Fri Sep 11, 2026 | 06:54 PM IST

Medically Reviewed by Dr Raman Boddula , Consultant Endocrinologist

साइलेंट थायराइडाइटिस क्‍या है? जानें लक्षण, कारण, जांच और इलाज

साइलेंट थायराइडाइटिस (Silent Thyroiditis) एक प्रकार की थायराइड ग्रंंथ‍ि की अस्‍थायी सूजन है। इसके लक्षण आमतौर पर शुरुआत में नजर नहीं आते हैं। जानें इससे संबंध‍ित जानकारी के बारे में। 

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थायराइड ग्रंथ‍ि को हमारे शरीर का कंट्रोल सेंटर माना जाता है। ऐसे समझें क‍ि यह हमारे शरीर के कई कार्यों को कंट्रोल करता है। थायराइड से संबंध‍ित एक समस्‍या है ज‍िसे साइलेंट थायराइडाइटिस (Silent Thyroiditis) कहा जाता है। यह एक ऐसी स्‍थ‍िति‍ है, ज‍िसमें थायराइड ग्रंथ‍ि बीमार हो जाती है, लेक‍िन मरीज को कोई खास लक्षण नजर नहीं आता है। पहले थायराइड अचानक ज्‍यादा हार्मोन्‍स र‍िलीज करने लगता है फ‍िर अचानक से थायराइड हार्मोन्‍स का स्‍तर कम हो जाता है।

यह बीमारी अक्‍सर इम्‍यून‍िट सिस्टम से जुड़ी हो सकती है। कभी-कभी शरीर गलत‍ी से थायराइड ग्रंथ‍ि को प्रभाव‍ित कर सकता है, ज‍िससे ग्रंथि में सूजन आ सकती है। सूजन के कारण अक्‍सर मरीजों को दर्द नहीं होता, लेकि‍न इसके लक्षणों को समझकर समय पर डॉक्‍टर से इलाज कराया जा सकता है। साइलेंट थायराइडाइटिस के लक्षण, कारण, जांच, इलाज और अन्‍य जरूरी सवालों के जवाब जानने के ल‍िए हमने Dr. Raman Boddula, Senior Consultant Endocrinologist At Yashoda Hospitals, Secunderabad, Telangana से बात की।

साइलेंट थायराइडाइटिस क्‍या होता है?

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साइलेंट थायराइडाइटिस (Silent Thyroiditis) जिसे पेनलेस थायराइडाइटिस (Painless Thyroiditis) भी कहा जाता है , थायराइड ग्रंथि की एक तरह की सूजन है, जिससे कुछ समय के लिए हार्मोन का स्तर बदल जाता है। दूसरी थायराइड बीमारियों के मुकाबले इसमें आमतौर पर दर्द या सूजन महसूस नहीं होती, इसलिए इसे ‘साइलेंट’ कहा जाता है।

यह आमतौर पर तीन चरणों में होता है:

  • हाइपरथायराइडि‍ज्‍म फेज- शुरुआत में हार्मोन ज्यादा बनने लगते हैं।
  • हाइपोथायराइडि‍ज्‍म फेज- इसके बाद हार्मोन कम हो जाते हैं।
  • रिकवरी फेज- ज्यादातर मामलों में थायराइड फिर से सामान्य हो सकता है।

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साइलेंट थायराइडाइटिस के लक्षण

शुरुआत में हाइपरथायराइड‍िज्‍म के फेज में जब हार्मोन्‍स बढ़ते हैं तब ये लक्षण नजर आ सकते हैं-

  • अन‍िद्रा
  • वेट लॉस
  • अध‍िक पसीना
  • घबराहट या बेचैनी
  • द‍िल की धड़कन तेज होना
  • हाथ कांपना
  • गर्मी ज्यादा लगना

इसके बाद हाइपोथायराइड‍िज्‍म के फेज में जब हार्मोन्‍स कम होते हैं तब ये लक्षण नजर आ सकते हैं-

  • वजन बढ़ना
  • थकान महसूस होना
  • ड्राई स्‍क‍िन
  • हेयर फॉल
  • कब्‍ज
  • फोकस करने में परेशानी होना
  • ज्‍यादा ठंड लगना
  • उदासी (डिप्रेशन) जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

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साइलेंट थायराइडाइटिस के कारण

  • अगर पर‍िवार में क‍िसी को थायराइड या ऑटाेइम्‍यून बीमारी है, तो इसका खतरा बढ़ सकता है।
  • साइलेंट थायराइडाइटिस एक ऑटोइम्‍यून ड‍िजीज है ज‍िसमें इम्‍यून‍ स‍िस्‍टम थायराइड हार्मोन को डैमेज कर सकता है।
  • कुछ लोगों में स्‍ट्रेस के कारण भी साइलेंट थायराइडाइटिस हो सकता है। स्‍ट्रेस इम्‍यून स‍िस्‍टम को प्रभाव‍ित करता है ज‍िससे यह ट्र‍िगर हो सकता है।
  • प्रेग्नेंसी के बाद हार्मोन्‍स तेजी से बदलते हैं ज‍िससे पोस्‍टपार्टम फेज में साइलेंट थायराइडाइटिस हो सकता है।

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साइलेंट थायराइडाइटिस की जांंच कैसे होती है?

साइलेंट थायराइडाइटिस की जांच अक्‍सर एंडोक्राइनोलॉजिस्ट या हार्मोन्‍स से जुड़े व‍िशेषज्ञ करते हैं। अगर पहले से थायराइड है, तो लक्षणों के बारे में डॉक्‍टर को बताएं। साइलेंट थायराइडाइटिस की पुष्‍ट‍ि के ल‍िए ये जांच हो सकती हैं-

  • थायराइड फंक्‍शन टेस्‍ट
  • TSH
  • T3 और T4
  • अल्ट्रासाउंड

साइलेंट थायराइडाइटिस के निदान की शुरुआत खून की जांच से होती है। इसमें अगर TSH कम और T4/T3 ज्यादा हो, तो यह हाइपरथायराइडिज्म को दिखाता है। वहीं अगर TSH ज्यादा और T4 कम हो, तो यह हाइपोथायराइडि‍ज्‍म को दर्शाता है। साथ ही, एंटी-TPO जैसे थायराइड एंटीबॉडी बढ़े हुए मिल सकते हैं। अल्ट्रासाउंड में थायराइड ग्रंथि में सूजन दिखाई दे सकती है।

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साइलेंट थायराइडाइटिस का इलाज

  • Dr. Raman Boddula ने बताया क‍ि साइलेंट थायराइडाइटिस का इलाज इसके लक्षणों पर न‍िर्भर करता है। हर केस में दवाओं की जरूरत हो, यह जरूरी नहीं है। ज्‍यादातर मामलों में यह समस्‍या कुछ महीनों में ठीक हो सकती है। साइलेंट थायराइडाइटिस की स्‍थ‍िति‍ में र‍िकवरी होने तक डॉक्‍टर की सलाह पर हर 4 से 6 हफ्ते में ब्‍लड टेस्‍ट कराएं।
  • दिल की तेज धड़कन तेज होने की स्‍थ‍िति‍ में बीटा-ब्लॉकर्स द‍िए जा सकते हैं। हल्‍के मामलों में मॉन‍िटर‍िंग की जाती है। साइलेंट थायराइडाइटिस के इलाज में डॉक्‍टर हेल्‍दी लाइफस्‍टाइल पर फोकस करने की सलाह देते हैं। लक्षणों को कंट्रोल करने के ल‍िए संतुल‍ित आहार लें, स्‍ट्रेस मैनेज करें, नींद पूरी करें और डॉक्‍टर की सलाह के बगैर दवाओं का सेवन न करें।

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साइलेंट थायराइडाइटिस से कैसे बचें?

साइलेंट थायराइडाइटिस को पूरी तरह से रोकना संभव नहीं होता क्‍योंक‍ि यह अक्‍सर ऑटोइम्‍यून कारणों से होता है। हालांक‍ि कुछ उपायों की मदद से इसके खतरे को कम किया जा सकता है-

  • साइलेंट थायराइडाइटिस से बचने के ल‍िए स्‍ट्रेस मैनेज करें और उसके ल‍िए योग और मेड‍िटेशन की मदद ले सकते हैं।
  • अगर प‍र‍िवार में क‍िसी को थायराइड है, तो जांच कराएं और गर्भवती मह‍िला को ड‍िलीवरी के बाद टीएसएच लेवल चेक कराना चाह‍िए।
  • पहले से डायब‍िटीज या ऑटोइम्‍यून रोग है, तो न‍ियम‍ित इलाज से लक्षणों को कंट्रोल करें।
  • संतुल‍ित आहार लें और डाइट में हरी सब्‍ज‍ियां और फलों को शाम‍िल करें और आयोडीन का सही स्‍तर बनाए रखें।
  • फ‍िज‍िकल एक्‍ट‍िव‍िटी और वॉक को प्राथम‍िकता दें ताक‍ि हेल्‍दी वेट बरकरार रह सके।
  • नींद पूरी करें और स्‍मोक‍िंग से बचें क्‍योंक‍ि इससे थायराइड की स्‍थ‍ित‍ि और ज्‍यादा खराब हो सकती है।
  • पोस्‍टपार्टम फेज में मह‍िलाओं को थायराइड की न‍ियम‍ित जांच करानी चाह‍िए, अगर ऑटोइम्‍यून बीमारी की ह‍िस्‍ट्री रही है, तो डॉक्‍टर की सलाह लेना जरूरी है।

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साइलेंट थायराइडाइटिस का र‍िस्‍क क‍िसे ज्‍यादा होता है?

साइलेंट थायराइडाइटिस का खतरा इन लोगों को ज्‍यादा हो सकता है-

  • ऐसी मह‍िलाएं जो डिलीवरी के 6 से 12 महीने के बाद के फेज में हों।
  • परिवार में ऑटोइम्यून बीमारियों (जैसे टाइप 1 डायबिटीज या रूमेटॉइड अर्थराइटिस) का इतिहास है, तो यह बीमारी हो सकती है।
  • पहले से कोई ऑटोइम्यून थायराइड समस्या है।
  • यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन 30 से 50 साल की उम्र में ज्यादा देखा जा सकता है।

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साइलेंट थायराइडाइटिस होने पर डाइट में क्‍या बदलाव करें?

  • हेल्‍दी और संतुल‍ित डाइट पर फोकस करें।
  • एंटी-इंफ्लेमेटरी डाइट लें ज‍िसमें फल, सब्‍ज‍ियां, लीन प्रोटीन, ओमेगा-3 र‍िच फ‍िश जैसे सैल्‍मन को शाम‍िल कर सकते हैं।
  • आयोडीन का स्‍तर बनाए रखें। आयोडीन की मात्रा न ज्‍यादा कम और न जरूरत से ज्‍यादा होनी चाह‍िए।
  • शरीर को हाइड्रेट रखें और थायराइड होने पर डाइट के ल‍िए एक्‍सपर्ट से सलाह लें।

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डॉक्‍टर से संपर्क कब करें?

डॉक्‍टर को तुरंत द‍िखाएं यद‍ि‍ ये लक्षण नजर आएं-

  • हार्टबीट अचानक तेज होना
  • बहुत अध‍िक थकान महसूस होना
  • ब‍िना वजह वजन में बदलाव होना
  • पल्‍प‍िटेशन तेज या धीमी होना
  • सूजन होना

इन लक्षणों के बगैर भी समय-समय पर थायराइड टेस्‍ट करवा सकते हैं ताक‍ि समय पर इलाज संंभव हो।

न‍िष्‍कर्ष:

Endocrinologist Dr. Raman Boddula से हुई बातचीत और स्‍टडीज के आधार पर पता चलता है क‍ि साइलेंट थायराइडाइटिस का इलाज लक्षणों के अनुसार क‍िया जाता है। ज्‍यादातर मामलों में यह अस्‍थायी होता है और समय के साथ ठीक हो सकता है वहीं कुछ मामलों में थायराइड की दवा की जरूरत हो सकती है। साइलेंट थायराइडाइटिस की पहचान के ल‍िए थायराइड फंक्‍शन टेस्‍ट, TSH, T3, T4 और अल्‍ट्रासाउंड जैसे टेस्‍ट क‍िए जा सकते हैं। संतुल‍ित आहार, स्‍ट्रेस और स्‍लीप मैनेजमेंट की मदद लेकर इससे बचाव संभव है।

FAQ

  • साइलेंट थायराइडाइटिस और थायराइड में अंतर

    थायराइड एक बड़ा समूह है ज‍िसमें थायराइड से जुड़ी कई समस्‍याएं आती हैं जैसे- हाइपोथायराइडिज्म, हाइपरथायराइडि‍ज्‍म, गोइटर, हाशिमोटो वगैरह। वहीं दूसरी ओर साइलेंट थायराइडाइटिस की बात करें, तो यह थायराइड की एक खास प्रकार की बीमारी है ज‍िसमें सूजन होती है, लेक‍िन अक्‍सर दर्द महसूस नहीं होता। यह समस्‍या आमतौर पर अस्‍थायी होती है।
  • साइलेंट थायराइडाइटिस का इलाज न होने पर क्‍या होता है?

    ज्‍यादातर लोगों में यह समस्‍या समय के साथ ठीक हो जाती है, कभी-कभी लंबे समय तक यह समस्‍या बनी रहती है, तो हाइपोथायरायडिज्म हो सकता है और लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ सकती हैं। वहीं अगर हाइपरथायरायडिज्म का इलाज न क‍िया जाए, तो हार्ट पर बुरा असर हो सकता है और हड्ड‍ियां कमजोर हो सकती हैं। 
  • क्‍या साइलेंट थायराइडाइटिस से वजन में बदलाव आता है?

    साइलेंट थायराइडाइटिस में वजन में बदलाव आ सकता है। हाइपरथायरायडिज्म फेज में मेटाबॉलिज्म तेज होने की वजह से बिना वजह वजन कम हो सकता है। वहीं हाइपोथायरायडिज्म फेज में मेटाबॉलिज्म धीमा होने के कारण वजन बढ़ सकता है। 

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Yashaswi Mathur

Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Apr 19, 2026 07:52 IST

    Modified By : Yashaswi Mathur
  • Apr 19, 2026 07:52 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Dr Raman Boddula

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