अखबार की सुर्खियां पढ़कर बढ़ सकता है आपका स्ट्रेस, जानें क्या है 'हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर'

रिपोर्ट के सबसे हालिया सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, वयस्कों ने राजनीति और हिंसा से जुड़ी खबरों को लेकर सबसे अधिक तनाव का अनुभव किया है।

Pallavi Kumari
Written by: Pallavi KumariPublished at: Jan 17, 2020Updated at: Jan 17, 2020
अखबार की सुर्खियां पढ़कर बढ़ सकता है आपका स्ट्रेस, जानें क्या है 'हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर'

समाचार पढ़ना तनाव पैदा करने वाला काम हो सकता है। खासकर जब खबर विशेष रूप से चिंताजनक होती है, तो हम में से कई चिंता के उच्च स्तर का अनुभव करते हैं। वहीं जिस तरह से इस समय देश-दुनिया का हाल है, मीडिया की छोटी-बड़ी सुर्खियों में हमें चिंता और दुख में डाल सकती है। ऐसा लग सकता है कि मानो हम किसी बुरी खबर के युग में प्रवेश कर गए हैं। पिछले कुछ वर्षों से हर दिन, समाचार पत्रों और समाचार वेबसाइटों ने पूरी तरह से तनावपूर्ण सुर्खियां बटोरी हैं। युद्धों और नागरिक अशांति, आपदाएं, विफल अर्थव्यवस्थाओं, हिंसक और उदास करने वाली स्थानीय घटनाएं मन को एक अजीब स्थितियों में घेर लेती हैं। हम चाहें न, चाहें हमपर इमका फर्क पड़ ही जाता है। वहीं शोधकर्ताओं में इस तरह की चिंता को एक डिसऑर्डर का नाम दिया है। आइए जानते हैं इस डिसऑर्डर के बारे में।

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क्या है हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर

जबकि समाचार चक्र संबंधी चिंता शायद सदियों से मौजूद है, पर अब विशेष रूप से स्पष्ट हो गया कि लोगों को खबर पढ़ने से टेंशन बढ़ने बढ़ने लगती है। कुछ लोगों पर खबरों को इतना फर्क पड़ता है कि गुस्सा हो जाते हैृं और उनका बीपी हाई हो जाता है। ऐसे में जब लोगों ने तनाव और चिंता की रिपोर्ट करना शुरू कर दिया, जो कि समाचारों की सुर्खियों को पढ़ने से उपजी थी, तो कुछ चिकित्सक इसे अपनी घटना के रूप में वर्णित करने लगे। उदाहरण के लिए, थेरेपिस्ट स्टीवन स्टॉसी, पीएचडी, इसे वाशिंगटन पोस्ट के लिए एक राय में इस तरह की चिंता को 'हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर' के रूप में संदर्भित करता है। उन्होंने बताया कि कैसे समाचार पढ़ने से चिंता और असहायता की तीव्र भावनाएं पैदा होती हैं, जो किसी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

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नकारात्मक खबरों को महिलाएं ज्यादा याद रखती हैं

वहीं एक अध्ययन के अनुसार, लंबे समय तक नकारात्मक खबरों को याद रखने में महिलाएं पुरुषों से बेहतर होती हैं। इस तरह के समाचारों के कारण होने वाले तनाव के लिए उनके पास लगातार शारीरिक प्रतिक्रियाएं देखे जाते हैं। वहीं बहुत से लोग व्यक्तिगत रूप से अवमूल्यन, अस्वीकार, अनदेखी, अनसुना और असुरक्षित महसूस करते हैं। वे भविष्य के बारे में पूर्वाभास और अविश्वास की भावना की रिपोर्ट करते हैं और एक स्ट्रेस भरा जीवन जीने लगते हैं।

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि अगस्त 2016 और जनवरी 2017 के बीच, संयुक्त राज्य में लोगों ने एक पैमाने पर औसत तनाव स्तर 4.8 से 5.1 तक बढ़ने की सूचना दी जहां 1 का मतलब बहुत कम या कोई तनाव नहीं है और 10 का मतलब एक अत्यधिक तनाव का स्तर माना गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस दशक में औसत तनाव के स्तर में यह पहली उल्लेखनीय वृद्धि थी क्योंकि एसोसिएशन ने सबसे पहले इन सर्वेक्षणों का संचालन शुरू किया था।अमेरिकी आबादी में तनाव के स्तर पर एपीए की 2019 की रिपोर्ट में पिछले वर्षों की तुलना में बहुत अंतर नहीं पाया गया, सिवाय ये कि शोध में उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें विशिष्ट विषयों के बारे में अधिक चिंता महसूस हुई।

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सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी हो रही है प्रभावित

रिपोर्ट के लेखकों ने पाया कि 10 में 7 से अधिक वयस्क (72%) इस कथन से सहमत हैं कि खबरों को देखकर और पढ़कर दिमाग चिंता की स्थिति में डूब जाता है। वहीं आधे से अधिक लगभग 54% व्यस्कों का कहना है कि वे इस खबर के बारे में सूचित रहना चाहते हैं, लेकिन इसका पालन करने से उन्हें तनाव होता है। अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों ने तनाव के विभिन्न स्तरों की सूचना दी, जो वे समाचार मीडिया को देते हैं, जिनमें 30 से अधिक लोग हैं और युवा वर्ग समाचार चक्र से परेशान है। लेखक यह भी कहते हैं कि बहुत से लोग इन मुद्दों से निपटने के लिए समाचारों से बचते हैं। 

हेडलाइन स्ट्रेस डिसऑर्डर से बचने के उपाय

  • खबरों से थोड़ा विराम लें।
  • दिन की शुरुआत नकारात्मक खबरों को बढ़कर या देखकर न करें।
  • सोशल मीडिया से दूर रहें और खबर पढ़कर एक दम से भरोसा न करें।
  • सुबह-सुबह लाइट म्यूजिक सुनें।
  • खुद को शांत रखें और ध्यान करें।
  • अचानक से चिंता होने पर उस चीज से दूरी बनाएं और लंबी-लंबी सांस लें।

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