आंख की बीमारी ‘केराटोकोनस’ क्या है? डॉक्टर से जानें क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण

केराटोकोनस आंख की दुर्लभ बीमारी है। यह अक्सर 10 से लेकर 20 साल तक के बच्चों में दिखाई देती है। 

Meena Prajapati
Written by: Meena PrajapatiPublished at: Jul 26, 2021Updated at: Jul 26, 2021
आंख की बीमारी ‘केराटोकोनस’ क्या है?  डॉक्टर से जानें क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण

केराटोकोनस (Keratoconus) आंख की बढ़ती हुई बीमारी है। इस बीमारी में आंख की पुतली शंकु की तरह बाहर उभरी हुई दिखती है। विजन आई सेंटर में नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. तुषार ग्रोवर का कहना है कि केराटोकोनस दो शब्द केराटो और कोन से मिलकर बना है। केराटो का मतलब होता है कॉर्निया और कोन का मतलब होता है शंकु। डॉ. तुषार का कहना है कि पुतली या कॉर्निया कमजोर होने की वजह से कॉर्निया का आकार शंकु की तरह हो जाता है। इसलिए जो किरणें कॉर्निया पर पड़ती हैं तो वो एक शार्प इमेज बनाती हैं जिससे हमें साफ दिखता है। लेकिन कॉर्निया कमजोर होने की वजह से जब उसका आकार बदल जाता है तो हमें साफ नहीं दिखता, क्योंकि आंख के पर्दे पर साफ छवि नहीं बनती।

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डॉ. तुषार का कहना है कि केराटोकोनस अक्सर 20 साल तक की उम्र के लोगों को हाता है। यह 30 तक भी बढ़ सकता है। इस बीमारी में कॉर्निया का आकार बदल जाता है और पतला हो जाता है। आइए डॉ.तुषार से जानते हैं कि केराटोकोनस के लक्षण, कारण और उचार क्या हैं।

केराटोकोनस के लक्षण

  • नजर कमजोर होना
  • चश्मे की पावर फ्रीक्वेंटली चेंज होना
  • शुरूआती चरण में इसे पहचानना मुश्किल है
  • चश्मा पहनने से भी आंख का नंबर बढ़ता रहता है
  • धुंधला दिखना
  • आंखों में रोशनी अधिक लगना
  • रात में गाड़ी चलाने में परेशानी

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केराटोकोनस के कारण

एलर्जी

डॉ. तुषार का कहना है कि जिन लोगों को आंख की एलर्जी होती है, जिस वजह से वे आंख को मलते रहते हैं, तो ऐसे लोगों को केराटोकोनस जल्दी होता है। आंखों का मलना, रब करना, खुजली करना आदि कारणों से केराटोकोनस होता है। 

जेनेटिक कारण

अगर किसी व्यक्ति के घर में केराटोकोनस की फैमिली हिस्ट्री रही है तब भी यह बीमारी होने की आशंका बन जाती है। 

गंभीर बीमारियां

गंभीर बीमारियां जैसे डाउन सिंड्रोम, अस्थमा, हे फीवर आदि में भी आंखों का कॉर्निया कमजोर होता है। जिस वजह से भी केराटोकोनस होता है।  

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कॉन्टेक्ट लैंस

विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में होने वाली यह बीमारी केराटोकोनस तब भी होता है जब कॉन्टैक्ट लैंस ठीक से नहीं लग पाते हैं। ऐसी परिस्थिति में आंख का कॉर्निया क्षतिग्रस्त हो जाता है, इसलिए यह परेशानी होती है।

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उपचार

डॉ. तुषार का कहना है कि अभी तक केराटोकोनस होने के स्पष्ट कारण नहीं मालूम हुए हैं, लेकिन ऊपर बताए गए कारण कुछ शोधों में सामने आए हैं। इस बीमारी से बचने के लिए क्या उपचार अपनाए जाते हैं, वे निम्न हैं-

सही समय पर इलाज

डॉ. तुषार का कहना है कि केराटोकोनस का इलाज के लिए जरूरी है कि ठीक समय पर इसकी पहचान हो जाए। जब किसी मर्ज की पहचान ठीक समय पर हो जाती है, तब उसका इलाज करना आसान होता है। यही वजह है कि अगर मरीज केराटोकोनस के शुरूआती लक्षणों को पहचान लें तो इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। सही पर पहचान होने पर डॉक्टर कॉर्निया की शेप और उसकी फिटनेस की जांच करते हैं। तब उन्हें उसकी सही स्थिति मालूम होती है। और उसका सही निदान ढूंढ पाते हैं। 

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सर्जरी

डॉ. तुषार का कहना है कि मरीज की आंख की जांच करने के बाद कॉर्नियल क्रॉस लिंकिंग सर्जरी की जाती है। इस सर्जरी से कॉर्निया के बदलते आकार को रोका जा सकता है। इस सर्जरी से बीमारी बढ़ने से रोकी जाती है। उसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता है पर रोका जा सकता है। 

केराटोकोनस आंख की दुर्लभ बीमारी है। यह अक्सर 10 से लेकर 20 साल तक के बच्चों में दिखाई देती है। लेकिन डॉ. तुषार का कहना है कि अब केराटोकोनस को दुलर्भ बीमारी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि हाल के दिनों में इस बीमारी के मामले बढ़ हैं। केराटोकोनस से बचने के एक ही उपाय है कि समय-समय पर डॉक्टर से आंख की जांच कराते रहें ताकि सही समय पर इसके लक्षणों को पहचाना जाए। 

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