बदलती लाइफस्टाइल, देर रात तक जागना, बाहर का तला-भुना खाना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी, ये सब हमारे पाचन तंत्र पर सीधा असर डालते हैं। ऐसे में अक्सर घर के बड़े एक ही सलाह देते हैं कि खाने के साथ दही ले लो या एक गिलास छाछ पी लो, सब ठीक हो जाएगा, लेकिन क्या सच में दही और छाछ दोनों पाचन के लिए बराबर फायदेमंद हैं? या फिर इनमें से कोई एक ज्यादा बेहतर विकल्प है? देखने में दोनों एक जैसे लगते हैं, क्योंकि दोनों ही दूध से बनते हैं और ठंडक देने वाले माने जाते हैं। फिर भी इनके गुण, तासीर और शरीर पर असर अलग-अलग हो सकते हैं। इस लेख में जयपुर स्थित Angelcare-A Nutrition and Wellness Center की निदेशक, डाइटिशियन एवं न्यूट्रिशनिस्ट अर्चना जैन से जानिए, डाइजेशन के लिए छाछ अच्छी है या दही ?
छाछ या दही: पाचन के लिए क्या है बेहतर?
डाइटिशियन अर्चना जैन के अनुसार, दोनों ही डेयरी प्रोडक्ट्स प्रोबायोटिक गुणों से भरपूर होते हैं, लेकिन इनके प्रभाव और उपयोग का तरीका अलग है। इनका असर व्यक्ति की पाचन क्षमता, शरीर और मौसम पर निर्भर करता है।
दही का असर
डाइटिशियन अर्चना जैन बताती हैं कि दही में अच्छे बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो आंतों में हेल्दी माइक्रोबायोटा को बढ़ावा देते हैं। डाइटिशियन अर्चना जैन बताती हैं कि दही में प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन B12 जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह आंतों की सेहत को बेहतर बनाता है और कब्ज की समस्या में राहत दे सकता है। हालांकि, जिन लोगों को एसिडिटी या भारीपन की शिकायत रहती है, उनके लिए दही कभी-कभी गैस या ब्लोटिंग का कारण बन सकता है, खासकर अगर इसे रात में खाया जाए।
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छाछ का असर
छाछ, दही को मथकर उसमें से मक्खन निकालने के बाद बचा हुआ पतला हिस्सा होता है। इसे पानी मिलाकर और कभी-कभी जीरा, काला नमक या पुदीना डालकर पिया जाता है। डाइटिशियन अर्चना जैन के अनुसार, छाछ दही की तुलना में हल्की और कम फैट वाली होती है। यह पेट को ठंडक देती है और खाने के बाद इसे पीने से पाचन क्रिया बेहतर होती है। छाछ में मौजूद प्रोबायोटिक्स और इलेक्ट्रोलाइट्स शरीर को हाइड्रेट रखने में भी मदद करते हैं, खासकर गर्मियों में।
क्या कहती है स्टडी
PubMed की स्टडी के अनुसार, बैलेंस डाइट के साथ नियमित रूप से दही (Curd) का सेवन डाइजेशन में सुधार करता है। स्टडी में पाया गया कि दही खाने से पेट दर्द के लक्षणों में 19% और मल त्याग (deposition scores) की क्वालिटी में 16% तक सुधार हुआ। यह डेयरी प्रोडक्ट पेट की संवेदनशीलता को कम करने और पाचन को सुचारू बनाने में सहायक है। दही से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल हेल्थ बेहतर होती है।
डाइटिशियन की सलाह
डाइटिशियन अर्चना जैन बताती हैं कि अगर पाचन सुधारना है, तो छाछ ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकती है। इसका कारण है कि यह हल्की होती है, जल्दी पच जाती है और पेट में भारीपन नहीं करती। भोजन के बाद एक गिलास हल्की मसाला छाछ गैस, अपच और एसिडिटी से राहत दिलाने में सहायक हो सकती है। वहीं दही ज्यादा गाढ़ा होता है, इसलिए यह उन लोगों के लिए बेहतर है जिन्हें अतिरिक्त प्रोटीन और कैल्शियम की जरूरत है। अगर किसी को लैक्टोज इनटॉलरेंस की हल्की समस्या है, तो छाछ दही की तुलना में ज्यादा आसानी से पच सकती है।

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सेवन का सही तरीका
दही को हमेशा ताजा और घर का बना हुआ खाने की सलाह दी जाती है। इसमें चाहें तो थोड़ा सा भुना जीरा या काली मिर्च मिला सकते हैं, जिससे यह और सुपाच्य हो जाता है। छाछ को भोजन के बाद लेना सबसे बेहतर माना जाता है, इसमें सेंधा नमक, भुना जीरा और पुदीना मिलाने से इसके फायदे बढ़ जाते हैं। रात में दही खाने से बचें, खासकर अगर आपको सर्दी-खांसी या गले की समस्या रहती है।
निष्कर्ष
छाछ और दही दोनों ही सेहत के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन पाचन के लिहाज से छाछ ज्यादा हल्की और आसान विकल्प मानी जाती है। वहीं दही पोषण से भरपूर है और आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है। डाइटिशियन अर्चना जैन की सलाह है कि अपनी बॉडी टाइप, मौसम और पाचन क्षमता को ध्यान में रखकर चुनाव करें।
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FAQ
पाचन शक्ति खराब होने के क्या लक्षण हैं?
अगर आपको बार-बार गैस, पेट फूलना, एसिडिटी, कब्ज, पेट दर्द या खाने के बाद भारीपन महसूस होता है, तो यह कमजोर पाचन के संकेत हो सकते हैं।पाचन मजबूत करने के लिए क्या खाएं?
फाइबर से भरपूर फड्स, जैसे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और सलाद पाचन के लिए अच्छे होते हैं। साथ ही दही, छाछ और अन्य प्रोबायोटिक फूड्स आंतों में अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाते हैं।कब्ज से राहत पाने के लिए क्या करें?
डाइट में ज्यादा से ज्यादा फाइबर शामिल करें, पर्याप्त पानी पिएं और सही डेली रूटीन फॉलो करें। जरूरत पड़े तो डॉक्टर की सलाह से हल्के लैक्सेटिव या प्रोबायोटिक ले सकते हैं।
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Feb 24, 2026 18:38 IST
Modified By : Akanksha Tiwari Feb 24, 2026 18:38 IST
Modified By : Akanksha TiwariFeb 24, 2026 18:38 IST
Published By : Akanksha Tiwari
Reviewed By : Archana Jain