Fri Sep 11, 2026 | 06:53 PM IST

Medically Reviewed by Neha Mohan Sinha , Clinical Nutrition and Dietetics

बच्‍चों की डाइट में फाइबर की मात्रा कैसे बढ़ाएं? एक्‍सपर्ट से जानें

फल, सब्‍जी, साबुत अनाज, दालों में फाइबर पाया जाता है। फाइबर की मदद से पाचन तंत्र ठीक से काम करता है। बच्‍चों की डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ाने के ल‍िए कुछ आसान ट‍िप्‍स की मदद ले सकते हैं।

आजकल बच्‍चे प‍िज्‍जा-बर्गर जैसे जंक फूड को खाने के बाद कब्‍ज, अपच जैसी समस्‍याओं से परेशान रहते हैं। इससे बचने के ल‍िए बच्‍चों की डाइट में फाइबर को शाम‍िल कर सकते हैं। फाइबर का सेवन करने से कब्‍ज और पाचन समस्‍याएं, तो दूर होती ही हैं साथ ही पेट भी लंंबे समय तक भरा रहता है। पेट के ल‍िए फाइबर फायदेमंंद है, लेक‍िन अचानक से इसकी मात्रा को बढ़ाना ठीक नहीं है। इससे कब्‍ज, अपच जैसी समस्‍याएं हो सकती हैं। बच्‍चों की डाइट में फाइबर की मात्रा को बढ़ाने का सही तरीका जानने के ल‍िए हमने Neha Sinha, Nutritionist At The Nutriwise Clinic, Lucknow से बात की।

मुलायम चीजों से शुरू करें

  • बच्‍चों की डाइट में फाइबर बढ़ाने जा रहे हैं, तो ध्‍यान रखें धीरे-धीरे मात्रा को बढ़ाएं।
  • पांच साल से कम उम्र में बच्‍चे को मुलायम फल खाने के ल‍िए दें जैसे मैश क‍िया हुआ सेब या केला।
  • पका हुआ गाजर, पंपक‍िन और स्‍वीट पोटैटो भी दे सकते हैंं।
  • ओटमील को दूध में भ‍ि‍गाकर भी दे सकते हैं।
  • बच्‍चों को ज्‍यादा कच्‍चा सलाद देने से बचें।

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फाइबर को पानी के साथ दें

  • फाइबर को पानी के साथ दें। अगर बच्‍चे को केवल फाइबर देंगे और पर्याप्‍त पानी नहीं देंगे, तो कब्‍ज की समस्‍या हो सकती है।
  • द‍िनभर में बच्‍चे को थोड़ा-थोड़ा करके पानी दें।

फाइबर को अन्‍य चीजों के साथ म‍िक्‍स करके दें

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  • बच्‍चोंं को केवल फाइबर देंगे, तो पाचन समस्‍याएं हो सकती हैं इसल‍िए फाइबर को अन्‍य पोषक तत्‍वों के साथ म‍िक्‍स करके दें।
  • जैसे दही के साथ फल दे सकते हैं या पैनकेक के साथ केला या सेब म‍िक्‍स करके ख‍िलाएं।
  • गर्म‍ियों में खीरे और टमाटर जैसी ताजी सब्‍ज‍ियों को सैंडव‍िच या पराठे में म‍िक्‍स करके बच्‍चोंं को ख‍िला सकते हैं।

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फाइबर को तय रूटीन पर बच्‍चोंं को ख‍िलाएं

  • फाइबर को खि‍लाने का समय फ‍िक्‍स करेंगे, तो पाचन बेहतर रहेगा और फाइबर खाने की आदत बनेगी।
  • फाइबर की मात्रा बढ़ाने पर शुरू में हल्‍की गैस हो सकती है।
  • अगर बच्‍चे को ब्‍लोट‍िंग, पेट दर्द जैसे लक्षण महसूस हों, तो फाइबर की मात्रा घटा दें या कुछ समय के ल‍िए बंद कर दें।

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एक साथ ज्‍यादा फाइबर न दें और वैरायटी म‍िक्‍स करें

  • बच्‍चों को अचानक से ज्‍यादा फाइबर न दें। फाइबर पाचन के ल‍िए फायदेमंद होता है, लेक‍िन जरूरत से ज्‍यादा फाइबर पेट दर्द या अन्‍य पाचन समस्‍या का कारण बन सकता है। इसल‍िए धीरे-धीरे करके उम्र के मुताब‍िक, फाइबर की मात्रा को बढ़ाना चाह‍िए।
  • इसके साथ ही फाइबर की मात्रा को बढ़ाने का यह मतलब नहीं है क‍ि केवल फल-सब्‍जी या कोई एक प्रकार का फाइबर देना है। बच्‍चों को फाइबर के अलग-अलग प्रकार दें ताक‍ि पेट सभी प्रकार के फाइबर को डाइजेस्‍ट करने का आदी हो।

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बच्‍चों को क‍िस उम्र में क‍ितना फाइबर दें?

  • 11 साल और उससे ज्‍यादा उम्र- करीब 25 से 30 ग्राम फाइबर
  • 5 से 11 साल- करीब 20 ग्राम फाइबर
  • 2 से 5 साल- करीब 15 ग्राम फाइबर
  • 6 से 12 महीने- करीब 5 ग्राम फाइबर

न‍िष्‍कर्ष:

बच्‍चों की उम्र के मुताब‍िक धीरे-धीरे उनकी डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ा सकते हैं। अचानक से मात्रा ज्‍यादा होने पर पाचन की समस्‍याएं हो सकती हैं। बच्‍चों को तय समय पर अलग-अलग वैरायटी का फाइबर दें। साथ ही ब्‍लोटि‍ंंग या पेट दर्द जैसे लक्षण नजर आने पर फाइबर की मात्रा घटा दें।

FAQ

  • फाइबर का सेवन कब नहीं करना चाह‍िए?

    डायर‍िया, पहले से गैस या ब्‍लोट‍िंग होने पर, पेट में इंफेक्‍शन जैसी स्‍थ‍ित‍ियों में फाइबर का सेवन करने से पहले डॉक्‍टर की सलाह लेनी चाह‍िए।
  • शरीर में फाइबर की कमी से क्‍या होता है?

    फाइबर की कमी से कब्‍ज, आंतों की खराब सेहत, ब्‍लोट‍िंग, अपच, असंतुल‍ित शुगर लेवल जैसी समस्‍याएं हो सकती हैं। 

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Yashaswi Mathur

Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Apr 30, 2026 15:05 IST

    Modified By : Yashaswi Mathur
  • Apr 30, 2026 15:05 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Neha Mohan Sinha

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