एड्स- AIDS IN HINDI

एड्स का पूरा नाम है 'एक्वायर्ड इम्यूलनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम' है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है। यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है। एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चों में फैलता है, असुरक्षित संबंध बनाने से फैलता और संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई से फैलता है। हर साल 1 दिसंबर को अंर्तराष्ट्रीय स्तर को वर्ल्ड एड्स मनाया जाता है। इसे मनाने का मकसद लोगों में इसके प्रति जागरुकता फैलाना है।

एड्स के लक्षण

1. सूखी खांसी होना एड्स के लक्षणों में शामिल है। अगर किसी को खांसी नहीं हैं लेकिन मुंह में हमेशा कफ आता रहता है। मुंह का स्वाकद खराब रहता है। इसमें से कोई भी लक्षण लगने पर एच आई वी टेस्टे जरूर करवाएं।

2. भारी काम या शारीरिक श्रम किए बिना भी अगर किसी को मसल्सभ में हमेशा तनाव और अकड़न का एहसास होता है। तो यह एड्स का लक्षण होता है। तुरंत अपने चिकित्सलक के पास जाएं।

3. बिना ज्यातदा काम किए पिछले दिनों से ज्या दा थकान का होना या हर समय थकावट महसूस करना एड्स का शुरुआती लक्षण हो सकता है।

4. गला पकाने की शिकायत अकसर तब होती है जब हम कम पानी पीते हैं। लेकिन अगर पर्याप्तथ मात्रा में पानी पीने के कारण भी गले में भयंकर खराश और पका हुआ महसूस होता है तो यह एड्स संभावित लक्षण है।

5. एड्स होने पर शरीर पर सूजन भरी गिल्टियां हो सकती हैं, खासकर यह दर्दरहित गिल्टियां गले, बगल या जांघों आदि में होती  है।

6. एड्स से पीड़‍ित व्यक्ति का वजन एकदम से नहीं घटता लेकिन धीरे-धीरे बॉडी पर प्रभाव पड़ता है और वजन में कमी होती है। अगर किसी का वजन बिना प्रयास के कुल भार का दस प्रतिशत तक कम हो जाता है तो तुरंत चेक करवा लें।

7. हर दो तीन दिन में बुखार महसूस होना, बुखार का तेज होना या एक महीने से ज्यातदा बुखार आना, एच आई वी का सबसे पहला लक्षण होता है।

8. ढ़लती उम्र से पहले ही अगर जोड़ों में दर्द और सूजन हो जाती है या फिर सिर में हर समया हल्का  हल्का, दर्द रहता है। यह दर्द सुबह के समय दर्द में आराम और शाम तक दर्द बढ़ने लगता हे तो आपको एच आई वी टेस्टह करवाने की जरूरत है।

एड्स फैलने के कारण

1. असुरक्षित संबंध इसका सबसे प्रमुख कारण है, इससे एड्स के वायरस एड्स ग्रस्त व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में तुरंत प्रवेश कर जाते हैं।

2. बिना जाँच का खून मरीज को देना भी एड्स फैलाने का माध्य होता है। खून के द्वारा इसके वायरस सीधे खून में पहुंच जाते हैं और बीमारी जल्दी घेर लेती है। आज एड्स जांच केन्द्र देश के गिने-चुने स्थानों पर ही हैं, कितने लोग अपना टेस्ट कराकर खून दान करते होंगे?

3. नशीले पदार्थ लेने वाले लोग भी एड्स ग्रस्त होते हैं, वे एक-दूसरे की सिरींज-निडिल वापरते हैं, उनमें कई एड्स पीड़ित होते हैं और बीमारी फैलाते हैं।

4. यदि मां संक्रमित है एड्स से, तो होने वाला शिशु भी संक्रमित ही पैदा होता है। इस प्रकार ट्रांसप्लांटेशन संक्रमण से भी एड्स लगभग 60 प्रतिशत तक फैलता है। बाकी बचा 40 प्रतिशत मां के दूध से शिशु में पहुँच जाता है।

एड्स का इलाज

एंटीरिट्रोवायरल थेरेपी या आर्ट (ART) 1996 में सामने आई। दुनिया भर में ऐसा माना जाता है कि यह तकनीक इस बीमारी से जल्दे होने वाली मौत को रोक सकती है। आर्ट की वजह से इस बीमारी से संक्रमित लोगों की जीवनशैली में बेहद सकारात्महक परिवर्तन आया है। अगर एचआईवी संक्रमित साथी आर्ट के जरिए अपना इलाज करवा रहा है तो इससे उसके स्व‍स्थ् साथी को यह वायरस पहुंचने की संभावना भी कम हो जाती है। निम्नच और मध्य म आय वर्ग के देशों में करीब 80 लाख एचआईवी संक्रमित लोग आर्ट के जरिए इलाज करवा रहे हैं।

एड्स से संबंधित जटिलताएं

1. कैंडिडिआसिस, जीनस कैंडिडा में होने वाली यीस्टल संक्रमण है, और गंभीर मामलों में ये घेघा, श्वासनली, ब्रांकाई, और फेफड़ों के ऊतकों को प्रभावित कर सकता है।

2. कोक्कीडडियोडोमाईकासिस कोक्कीसडियोडस द्वारा होने वाला संक्रमण है, जो कभी-कभी निमोनिया का कारण भी बन सकता है।

3. क्रीप्टोकॉकसिस फंगस क्रीप्टोकॉकस नोफॉर्मन्स से होने वाला संक्रमण है, यह त्वेचा हड्डि यों और यूरीन मार्ग में फैलने से पहले फेफड़ों (निमोनिया का कारण बन) और ब्रेन

(सूजन का कारण), को प्रभावित करता है।

4. क्रिप्टोस्पोरिडियोसिस, प्रोटोजोआ परजीवी क्रिप्टोस्पोरिडियम के कारण होने वाला रोग है। यह संक्रमण और डायरिया रोग का कारण बनता है।  

5. हरपीज सिंप्लेक्स वायरस संक्रमण है, जो ब्रोंकाइटिस, निमोनिया, और ग्रासनलीशोथ की समस्या  का कारण बनता है।

6. हिस्टोप्लास्मोसिस, फंगस हिस्टोोप्ला ज्माि कॅप्सुलटूम से होने वाला लंग इंफेक्शीन है, जो फ्लू और निमोनिया के लक्षणों की तरह प्रगतिशील हिस्टोप्लास्मोसिस का कारण बनता है, यह बीमारी अन्यो अंगों को भी प्रभावित कर सकती है।

7. सेप्टीसीमिया (रक्त संक्रमण) बैक्टीरिया साल्मोनेला से होता है।

एड्स को फैलने से रोकें 

एचआईवी पॉजीटिव होने पर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और शरीर पर तरह तरह की बीमारियां और इन्फेक्शन पैदा करने वाले वायरस अटैक करने लगते हैं। अगर आप इसकी चपेट में आने से बचना चाहते हो तो इसे रोकने के उपायों के बारे में जरुर जानकारी हासिल करें। सबसे पहले अपने साथी के साथ वफादार रहें। यह हमेशा अच्छाक होता है। अपने जीवनसाथी के प्रति हमेशा वफादार रहें। बिना प्रोटेक्श न के अलग अलग पार्टनर के साथ सेक्स् संबंध बनाने से यह संक्रमण जल्दत फैलता है। संक्रमित खून चढ़ाने के कारण एड्स होने के मामले लगभग 2.57 प्रतिशत हैं। इसलिए किसी भी तरह का इंजेक्शन लगवाने से पहले लें कि उसकी सुई नयी हो नहीं तो खून से भी एड्स फैल सकता है। यदि कोई व्यीक्ति एच.आई.वी संक्रमित या एड्स ग्रसित हैं तो वह रक्तदान कभी ना करें। ज्याैदातर मामलों में एचआईवी इन्फेक्शन का पता दो हफ्ते के बाद टेस्ट कराने पर ही पता चल पाता है उससे पहले नहीं। कई मामलों तो इसमें छह महीने भी लग जाते हैं। एचआईवी को शरीर में ऐक्टिव होने में छह महीने तक लग सकते हैं। इसलिए तीसरे और छठे महीने बाद एक बार फिर एच.आई.वी परीक्षण अवश्य दोहरायें। यूएस हेल्थस एंड सर्विस डिपार्टमेंट के अनुसार,मां के दूध में भी एचआईवी वाइरस हो सकते हैं इसलिये यदि किसी को एड्स हो गया है तो उसे बच्चे‍ को स्त नपान नहीं करवाना चाहिए। इसके लिए एचआईवी पॉजीटिव माताएं बच्चे  को अपना दूध न पिलाकर तथा एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी के उपयोग से बच्चे  के संक्रमित होने के जोखिम को कम कर सकती है।

एड्स से बचने की आयुर्वेदिक टिप्स

1. एड्स के लिए आयुर्वेदिक उपचार के साथ-साथ, पौष्टिक आहार, व्यायाम और योगा, अवसरवादी संक्रमण के लिए समय पर एलोपेथिक उपचार और नियमित रूप से परामर्श लेना एड्स के रोगियों के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं। एचआईवी/एड्स के उपचार के लिए आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी बूटी में, अमालाकी, अश्वगंधा, और तुलसी है। आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग रोगियो में एड्स के वायरस को खत्म करने, इम्यून डेवलपर, या शरीर को साफ करने के लिए किया जा सकता है।

2. वायरस किलर के रूप में आयुर्वेदिक दवाएं : विभिन्न आयुर्वेदिक दवाइयां जैसे कि ऐरी चथुरा, त्रिफला, सक्षमा त्रिफला शक्तिशाली वायरस किलर है जो एचआईवी वायरस को भी मार सकते है। ये दवाएं संयुक्त हो सकती है या एलोपेथिक दवाओं के साथ इस्तेमाल में लाई जा सकती है।

3. इम्यून डेवलपर्स के रूप में आयुर्वेदिक दवा: ये आयुर्वेदिक दवाएं इम्यूनिटि को बढ़ाती है, सीडी4 सेल के साथ साथ सीडी8 कोशिका को भी एचआईवी से लड़ने के लिए जाना जाता है। च्यवनप्राश, अश्वगंधा रसायन, अजमामसा रसायन, कनमाड़ा रसायन, शोनिथा बस्कारा अरिश्ठा ऐसी दवाए है जो कि प्रतिरक्षा को बढ़ावा देती है।

4. शारीरिक क्लींसर के रूप में आयुर्वेदिक दवा: इन आयुर्वेदिक दवाओं शरीर को साफ करने, नसों, यहां तक कि कोशिकाओं को साफ करती है। शोनीथा बस्कारा अरिष्ठा, ननार्य अरिष्ठा, क्शीरा बाला कुछ आयुर्वेदिक दवाएं है जोकि प्रतिऱक्षा को बढ़ाती है और बॉडी क्लींसर के रूप में कार्य करती है।

5. आयुर्वेद के साथ सावधानीः आयु्र्वेदिक दवाएं एचआईवी/एड्स के रोगियों के उपचार में उपयोगी है लेकिन ये दवाएं पूरी तरह से इलाज नही कर सकती। एंटीरिट्रोवाइरल औषधियां के विपरित वे जल्दी असर नही दिखाती है। कुछ आयुर्वेदिक दवाएं आपके एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी से सबंधित हो सकती है। आयुर्वेदिक दवाओं के चयन से पहले अपने डॉ. से पूछे बिना एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी लेना बंद न करें।

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