स्मोकिंग छोड़ दी है, तो भी डॉक्टर को बताना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉक्टर मरीज की कंडीशन को देखते हुए दवाई की खुराक कम या ज्यादा कर सकते हैं।”

क्या स्मोकिंग से थायराइड में आंखों पर असर हो सकता है?

Kansas Journal of Medicine में बताया गया कि थायराइड आई डिजीज ऐसी कंडीशन है, जिसमें आंखें बाहर की ओर उभरने लगती हैं, सूजन होने लगती है और दो-दो दिखने लगता है। इस रिसर्च में बताया गया है कि स्मोकिंग थायराइड आई डिजीज (TED) को ज्यादा गंभीर कर सकती है। रिसर्च में कहा गया है कि स्मोकिंग न करने वालों के मुकाबले स्मोकिंग करने वालों की आंखों के उभार में कम सुधार देखा गया है। जो लोग स्मोक नहीं करते, उनकी तुलना में स्मोक करने वालों की आंखों में सूजन और दर्द ज्यादा देखा गया है। जो लोग रेगुलर स्मोक करते हैं, उनमें टाइप-2 TED पाया गया है। डॉ. हिमिका कहती हैं कि थायराइड आई डिजीज (TED) से बचाव के लिए लोगों को स्मोकिंग से परहेज करना बहुत जरूरी है।

ऑटोइम्यून थायराइड बीमारी में स्मोकिंग का असर

डॉ. हिमिका कहती हैं, "जिन लोगों को हाशिमोटो बीमारी होती है, उनमें इम्युनिटी सिस्टम थायराइड पर ही हमला करने लगता है। जो लोग स्मोकिंग करते हैं, उनमें हाशिमोटो से गॉयटर (Goiter) की बीमारी होने का रिस्क बढ़ सकता है। इसी तरह से जिन लोगों को ग्रेव्स डिजीज की बीमारी होती है और वे स्मोक करते हैं, उनमें यह बीमारी होने की संभावना दोगुनी हो सकती है। यंग महिलाओं और बुजुर्गों में स्मोकिंग के कारण थायराइड ग्रंथि बढ़ने का रिस्क काफी ज्यादा बढ़ जाता है।”

पैसिव स्मोकिंग का थायराइड पर असर

International Journal of Clinical Biochemistry and Research के अनुसार, एक्टिव और पैसिव दोनों ही तरह की स्मोकिंग थायराइड हार्मोन के बैलेंस को बिगाड़ सकती है। पैसिव स्मोकिंग का मतलब है कि जो लोग स्मोकिंग करने वालों के साथ खड़े होते हैं, लेकिन वे स्मोक नहीं करते। सिगरेट के धुएं से थायोसाइनेट निकलता है, जिसे पैसिव स्मोकर भी सांस के जरिए अंदर लेता है। थायोसाइनेट की वजह से शरीर में मौजूद आयोडीन के इस्तेमाल को रोकता है। अगर शरीर में पहले से आयोडीन की कमी हो, तो यह गोयटर का कारण बन सकता है।

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वेपिंग या ई-सिगरेट का थायराइड पर असर

डॉ. हिमिका कहती हैं, "वेपिंग या ई-सिगरेट में मौजूद निकोटिन थायराइड हार्मोन के लेवल में बदलाव हो सकते हैं। अगर किसी को पहले से थायराइड से जुड़ी ऑटोइम्यून बीमारी है, तो वेपिंग इसे और अधिक गंभीर बना सकती है।इसलिए स्मोकिंग, चाहे वह सिगरेट हो या वेपिंग, थायराइड के लक्षणों को बढ़ा सकती है। इसलिए स्मोकिंग से दूर रहना ही सबसे बेहतर है।”

हाइपरथायरायडिज्म या हाइपोथायरायडिज्म - स्मोकिंग किसे ज्यादा प्रभावित करता है?

डॉ. हिमिका कहती हैं कि हाइपरथायरायडिज्म में स्मोकिंग के कारण ग्रेव्स बीमारी होने का रिस्क बढ़ सकता है। इससे कई भी थायराइड रोगियों को आंखों की बीमारियां होने का खतरा बढ़ सकता है। हाइपरथायरायडिज्म से पीड़ित धूम्रपान करने वाले मरीजों पर दवाओं का असर कम होता है और बीमारी के दोबारा लौटने की संभावना अधिक होती है।
डॉ. हिमिका ने हाइपोथायरायडिज्म में स्मोकिंग का असर थोड़ा अलग दिख सकता है। स्मोकिंग TSH के लेवल को कम कर सकती है और T3 से T4 के रेश्यो को बढ़ा सकती है। इस वजह से हाइपोथायरायडिज्म के लक्षणों की पहचान करना मुश्किल हो सकता है।

स्मोकिंग छोड़ने पर थायराइड की बीमारी कम हो सकती है?

Sage Journals की रिपोर्ट में बताया गया कि एक 64 साल के पुरुष लंबे समय तक स्मोकिंग कर रहे थे, उन्हें ग्रेव्स डिजीज था। इस रिसर्च में बताया गया है कि उनका इलाज दो साल तक चला। जब मरीज का हाइपोथायरायडिज्म कम होने लगा, तो दवाई बंद कर दी और इसके बाद स्मोकिंग छोड़ने का फैसला किया। स्मोकिंग छोड़ने के एक महीने बाद उनका थायराइड लेवल नॉर्मल था, लेकिन चार महीने बाद उन्हें गंभीर हाइपोथायरायडिज्म हो गया। हालांकि यह अकेला मामला है, लेकिन इससे पता चलता है कि स्मोकिंग छोड़ने के पहले साल ऑटोइम्यून हाइपोथायरायडिज्म होने का रिस्क सात गुना तक बढ़ सकता है। इसकी वजह स्मोकिंग छोड़ने पर शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का जरूरत से ज्यादा बढ़ना, आयोडीन का शरीर में बढ़ना और इम्यून रिस्पांस एक्टिव होने के कारण थायराइड ग्लैंड में सूजन आना है। डॉ. हिमिका के अनुसार आमतौर पर स्मोकिंग छोड़ना थायराइ़ड के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन इस दौरान डॉक्टर की निगरानी जरूरी है।

डॉक्टर से कब मिलें?

अगर थायराइड का इलाज समय पर न हो, तो मरीज को कई जटिलताएं हो सकती हैं, इसलिए लक्षणों की पहचान करना बहुत जरूरी है। अगर किसी को ये लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए।

  1. तेजी से वजन बढ़ना या कम होना
  2. वजन कम होने या बढ़ने में दिक्कत महसूस होना
  3. स्किन बहुत ज्यादा ड्राई होने लगे
  4. कब्ज या डायरिया की समस्या बहुत ज्यादा हो
  5. पसीना बहुत ज्यादा आना
  6. बहुत ज्यादा चिड़चिड़ापन आने लगे
  7. डिप्रेशन महसूस होना

निष्कर्ष

स्मोकिंग थायराइड फंक्शन को प्रभावित करने वाले मुख्य कारणों में से एक है, जो हार्मोनल बैलेंस, इम्यून सिस्टम और दवाइयों के असर को कम सकता है। स्मोकिंग से थायराइड के लक्षणों में भी तेजी आ सकती है, इसलिए डॉक्टर मरीजों को स्मोकिंग न करने की सलाह देते हैं। इसके साथ थायराइड के लक्षणों पर भी नजर रखनी चाहिए ताकि समय पर डॉक्टर थायराइड को मैनेज करने के लिए दवाइयां दे सकें।

FAQ

  • क्या स्मोकिंग से थायराइड कैंसर हो सकता है?

    सिर्फ स्मोकिंग को थायराइड कैंसर का मुख्य कारण नहीं माना गया है, लेकिन यह गले, मुंह और फेफड़ों के कैंसर के रिस्क को बहुत बढ़ा देता है।
  • स्मोकिंग छोड़ने के बाद TSH लेवल क्यों बदल जाता है

    स्मोकिंग छोड़ने पर शरीर का मेटाबॉलिज्म और इम्यून सिस्टम बदलता है, जिससे TSH का स्तर बढ़ सकता है। इसलिए डॉक्टर दवा को एडजस्ट करते हैं।
  • क्या स्मोकिंग करने वालों को थायराइड की दवा ज्यादा लेनी पड़ती है?

    वैसे तो यह मरीज की मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करता है, लेकिन आमतौर पर स्मोकिंग करने वाले लोगों को दवा ज्यादा लेनी पड़ती है, क्योंकि स्मोकिंग दवा के अवशोषण और हार्मोन के संतुलन को प्रभावित करती है। इस वजह से दवा की ज्यादा खुराक लेनी पड़ सकती है।
  • क्या स्मोकिंग छोड़ने के तुरंत बाद थायराइड ठीक हो जाता है?

    स्मोकिंग छोड़ने से थायराइड की कंडीशन में सुधार होता है, लेकिन शुरुआत में हार्मोन का स्तर अस्थिर हो सकता है। निकोटीन छोड़ने के बाद शरीर को एडजस्ट होने में कुछ समय लगता है, इसलिए डॉक्टर की निगरानी जरूरी है।

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Aneesh Rawat

Aneesh Rawat

Chief Sub Editor

अनीश रावत को हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 16+ साल का अनुभव है। फिलहाल जागरण न्यू मीडिया के Onlymyhealth में चीफ सब एडिटर हैं। महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, मेडिटेशन और योग पर Research based, doctor verified और SEO फ्रेंडली लेख लिखने में विशेषज्ञ हैं। न्यूज 24, ऑल इंडिया रेडियो और ThinkRight मेडिटेशन ऐप जैसे भरोसेमंद platforms पर काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Apr 15, 2026 19:26 IST

    Modified By : Aneesh Rawat
  • Apr 15, 2026 19:26 IST

    Published By : Aneesh Rawat
    Reviewed By : Dr Himika Chawla

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