स्पाइक प्रोटीन क्या है? कोरोना वायरस इंफेक्शन के फैलने और वैक्सीन के असर में इसकी क्या भूमिका है?

स्पाइक प्रोटीन कोरोना वायरस का प्रोटीन है जो इंसानी शरीर के एसीई2 रिसेप्टर से जुड़ता है। इस तरह वायरस शरीर में तेजी से फैलता है।

Meena Prajapati
Written by: Meena PrajapatiPublished at: Jul 16, 2021Updated at: Dec 08, 2021
स्पाइक प्रोटीन क्या है? कोरोना वायरस इंफेक्शन के फैलने और वैक्सीन के असर में इसकी क्या भूमिका है?

साल 2019 से कोरोना का कहर दुनिया भर में जारी है। कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयावह थी कि दुनिया कांप उठी। हाल के दिनों में खबरें आईं कि स्पाइक प्रोटीन की वजह से कोरोना वायरस शरीर में फैल रहा है। अब लोगों के मन में सवाल है कि ये स्पाइक प्रोटीन क्या है। साथ ही स्पाइक प्रोटीन और मानव शरीर में पाए जाने एसीई2 रिसेप्टर में क्या रिश्ता है और स्पाइक प्रोटीन वैक्सीन की एफीकेसी में कैसे काम करता है। इस विषय में आसान भाषा में जानकारी लेने के लिए हमने बात कि राजकीय हृदय रोग संस्थान, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर में कार्यरत वरिष्ठ प्रोफेसर ऑफ कार्डियोलॉजी डॉ. अवधेश शर्मा से। तो वायरस और स्पाइक प्रोटीन के बारे में विस्तार से जानते हैं। 

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वायरस क्या होता है?

वायरस एक छोटा परजीवी होता है जो खुद को स्वयं से पुनरुत्पादित (reproduce) नहीं कर सकता। यह एक ए सेल्युलर स्ट्रक्चर है। वायरस में जेनेटिक मटेरियल होता है। किसी भी जीवित व्यक्ति का आधार डीएनए होता है। डीएनए से आरएनए बनता है। आरएनए से प्रोटीन बनते हैं। प्रोटीन से कई तरह के एंजाइम बनते हैं जो कि बॉडी में निर्माण करते हैं। शरीर में प्रोटीन के अलावा फैट और कार्बोहाइड्रेट भी होते हैं। फैट बाइडिंग करता है, प्रोटीन बॉडी के फंक्शन में काम करता है और कार्बोहाइड्रेट एनर्जी देता है। 

शरीर में कैसे फैलता है वायरस?

डॉ. अवधेश शर्मा का कहना है कि डीएनए और आरएनए दो तरह के वायरस होते हैं।  डीएनए वायरस प्रोटीन बनाते हैं और डीएनए से आरएनए बनता है। आरएनए वायरस भी प्रोटीन बनाते हैं। आरएनए से सीधा प्रोटीन बन जाता है। वायरस सजीव और निर्जीव दोनों कैटेगरी में आता है। कोई भी वायरस का कण जब हमारे शरीर में आता है तो बॉडी की कोशिकाओ में घुसता है। कोशिकाओं के डिविजन को कंट्रोल कर लेता है। वायरस कोशिकाओं को अनियंत्रित तरीके से बढ़ाता है। वायरस कोशिकाओं में जाकर अपनी कॉपी बनाने लग जाएगा। जिसे वायरल रेप्लीकेशन कहा जाता है। इस तरह से यह वायरस शरीर को नुकसान पहुंचाने लगता है। जिनकी इम्युनिटी स्ट्रांग होती है वह वायरस से लड़ लेती है जिनकी नहीं होती है, वे बीमार पड़ जाते हैं। 

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स्पाइक प्रोटीन क्या है?

कोरोना वायरस आरएनए वायरस है। आरएनए में भी ये सिंगल स्ट्रैंडिड वायरस है। आमतौर पर कोरोना वायरस सिंगल स्ट्रैंडिड आरएनए वायरस है। जबकि डीएनए वारयस डबल चेन होते हैं। आरएनए से प्रोटीन बनती हैं। प्रोटीन कई तरह के होते हैं।

प्रोटीन के प्रकार 

एम प्रोटीन (membrane protein) -एक वायरस के चारों ओर का प्रोटीन होता है जिसको एम प्रोटीन (membrane protein) कहा जाता है।  

ई प्रोटीन (Envelope protein)- जेनेटिक मटेरियल के चारों तरफ दो घरे होते हैं। इनर लेयर को इनवलेप प्रोटीन कहते हैं। आउटर लेयर को एम प्रोटीन प्रोटीन कहते हैं।

स्पाइक प्रोटीन - कोरोना ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ है क्राउन। क्राउन के चारों तरफ सूरज की रोशनी की तरह किरणें निकली होती हैं। ऐसी ही संरचना कोरोना वायरस की है। कोरोना वायरस की जो ये लाइन बाहर की तरफ निकली होती हैं, ये स्पाइक प्रोटीन होती हैं। इसी को एस प्रोटीन भी कहा जाता है। 

शरीर में स्पाइक प्रोटीन क्या करता है?

स्पाइक प्रोटीन वायरस को शरीर की कोशिका के अंदर प्रवेश करवाता है। इसे डॉक्टर अवधेश शर्मा ने एक उदाहरण के तौर पर समझाया। स्पाइक प्रोटीन किसी गेट की चाबी है। तो घर के अंदर जाने के लिए चाबी की जरूरत पड़ती है। स्पाइक प्रोटीन चाबी की तरह काम करता है। स्पाइक प्रोटीन जीवित लोगों के अंदर वायरस का प्रवेश आसान बना देता है। वायरस में जो कांटे वाले स्ट्रक्चर होते हैं, ये स्पाइक प्रोटीन मनुष्य की बॉडी में एसीई2 रिसेप्टर होता है। जिसे angiotensin converting enzyme 2 receptor (ace2) कहा जाता है। ये एसीई2 रिसेप्टर शरीर के अलग-अलग अंगों में पाए जाते हैं। हृदय की कोशिकाओं में, मासपेशियों की कोशिकाओं में, रक्त वाहिकाओं की कोशिकाओं आदि में पाए जाते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा फेफडो़ं की कोशिकाओं में होते हैं। स्पाइक प्रोटीन एसीई2 रिसेप्टर पर जाकर चिपक जाता है। इनसे चिपकर वायरस लिविंग सेल के अंदर एंट्री कर जाता है। शरीर में अंदर जाने के बाद वायरस अपनी कॉपी बनाने लग जाता है और तेजी से शरीर में फैलता है।

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कोरोना फेफड़ों को ज्यादा क्यों प्रभावित करता है?

डॉ. अवधेश शर्मा का कहना है कि फेफड़ों में एसीई2 रिसेप्टर सबसे ज्यादा होते हैं, इसलिए कोरोना वायरस फेफड़ों को ज्यादा प्रभावित करता है। इसके बाद हार्ट और ब्लड वेसेल और किडनी पर असर डालता है। छोटे बच्चों में एसीई2 रिसेप्टर का अमाउंट कम होता है। उम्र के साथ एस रिसेप्टर बढ़ते हैं। लेकिन छोटे बच्चों में यह कम होता है इसलिए बच्चों को कोरोना वायरस ज्यादा गंभीरता नहीं डालता है। जब एसीई रिसेप्टर कम होंगे तो वायरस शरीर में कम प्रवेश करेगा, इसलिए बच्चों में यह ज्यादा नुकसानदायक नहीं है। एडल्ट्स में एसीई रिसेप्टर ज्यादा होते हैं इसलिए एडल्ट्स में ज्याद नुकसान पहुंचाता है।

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स्पाइक प्रोटीन के प्रकार

एस1 - एस1 शरीर में कोशिकाओं में एस2 रिसेप्टर से जाकर चिपक जाती है। एस2 - रिसेप्ट को तोड़ती है और वायरस की एंट्री कराती है।

वैक्सीन बनाते समय क्या बातें ध्यान रखी जाती हैं?

इस सवाल के जवाब में डॉ. अवधेश शर्मा का कहना है कि जब भी कोई वैक्सीन बनती है तो हमें ध्यान रखना पड़ता है कि किसी तरह से ऐसा मेकेनिज्म बना दें कि वायरस शरीर में जा नहीं पाए। जब शरीर में जाएगा नहीं तो बीमारी नहीं होगी। जितनी वैक्सीन बनती हैं, वायरस के मृत कण डाले जाते हैं। जिनकी वजह से शरीर में एंटीबॉडी बनती हैं। ये एंटीबॉडीज एसीई प्रोटीन के विरुद्ध बनती हैं। ये एंटीबॉडी स्पाइक प्रोटीन को मार देंगी। जिससे पेशेंट सुरक्षित रहता है। 

वैक्सीन में वायरस के मृत पार्टिकल इस्तेमाल किए जाते हैं या वायरस के जेनेटिक मटेरियल को शरीर के जेनेटिक मटेरियल में मिलाया जाता है। जिससे वैसी ही एंटीबॉडी शरीर प्रोड्यूस करता है। 

स्पाइक प्रोटीन का नुकसान

वायरस वातावरण के अनुसार खुद को बदलता है। वातावरण के अनुसार अपने जेनेटिक स्ट्रक्चर को बदलेगा। जब वह अपनी संरचना बदलेगा तो आरएन से प्रोटीन बन रही हैं तो प्रोटीन का स्ट्रक्चर बदल जाएगा। जिससे स्पाइक प्रोटीन में म्युटेशन हो जाते हैं। जब म्युटेशन हो जाता है तब वह आरटीपीसीआर टेस्ट में भी पकड़ में नहीं आता है। आरटीपीसीआर में प्रोटीन को देखा जाता है  फिर प्रोटीन से आरएनए  बनाते  हैं। फिर देखते हैं कि ये आरएनए कोरोना वायरस का है या नहीं। अगर वह कोरोना वायरस से मैच कर गया तो कोरोना पॉजिटिव हो जाते हैं और मैच नहीं होने पर कोरोना नेगेटिव हो जाते हैं। जब म्युटेशन हो जाता है और किट पुरानी है तब कोरोना पकड़ में नहीं आता। वैक्सीन एक स्पाइक प्रोटीन के विरुद्ध काम कर रही है तब तक वायरस म्युटेंट हो जाता है, जिस वजह से वैक्सीन प्रभावी नहीं रहती। 

स्पाइक प्रोटीन कोरोना वायरस का प्रोटीन है जो इंसानी शरीर के एसीई2 रिसेप्टर से जुड़ता है। इस तरह वायरस शरीर में तेजी से फैलता है।

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