Cleveland Clinic के अनुसार, थायराइड छोटी तितली के आकार की ग्लैंड है, जो गर्दन के सामने स्किन के ठीक नीचे की तरफ होता है। यह एंडोक्राइन सिस्टम का हिस्सा है, जो दो तरह के हार्मोन बनाती है। इसमें थायरोक्सिन (T4) और ट्रायोडोथायरोनिन (T3) शामिल हैं। अगर कम या ज्यादा हार्मोन बनते हैं, तो थायराइड की समस्या होने लगती है। थायराइड के मरीजों में नींद पूरी न होना एक आम समस्या है। वहीं, जो लोग पर्याप्त नींद नहीं लेते, उनमें थायराइड होने का रिस्क भी बढ़ सकता है। थायराइड और नींद की कमी होना, दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन मरीज इसे लक्षण के तौर पर पहचान नहीं पाते। नींद पूरी न होने से थायराइड में क्या समस्याएं आ सकती हैं और इससे बचाव के क्या उपाय हो सकते हैं, जानने के लिए हमने PSRI Hospital की Senior Consultant, Endocrinology and Diabetology डॉ. हिमिका चावला से विस्तार से बात की।
थायराइड कैसे काम करता है?
डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, “शरीर को थायराइड हार्मोन बनाने के लिए कभी ज्यादा तो कभी कम हार्मोन की जरूरत होती है। हार्मोन कितने बनाने हैं, उसके लिए थायराइड ग्लैंड को पिट्यूटरी ग्लैंड की जरूरत पड़ती है। पिट्यूटरी ग्लैंड दिमाग का वह हिस्सा है, जो शरीर के कई प्रोसेस को कंट्रोल करती है। यह थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (TSH) का इस्तेमाल करके इस बात को नियंत्रित करती है कि थायराइड ग्लैंड ब्लड फ्लो में कितने हार्मोन छोडे़गी। ब्लड में मौजूद थायराइड हार्मोन प्रोटीन से जुड़े होते हैं। जब इनकी जरूरत होती है, तो T3 और T4 सेल्स ब्लड फ्लो में रिलीज हो जाते हैं। जब इनकी मात्रा ज्यादा या कम होने लगती है, तो थायराइड की समस्या होने लगती है। थायराइड तीन प्रकार में बांटा गया है। जब थायराइड ग्लैंड पर्याप्त मात्रा में थायराइड हार्मोन नहीं बना पाती है, तो इसे हाइपोथायरायडिज्म कहा जाता है। इससे मेटाबॉलिज्म का प्रोसेस धीमा हो जाता है। जब थायराइड ग्लैंड जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगता है, तो हाइपरथायरायडिज्म कहा जाता है। इसमें मरीज का मेटाबॉलिज्म तेज हो जाता है और अचानक से वजन कम होने लगता है। तीसरा थायराइड ऑटोइम्यून है, जिसे हाशिमोटो रोग (Hashimoto’s disease) कहते हैं। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से थायराइड ग्लैंड पर हमला करने लगता है।”

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नींद और थायराइड हार्मोन सिस्टम कैसे आपस में जुड़े हैं?
Cureus 2024 में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, हाइपोथायरायडिज्म में मरीजों की नींद की क्वालिटी प्रभावित होती है। थायराइड हार्मोन की कमी के चलते मरीज को मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, ठंड बर्दाश्त न कर पाना और एंग्जायटी बढ़ती है, जिससे सोने में बहुत ज्यादा समय लगता है और इस वजह से नींद बार-बार टूटती है। इस स्टडी में यह भी बताया गया है कि जब रात को नींद पूरी नहीं होती, तो TSH का स्त्राव बढ़ जाता है और सुबह के थायराइड टेस्ट को प्रभावित करता है। इस बारे में डॉ. हिमिका ने कहा, "दरअसल, हाइपोथायरायडिज्म के लक्षणों की वजह से मरीज की नींद खराब होती है और जब नींद पूरी नहीं होती, तो इसका असर मरीज के थायराइड पर पड़ता है।
Frontiers in Endocrinology 2021 में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, हाइपरथायरायडिज्म और ब्लड में बहुत ज्यादा थायराइड (थायरोटॉक्सिकोसिस) होने से नींद में गड़बड़ होने के प्रमुख कारण हैं। इस स्टडी में पाया गया है कि हाइपरथायरायडिज्म में करीब 66.4% मरीजों को सोने में दिक्कत होती है। थायराइड हार्मोन के बहुत ज्यादा लेवल की वजह से मरीज को कंपन और घबराहट के कारण मरीज गहरी नींद नहीं ले पाते। डॉ. हिमिका के अनुसार, "जब मरीज को रात में नींद पूरी नहीं होती, तो मरीज दिनभर थकान और सुस्ती महसूस करता है। इस वजह से मरीज को भूख बढ़ने और बार-बार पॉटी जाने का मन करता है। इससे मरीज को बेचैनी और एंग्जायटी होने लगती हैं।"
नींद की कमी थायराइड को कैसे प्रभावित करती है?
PLOS One 2023 में प्रकाशित स्टडी में अमेरिकी वयस्कों में नींद की अवधि और थायराइड फंक्शन के बीच संबंधों का विश्लेषण किया गया है। इसमें 8,102 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इस स्टडी के जरिए रिसर्चर्स ने यह जानने की कोशिश की कि नींद के घंटे थायराइड हार्मोन के लेवल को कैसे प्रभावित करते हैं। इसमें लोगों को तीन ग्रुप में बांटा गया, जिसमें एक ग्रुप को सात घंटे से कम नींद, दूसरे ग्रुप को सात से नौ घंटे की नींद और तीसरे ग्रुप को नौ घंटे से ज्यादा नींद लेने के लिए कहा गया। इस रिसर्च में पाया गया कि नींद की अवधि और थायराइड हार्मोन के स्तर के बीच संबंध देखा गया है। जैसे-जैसे नींद के घंटे बढ़ते है, FT3 (Free T3) के लेवल में कमी आती है। इसका असर उस ग्रुप पर ज्यादा देखने को मिला, जो सात या उससे कम घंटे सोता था। इस स्टडी में यह भी पता चला कि जिन लोगों के नींद के घंटे बढ़ाए गए, उनके TSH का लेवल थोड़ा बढ़ा हुआ देखा गया। इस रिसर्च से सामने आया कि नींद कम लेने से थायराइड हार्मोन पर असर पड़ता है। डॉक्टर की सुझाई सात से नौ घंटे की नींद लेने के बाद यह असर खत्म हो गया। इससे पता चलता है कि थायराइड के मरीजों को नींद पूरी करना बहुत जरूरी है।
नींद की कमी से थायराइड की बीमारी के लक्षण
डॉ. हिमिका कहती हैं, "थायराइड की समस्या सिर्फ नींद पर ही असर नहीं डालती, बल्कि नींद के कमी के कारण थायराइड के मरीजों को कुछ लक्षण भी महसूस हो सकते हैं।
हाइपोथायरायडिज्म के लक्षण
- जोड़ों या मांसपेशियों में दर्द,
- दिन में थकान और ठंड महसूस होना
- वजन बढ़ना
- चेहरे पर सूजन आना
- बालों का पतला होना
- स्किन रूखी होना
- आवाज में भारीपन आना
- अनियमित पीरियड्स होना
हाइपरथायरायडिज्म के लक्षण
- घबराहट
- चिड़चिड़ापन
- रात को पसीना
- हार्टबीट का तेजी से धड़कना
- ज्यादा भूख लगना
- अचानक वजन कम होने लगना
- जल्दी थकान महसूस होना
- बालों का झड़ना
- पीरियड्स कम होना
- हाथों और उंगलियों का कांपना

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नींद की कमी और थायराइड के कारण होने वाली बीमारियां
डॉ. हिमिका ने बताया कि जिन मरीजों को थायराइड की समस्या होने के साथ नींद पूरी नहीं होती, उनमें कई तरह की गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इसमें हार्ट, डायबिटीज और मोटापा सबसे आम है।
हार्ट की बीमारियां
डॉ. हिमिका कहती हैं, "हाइपरथायरायडिज्म के मरीजों में इंसोमिया या घबराहट रहती है और ये समस्याएं हार्ट को स्ट्रेस दे सकती है, जो समय पर इलाज न कराने से हार्ट की बीमारियां हो सकती हैं। इसके उल्ट, जिन मरीजों को हाइपोथायरायडिज्म की समस्या होती है, तो उन्हें दिन में बहुत नींद आती है और इससे सोते समय सांस लेने की स्पीड धीमी हो जाती है, जिससे ऑक्सीजन का लेवल कम हो सकता है और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ सकता है।"
डायबिटीज
डॉ. हिमिका ने कहा, "थायराइड की समस्या और डायबिटीज आपस में गहराई से जुड़े हैं। जिन लोगों को हाइपरथायरायडिज्म होता है, उनमें हार्मोन बहुत तेजी से बनते हैं। इससे लिवर से ग्लूकोज बढ़ने लगता है और शरीर में शुगर का लेवल तेजी से बढ़ने लगता है। इस वजह से पैंक्रियाज को ज्यादा इंसुलिन बनाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जो आखिरकार डायबिटीज का कारण बन सकता है। इसके अलावा, हाइपोथायरायडिज्म में पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती, तो इस वजह से मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देता है। इससे वजन बढ़ने लगता है और इसका कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस हो सकता है। इंसुलिन कम होने और वजन बढ़ने से टाइप 2 डायबिटीज का रिस्क बढ़ जाता है।"
फर्टिलिटी की समस्या
Mayo Clinic के अनुसार, हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित महिलाओं में थायराइड हार्मोन की कमी के कारण ओवरी से अंडे के निकालने में दिक्कत कर सकता है, जिससे प्रेग्नेंसी में मुश्किल हो सकती है। थायराइड की बीमारी में पिट्यूटरी ग्लैंड भी शामिल होती है, जिसकी वजह से रिप्रोडक्टिव क्षमता को भी नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए थायराइड से पीड़ित महिलाओं को प्रेग्नेंसी के लिए डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए।
मेंटल हेल्थ से जुड़ी बीमारियां
Frontiers in Endocrinology 2021 में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, हाइपरथायरायडिज्म के 41% मरीजों में सामान्य एंग्जायटी डिस्ऑर्डर था और 16% में ओब्सेसिव-कंपलसिव डिसऑर्डर (OCD) और मूड संबंधी दिक्कतें पाई गई है। इस स्टडी में मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। इसमें एक ग्रुप को थायराइड की दवा के साथ मानसिक रोगों की दवा दी गई, और दूसरे को सिर्फ थायराइड की दवा दी गई। इसका परिणाम यह निकला कि सिर्फ थायराइड का इलाज करने से भी नींद, चिड़चिड़ापन और एंग्जायटी में महत्वपूर्ण सुधार हुआ। डॉ. हिमिका के मुताबिक, "इस तरह की स्टडीज से पता चलता है कि अगर थायराइड के असंतुलन को ठीक कर लिया जाए, तो इससे जुड़ी मेंटल हेल्थ की समस्याएं और नींद से जुड़ी बीमारियां खुद-ब-खुद ठीक होने लगती हैं।"
थायराइड का इलाज कैसे करें?
डॉ. हिमिका ने बताया कि हाइपरथायरायडिज्म और हाइपोथायरायडिज्म के मरीजों का इलाज अलग-अलग तरीकों से होता है।
हाइपरथायरायडिज्म
इसके इलाज में दवाएं दी जा सकती हैं, जो आमतौर पर एक से डेढ़ साल तक लेनी पड़ सकती हैं। रेडियोथेरेपी भी की जा सकती है, जिसमें थायराइड के टिश्यू को खत्म करके हार्मोन का कम बनाने का काम करती है। इस इलाज के बाद तीन हफ्ते तक बच्चों और प्रेग्नेंट महिलाओं के पास जाने से बचना चाहिए। इस थेरेपी के बाद 6-12 महीने तक प्रेग्नेंसी नहीं प्लान करनी चाहिए या अपने डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कुछ मामलों में थायराइड ग्लैंड को हटाने के लिए सर्जरी की जा सकती है। सर्जरी तब की जाती है, जब कोई और इलाज काम नहीं करता।
हाइपोथायरायडिज्म
TSH टेस्ट के जरिए मरीज को सही खुराक बताई जा सकती है। दवाई रोजाना खाली पेट लेनी होती है और इसके आधे या एक घंटे बाद ही कुछ खाना चाहिए। अगर मरीज को ज्यादा दिक्कत होती है, तो दवाई की खुराक बदली जा सकती है।
सोया से बने प्रोडक्ट्स, ज्यादा फाइबर वाली डाइट और सप्लीमेंट्स दवाओं के असर को कम कर सकते हैं। इसलिए दवा लेने के साथ डाइट के बारे में भी जरूर पूछें।
नींद को बेहतर कैसे बनाएं?
CDC के अनुसार, बेहतर नींद के लिए लोगों को अपनी आदतों में सुधार करना चाहिए।
- रोजाना एक ही समय पर सोने और उठने का नियम बनाएं।
- अपने बेडरूम को शांत, आरामदायक और ठंडे टेम्परेचर पर रखें।
- सोने से कम से कम 30 मिनट पहले अपने इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जैसे मोबाइल, टीवी या टैब को बंद कर दें।
- सोने से पहले भारी भोजन और शराब के सेवन से बचें।
- दोपहर या शाम के समय कैफीन लेने से बचें।
- रेगुलर एक्सरसाइज करें और सेहतमंद डाइट लें।
उम्र के हिसाब से कितनी नींद लेनी चाहिए?
CDC ने उम्र के हिसाब से लोगों को नींद के घंटे बताए हैं।
उम्र |
श्रेणी |
रोजाना नींद के घंटे |
0-3 महीने |
नवजात शिशु |
14-17 घंटे |
4-12 महीने |
शिशु |
12-16 घंटे (झपकी सहित) |
1-5 साल |
टॉडलर और प्रीस्कूलर |
10-14 घंटे (झपकी सहित) |
6-12 साल |
स्कूली बच्चे |
9-12 घंटे |
13-17 साल |
किशोर |
8-10 घंटे |
18-60 साल |
वयस्क |
7 या उससे अधिक घंटे |
61 साल या इससे ज्यादा |
वृद्ध वयस्क |
7-9 घंटे |
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डॉक्टर से कब मिलें?
थायराइड और नींद से जुड़ी समस्याओं को इग्नोर नहीं किया जा सकता, इसलिए अगर ये लक्षण दिखें, तो तुरंत एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से जरूर सलाह लें।
- अगर दिनभर थकान या नींद महसूस करते हैं और रात में पूरी कोशिश के बाद भी सो नहीं पाते।
- अचानक वजन बढ़ने या घटने लगे।
- आराम करते समय भी हार्टबीट बहुत ज्यादा तेज हो।
- सांस लेने में मुश्किल हो।
- महिलाओं को पीरियड्स रेगुलर न हों।
निष्कर्ष
थायराइड के कारण नींद पूरी न होना या नींद पूरी न होने के कारण थायराइड के लक्षण ज्यादा तेजी से बढ़ना, दोनों ही पहलू मरीज के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इससे मरीजों को हार्ट की बीमारियां, मोटापा, बहुत ज्यादा थकान, डायबिटीज और इनफर्टिलिटी की समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए थायराइड के मरीजों को अपनी नींद पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है। इसके अलावा, लाइफस्टाइल और डाइट में भी बदलाव करने चाहिए। अगर थायराइड के लक्षण बढ़ने लगे या फिर नींद पूरी न हो, तो एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से तुरंत सलाह लें।
FAQ
क्या थायराइड की दवा रात में ली जा सकती है?
आमतौर पर थायराइड की दवा सुबह खाली पेट लेने की सलाह दी जाती है ताकि इसका अवशोषण अच्छे से हो सके। अगर मरीज रात को दवाई लेना चाहते हैं, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें।हाइपोथायरायडिज्म में बहुत ज्यादा नींद क्यों आती है?
हाइपोथायरायडिज्म में शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, जिससे एनर्जी कम बनती है। एनर्जी की कमी के कारण मरीज को हर समय थकान और नींद महसूस होती है।क्या थायराइड के कारण खर्राटे आते हैं?
हाइपोथायरायडिज्म के कारण गले के आसपास के टिश्यू में सूजन आ सकती है, जिससे सांस लेने की नली सिकुड़ सकती है। यह स्लीप एप्निया और तेज खर्राटों का कारण बन सकता है।क्या डाइट में बदलाव से नींद और थायराइड दोनों सुधर सकते हैं?
अगर थायराइड के मरीज आयोडीन युक्त नमक, सेलेनियम और जिंक से भरपूर डाइट लेते हैं, तो थायराइड के लक्षणों को मैनेज करने में मदद मिल सकती है। शाम को कैफीन कम करने और हल्का भोजन करने से नींद की क्वालिटी में सुधार होता है।
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Current Version
Apr 24, 2026 16:20 IST
Modified By : Aneesh Rawat Apr 24, 2026 16:20 IST
Modified By : Aneesh RawatApr 24, 2026 16:20 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Himika Chawla