गलत खानपान से हो सकता है लिवर एब्सेस, इन तरीकों से संभव है इलाज

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 09, 2018
Quick Bites

  • एक खास तरह का ज़ख्म होता है, जिसमें पस बनने लगता है।
  • डायबिटीज़ के मरीज़ों का इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो जाता है।
  • लिवर कई तरह प्रोटीन, एंजाइम और हॉर्मोंस बनाने का भी काम करता है।

खानपान के मामले में की गई लापरवाही की वजह से ही आजकल लोग लिवर संबंधी जिन बीमारियों के शिकार हो रहे हैं, लिवर एब्सेस उनमें सबसे प्रमुख समस्या है। एक खास तरह का ज़ख्म होता है, जिसमें पस बनने लगता है। अगर सही समय पर उपचार न कराया जाए तो यह फोड़ा फूट सकता है और इससे निकलने वाली गंदगी रक्त प्रवाह के ज़रिये शरीर के अन्य हिस्सों में पहुंचकर उन्हें संक्रमित कर सकती है।

कैसे काम करता है लिवर

सरल ढंग से इसकी कार्य प्रणाली को कुछ इस ढंग से समझा जा सकता है कि हम जो कुछ भी खाते हैं, वह पहले आंतों में जाता है। वहां मौज़ूद एंजाइम्स भोजन को बारीक कणों में परिवर्तित कर देते हैं। इसके बाद आंतों से यह आधा पचा हुआ भोजन लिवर में जाकर स्टोर होता है। हमारे शरीर का यह महत्वपूर्ण अंग उस केमिकल फैक्ट्री की तरह होता है, जो अधपचे भोजन के बारीक कणों में से पोषक तत्वों को छांट कर अलग करता है और रक्त प्रवाह के साथ सभी विटमिंस और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स हमारे उन अंगों तक पहुंचते हैं, जहां उनकी ज़रूरत होती है। यह उन विषैले तत्वों को अलग करता है, जो पानी में घुलनशील होते हैं। फिर यह उन्हें किडनी में भेज देता है। इस तरह वे हानिकारक तत्व यूरिन के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

इसके अलावा जो अवशेष पानी में घुलने के योग्य नहीं होता, वह लिवर से मलाशय में चला जाता है और स्टूल के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है। इतना ही नहीं, हम जो भी दवाएं खाते हैं, लिवर उसके विषैले तत्वों को निष्क्रिय करने का भी काम करता है। यह रक्त में फैट, अमीनो एसिड और ग्लूकोज़ के स्तर को नियंत्रित रखता है और शरीर को इन्फेक्शन और हैमरेज से भी बचाता है। लिवर कई तरह प्रोटीन, एंजाइम और हॉर्मोंस बनाने का भी काम करता है, जो हमारे शरीर को बीमारियों से बचाते हैं और टूटी-फूटी कोशिकाओं के मरम्मत में भी सहायक होते हैं। लिवर में आयरन, ज़रूरी विटमिंस और केमिकल्स का संग्रह होता है और यहीं से शरीर की ज़रूरत के मुताबिक इन तत्वों की आपूर्ति होती है। आकस्मिक रूप से जब भी शरीर को एनर्जी की ज़रूरत होती है तो यह स्टोर किए गए कार्बोहाइड्रेट को ग्लाइकोजेन में परिवर्तित करके शरीर को तुरंत एनर्जी देता है।       

क्या है वजह

अगर जैविक कारणों की बात की जाए तो इसके लिए आमतौर पर प्रोटोजोआ प्रजाति के परजीवी कीटाणु को जि़म्मेदार माना जाता है। ऐसी समस्या को एमेबिक लिवर एब्सेस कहा जाता है। इसके अलावा बैक्टीरिया या वायरस की वजह से भी यह बीमारी हो सकती है। खानपान में स्वच्छता की कमी भी लिवर को संक्रमित कर सकती है। इसके अलावा सिगरेट और एल्कोहॉल का अधिक सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, जिससे लिवर डैमेज हो सकता है। कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में इसकी आशंका बढ़ जाती है। टीबी होने पर उसके वायरस लिवर को भी प्रभावित करते हैं, जो अंतत: इस बीमारी का कारण बन जाते हैं। डायबिटीज़ के मरीज़ों का इम्यून सिस्टम कमज़ोर हो जाता है, जिससे उनके लिवर में भी संक्रमण हो सकता है।  

प्रमुख लक्षण

  • पाचन संबंधी समस्याएं, जैसे पेट में दर्द, कब्ज़ या लूज़ मोशन और वोमिटिंग 
  • हलका बुखार
  • भोजन में अरुचि
  • थकान और बेचैनी
  • वज़न का घटना

जांच एवं उपचार

शुरुआती दौर में लिवर से संबंधित बीमारियों का कोई लक्षण नज़र नहीं आता। इसलिए अगर कोई समस्या न हो तो भी 40 साल की उम्र के बाद सभी को साल में एक बार लिवर फंक्शन टेस्ट और फाइब्रोस्कैन ज़रूर करवा लेना चाहिए। सबसे पहले अल्ट्रासाउंड द्वारा इस समस्या की पहचान की जाती है। अगर लिवर में कोई ज़ख्म हो तो  शुरुआत में मरीज़ को एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं, जिससे 15-20 दिनों के भीतर वह घाव सूख जाता है। अगर तकलीफ ज्य़ादा बढ़ जाए तो खास तरह की नली या सिरिंज द्वारा उसके पस को बाहर निकाला जाता है। अगर ज़्यादा गंभीर स्थिति हो तो सर्जरी के ज़रिये लिवर के क्षतिग्रस्त भाग को काटकर अलग कर दिया जाता है लेकिन कुछ समय के बाद यह हिस्सा अपने आप दोबारा विकसित हो जाता है।

इसके बाद मरीज़ को एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। हां, अगर किसी को डायबिटीज़ हो तो सर्जरी के बाद उसे दोबारा स्वस्थ होने में थोड़ा अधिक समय लगता है। लिवर एब्सेस के मरीज़ उपचार के बाद पूर्णत: स्वस्थ हो जाते हैं लेकिन बाद में अल्ट्रासाउंड कराने पर रिपोर्ट में उनके लिवर पर घाव के निशान नज़र आते हैं, जिसे देख वे डर जाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि बीमारी ने दोबारा उन्हें अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया है पर वास्तव में ऐसा नहीं होता। फिर भी एहतियात के तौर पर साल में एक बार लिवर फंक्शन टेस्ट करवा लेना चाहिए।

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