प्रेगनेंसी में क्यों कराया जाता है फीटल इकोकार्डियोग्राफी? डॉक्टर से जानें इस टेस्ट के बारे में जरूरी बातें

फीटल इकोकार्डियोग्राफी टेस्ट कराकर डॉक्टर क्या पता करते हैं, क्यों कराया जाता है आदि जानने के लिए पढ़ें ये रिपोर्ट। गायनोकोलॉजिस्ट की जानें राय।

Satish Singh
Written by: Satish SinghPublished at: Sep 17, 2021
प्रेगनेंसी में क्यों कराया जाता है फीटल इकोकार्डियोग्राफी? डॉक्टर से जानें इस टेस्ट के बारे में जरूरी बातें

शिशु जब मां के गर्भ में रहता है तब से लेकर शिशु के जन्म तक उसे कई चरणों के टेस्ट, जांच आदि से गुजरना पड़ता है। उन्हीं में से एक है ये फीटल इकोकार्डियोग्राफी। आज के इस आर्टिकल में हम टाटा की पूर्व स्त्री रोग विशेषज्ञ व वर्तमान में कोलकाता के बीएनएच अस्पताल में सेवा दे रही डॉ. श्वेता कुमारी से बात कर इस टेस्ट से जुड़ी तमाम बातों को जानेंगे। वहीं जानेंगे कि ये टेस्ट क्यों कराया जाता है, कब कराया जाता है। टेस्ट के बाद डॉक्टर किन-किन बातों का पता करते हैं। प्रेग्नेंसी में कुल कितनी बार इस टेस्टे को कराया जाता है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़ें ये खास आर्टिकल। 

फीटल इकोकार्डियोग्राफी क्या है इसे कराने से होने वाले फायदे

स्त्री रोग विशेषज्ञ बताती हैं कि प्रेग्नेंसी के समय मां के गर्भ में पल रहे बच्चे को फीटल कहा जाता है। अल्ट्रासाउंड की मदद से शिशु के दिल की जांच व धड़कनों का पता लगाया जाता है। इसी प्रक्रिया को फीटल इकोकार्डियोग्राफी कहा जाता है। आधुनिक तकनीक व मशीनों की मदद से मां के गर्भ में शिशु की धड़कनों की जांच की जाती है। इसके अलावा, अनुमानन उसकी उम्र, उसे कोई परेशानी आदि तो नहीं है ये भी जांच के क्रम में पता की जाती है। 

Fetal cardiography

जानें ये टेस्ट क्यों कराया जाता है

डॉक्टर बताती हैं कि इस टेस्ट को कराने के कई कारण होते हैं। सबसे पहला कारण यह है कि यदि अल्ट्रासाउंड में किसी प्रकार की समस्या व कमी दिखे तब कराया जाता है। प्रेग्नेंसी के दौरान तीसरे महीने में फर्स्ट ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग या एनटीएनबी स्कैन किया जाता है। इसमें फीटस के गर्दन के पीछे की स्किन की थिकनेस जिसे न्यूकल ट्रांसल्यूसेंसी भी कहा जाता है उसको नापा जाता है। यदि यह नॉर्मल से ज्यादा होती है तो फीटस में हार्ट की दिक्कतें होने की संभावना रहती है। इसके बाद डिलेट में फीटल इकोकार्डियोग्राफी कराने की सलाह दी जाती है। 

अल्ट्रासाउंड में हार्ट की बनावट व हार्ट के लय में समस्या होने पर

एक्सपर्ट बताती हैं कि ये जांच प्रेग्नेंसी में उस समय भी करवाया जाता है जब शिशु के दिल की बनावट में किसी प्रकार की कमी या फिर हार्ट बीट असामान्य हो तो उस स्थिति में यह जांच करवाने की सलाह दी जाती है। 

हार्ट के अलावा किसी अन्य अंग में समस्या

स्त्री रोग विशेषज्ञ बताती हैं कि अल्ट्रासाउंड में यदि शिशु के किसी अन्य अंग में किसी प्रकार की समस्या दिखती है तो उस स्थिति में भी हम फीटल इकोकार्डियोग्राफी कराने की सलाह देते हैं। ताकि किसी अन्य प्रकार की समस्या का हल किया जा सके। 

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इस कंडीशन में भी डॉक्टर देते हैं जांच करने की सलाह

प्रेग्नेंसी के दौरान गर्भवती को कोई बीमारी होने पर जैसे कि डायबिटीज, किसी प्रकार का इंफेक्शन, या फिर गर्भवती ने कोई दवा का सेवन किया है जिससे शिशु की धड़कन पर असर पड़ सकता है उस स्थिति में भी ये जांच करवाने की सलाह एक्सपर्ट देते हैं। 

जन्मजात हृदय रोग की फैमिली हिस्ट्री होने पर 

एक्सपर्ट बताती हैं कि यदि गर्भवती का ये दूसरा शिशु है वहीं उनके पहले शिशु को जन्मजात हृदय रोग था उस केस में मां के भ्रूण में पल रहे दूसरे शिशु के दिल की भी जांच करवाई जाती है। यदि मां को कंजीनाइटल हार्ट डिजीज की हिस्ट्री है उस स्थिति में भी फीटल इकोकार्डियोग्राफी की जांच करवाने की सलाह दी जाती है।

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फीटल इकोकार्डियोग्राफी करने का सही समय

एक्सपर्ट बताती हैं कि फीटल इकोकार्डियोग्राफी करने का सही समय प्रेग्नेंसी के 22 ले 24 सप्ताह में होता है। लेकिन कुछ मामलों में ये जांच डॉक्टर पहले भी करवा सकते हैं। ऐसे में जांच कब करवाना है ये आपके डॉक्टर तय करते हैं, बिना उनकी अनुमति के ये जांच नहीं होता है। 

Pregnancy test

सामान्य स्कैन की तरह होती है जांच

फीटल इकोकार्डियोग्राफी सामान्य स्कैन के समान ही इसमें जांच की जाती है, जिसमें गर्भंवती को घर से ही खाना खाकर आने की सलाह दी जाती है। इसे करने में 45-60 मिनट लगते हैं। शिशु के गर्भाश्य में स्थिति के अनुसार ही समय ज्यादा व कम लग सकता है। फीटल इकोकार्डियोग्राफी सिर्फ व सिर्फ प्रशिक्षित डॉक्टर ही करते हैं। 

फीटल इकोकार्डियोग्राफी करने के लाभ पर नजर

  • रिपोर्ट के जरिए शिशु स्वस्थ्य है या नहीं पता चलता है
  • गर्भ में पल रहे शिशु के दिल की ज्यादा से ज्यादा समस्याओं का पता किया जा सकता है
  • >शिशु के दिल में किसी प्रकार की दिक्कत होने पर उन्हें पहले ही सलाह दी जाती है कि ऐसे अस्पताल में डिलीवरी करवाएं जहां नियोनिटल आईसीयू (एनआईसीयू) की सुविधा हो, बच्चे के दिल के डॉक्टर हैं

सिर्फ व सिर्फ डॉक्टरी सलाह पर ही होती है ये जांच

मां के गर्भ में पल रहे शिशु की जांच डॉक्टर की प्रिस्क्राइब्ड प्रिसक्रिप्शन के बाद ही होती है। बिना उसके जांच गैर कानूनी है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की शारिरिक जांच की जाती है। वहीं यदि किसी प्रकार की बीमारी है तो उसके समाधान को लेकर पहले से तैयारी या फिर निर्णय लिए जा सकते हैं। इस विषय पर ज्यादा जानकारी के लिए डॉक्टर की सलाह लें। 

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