LGBTQ युवाओं में अक्सर देखी जाती हैं ये मानसिक परेशानियां, एक्सपर्ट से जानें इससे बचाव के लिए क्या करें

जानें एलजीबीटीक्यू में कौन-कौन आते हैं। उन्हें किस प्रकार की होती है परेशानी, निजात पाने के लिए क्या करें।

Satish Singh
Written by: Satish SinghUpdated at: Aug 10, 2021 16:30 IST
LGBTQ युवाओं में अक्सर देखी जाती हैं ये मानसिक परेशानियां, एक्सपर्ट से जानें इससे बचाव के लिए क्या करें

प्रकृति की बनाई हर एक चीज, इंसान, जानवर, पेड़-पौधे, नदी, पहाड़ .... सब कुछ बेशकीमती हैं। ऊपर वाले ने हमें जो कुछ भी दिया है हमें उसकी इज्जत करनी चाहिए। इनके साथ आपसी मेलजोल बनाकर रहना चाहिए। एलजीबीटीक्यू... यह शब्द आज भी समाज के टैबू के समान है। इसका अर्थ लेसबियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वेश्चनिंग (questioning) कहा जाता है। इनपर खुलकर चर्चा करने से लोग करताते हैं। समाज का यह तबका आज भी अपने अधिकारों, समाज में उनकी सहभागिता सहित इज्जत को लेकर संघर्ष कर रहा है। हमारे ही बीच, हमारे समाज का यह एक ऐसा वर्ग है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, इज्जत, समाज में रहने जैसे कई मुद्दों को लेकर दबाया जाता है। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं व डॉक्टरों के साथ बुद्धिजीवियों के आगे आने से धीरे-धीरे माहौल बदल रहा है। पहले इसी समाज में रहने के बावजूद जो अपना नाम-पहचान छुपाते थे, अब वो खुलकर सामने आ रहे हैं और अधिकारों की बात कर रहे हैं। एक्सपर्ट पदमा कुमारी, जिन्होंने सेक्शुअल रिप्रोडक्शन हेल्थ एंड राइट (एसआरएचआर) विषय पर थाइलैंड से स्पेशलाइजेशन कर पूरे झारखंड में फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया की बतौर ब्रांच मैनेजर बन 10 साल एलजीबीटीक्यू समाज के लोगों के लिए काम किया। पदमा से बात कर आर्टिकल में हम एलबीजीटीक्यू समाज से आने वाले लोगों के मेंटल हेल्थ चैलेंजर पर बात करेंगे।

मानसिक स्वास्थ्य को समझने से पहले समझना होगा एलजीबीटीक्यू

एक्सपर्ट बताती हैं कि एलजीटीक्यू लोगों को सामान्य लोगों की समस्याओं से काफी ज्यादा तनाव झेलना पड़ता है। इसके लिए एलजीबीटीक्यू को समझाना होगा। इंसानों में दो जेंडर का हैं, पुरुष-महिला। जो स्वभाविक तौर पर लोग होते हैं। लेकिन ऐसे लोग जिनकी सेक्शुअल ओरिएंटेशन (सेक्शुअल इच्छाशक्ति) और जेंडर आइडेंटिफिकेशन अलग है वो लोग एलजीबीटीक्यू की श्रेणी में आते हैं।

सेक्शुअल ओरिएंटेशन श्रेणी क्या है

एसआरएचआर स्पेशलिस्ट पदमा बताती हैं कि पुरुष-महिला इन दो जेंडर के अलावा तीसरा जेंडर भी है। जिसे भारत सरकार ने भी सहमति प्रदान की है। उन्हें भी वोट देने के अधिकार के साथ सरकारी संस्थानों सहित कहीं भी काम करने का अधिकार है। जो कि पहले नहीं था। सेक्शुअल ओरिएंटेशन में वैसे लोग आते हैं जो पुरुष होते हैं व इमोशनली तौर पर पुरुष या फिर महिला के प्रति आकर्षित होते हैं। ऐसी महिला जो जन्मजात महिला हैं लेकिन इनका सेक्शुअल झुकाव महिला के प्रति या फिर महिला-पुरुष दोनों के प्रति है।

इसके भी हैं तीन प्रकार

होमोसेक्शुअल

होमोसेक्शुअल की श्रेणी में वैसे पुरुष व महिला आते हैं जिनका अट्रैक्शन अपने ही लिंग (जेंडर) में होता है। उदाहरण के तौर पर महिला-महिला को पसंद करती है व पुरुष -पुरुष को पसंद करते हैं।

हेट्रोसेक्शुअल

इस श्रेणी में समाज के अधिकतर होग हैं। सामान्य तौर पर पुरुष का झुकाव महिला की तरफ और महिला का झुकाव पुरुष की तरफ होता है। शादी भी अपोजिट लिंग में ही करते हैं। इस श्रेणी में आने वाले लोग समाज में खुलकर जी पाते हैं।

बायसेक्शुअल

इस श्रेणी में वैसे लोग आते हैं जिना अट्रैक्शन पुरुष-महिला दोनों की ही ओर होता है। यदि कोई पुरुष है तो उसका झुकाव महिला-पुरुष के लिए व महिला है तो उसका झुकाव महिला-पुरुष के लिए होता है।

LGBTQ Mental Health Challanges

क्या जेंडर आइडेंटिटी

एसआरएचआर स्पेशलिस्ट एक्सपर्ट पदमा के अनुसार हमारे समाज ने सिर्फ दो ही जेंडर पुरुष व महिलाओं को वर्गीकृत किया है। उदाहरण के तौर पर कोई पुरुष है तो उसे पुरुषों के समान कपड़े पहनना, चाल-ढाल, बातचीत आदि उसकी जेंडर आईडेंटिटी है। महिलाओं के लिए साड़ी, बिंदी जैसे पहनावा उनकी जेंडर आइडेंटिटी को दर्शाता है।

लेकिन हर इंसान की फीलिंग्स अलग होती है, लोगों को उनकी फीलिंग्स के आधार पर भी जेंडर आइटेंटिटी का चुनाव करने की छूट देनी चाहिए। एसआरएचआर विषय की स्पेशलिस्ट बताती हैं कि जन्मजात यदि कोई पुरुष है, लेकिन उसके अंदर महिलाओं जैसे विचार आ रहे हैं, महिलाओं की तरह बातें करना, कपड़े पहनना आदि। तो उसकी इस आइडेंटिटी को भी स्वीकार करना चाहिए। ऐसा महिलाओं के साथ भी हो सकता है, महिला होने के बावजूद उनमें पुरुषों की तरह दिखने, बात करने, चलने-फिरने की इच्छा होती है। ऐसे लोग ही आगे चलकर मानसिक रूप से ग्रसित होते हैं।

नॉन बाइनरी श्रेणी को नहीं मिलती सामाजिक स्वीकृति

एसआरएचआर की स्पेशलिस्ट बताती हैं कि इस श्रेणी में यह न तो पुरुष होते हैं व न ही महिलाएं। यही कारण है कि समाज इन्हें स्वीकारता नहीं है।

ट्रांस जेंडर

इस श्रेणी में वैसे लोग आते हैं जो पुरुष होते हैं लेकिन महिलाओं की तरह उनका व्यव्हार होता है। महिलाओं के केस में वो जन्मजात महिलाएं होती हैं लेकिन पुरुषों की रहन-सहन व स्वभाव रखना चाहती हैं।

इंटर सेक्स

एक्सपर्ट बताती हैं कि इस श्रेणी में वैसे लोग आते हैं जो जन्मजात सेक्स हार्मोन के विकसित न होने के कारण उनमें सेक्स ऑर्गन (अंग) ऊभर कर नहीं आते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई महिला है तो उसमें सेक्स ऑर्गन उभर कर नहीं आ पाता। ऐसा पुरुषों के साथ भी होता है, पुरुष होने के बावजूद उनके सेक्स ऑर्गन उभर कर नहीं आ पाते। यह जेनेटिक डिसऑर्डर की श्रेणी में आता है।

एसआरएचआर की स्पेशलिस्ट पदमा बताती हैं कि एलजीबीटीक्यू को वर्गीकृत करना आसान नहीं है। यही कारण है कि ये लोग सबसे ज्यादा मानसिक रूप से तनाव झेलते हैं।

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पहचान नहीं होने की वजह से मानसिक तनाव

एसआरएचआर स्पेशलिस्ट बताती हैं कि कोई भी बच्चा 9वीं -10वीं तक आते आते उसे समझ में आ जाता है कि उसका जेंडर क्या है। यदि लड़का है और उसे लड़कियों की तरह कपड़े पहनना, मेकअप करना आदि पसंद है। लेकिन इस पहचान को सामाज स्वीकार नहीं कर पाने की वजह से वो अंदर ही अंदर डिप्रेशन में चला जाता है। उसकी पढ़ाई पर असर पड़ता है, दोस्तों के साथ समाज में एडजस्ट नहीं हो पाता है... कई केस में देखा जाता है कि बच्चे घर छोड़कर भाग जाते हैं।

आइडेंटिटी क्राइसिस के कारण मानसिक तनाव के कारण

  • सोसायटी से सामाजिक स्वीकार न किया जाना
  • अपनी फैमिली के लोगों द्वारा ही जेंडर आइटेंटिटी को छुपाना
  • एलजीबीटीक्यू समाज से आने वाले खुद की शर्तों पर न जी पाने के कारण होने वाला तनाव
  • जेंडर को लेकर बार-बार सोचने की वजह से मानसिक तनाव
  • पहचान खुलकर न बता पाने के कारण मानसिक तनाव
  • बच्चों में पढ़ाई पूरी न हो पाने के कारण मानसिक तनाव
  • समाज, ऑफिस, घर, स्कूल, बस में लोगों के द्वारा मजाक उड़ाने के कारण
  • बड़ों में रोजगार न मिलने के कारण मानसिक तनाव
  • कहीं नौकरी कर रहे हों व आसपास के सहकर्मी न स्वीकारें तो उसके कारण तनाव
  • जेंडर आइटेंटिटी छुपाकर परिवार के लोगों ने शादी करा दी तो उसके कारण तनाव, तलाक, यहां तक कि सुसाइड भी

कई लोगों की पैरेंट्स करा देते हैं शादी

एक्सपर्ट बताती हैं कि आज भी हमारे समाज में कई लोग ऐसे हैं जो यह मानने को तैयार ही नहीं कि जेंडर आइटेंटिटी मानसिक तौर पर भी हो सकता है। इस कारण वो अपने बेटे-बेटियों की शादी जबरन करवा देते हैं। कई लोग तो ऐसे में सालों-साल जिंदगी गुजार देते हैं तो कई खुलकर आगे आते हैं। वहीं इन लोगों में तनाव की बड़ी वजह यह भी है कि वो अपने पार्टनर के साथ इमोशनली व फिजिकली संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं। इस कारण शुरुआत के दिनों में झगड़ा, आगे चलकर मारपीट... और बात तलाक तक पहुंच जाती है। कई मामलों में तनाव इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि लोग आत्महत्या कर लेते हैं।एक्सपर्ट बताती हैं कि बच्चे इसी प्रेशर में पढ़ाई तक पूरी नहीं कर पाते हैं। इस कारण उन्हें आगे चलकर तनाव का सामना करना पड़ता है। उन्हें नौकरी नहीं मिलती है व परेशान होते हैं।

जागरूकता के कारण होती है सबसे बड़ी समस्या

हमारे समाज के लोगों में जागरूकता की काफी कमी है, इस कारण बड़े लोग यह निर्णय ही नहीं ले पाते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। बेहतर यही होगा कि पैरेंट्स को बच्चों के इमोशन को समझना होगा। जेंडर आइटेंटिटी को स्वीकार करना होगा। यदि निर्णय न ले पा रहे हैं तो जरूरी है कि एक्सपर्ट या फिर डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए। खुलकर बताने के कारण भी आगे चलकर वो कई प्रकार की परेशानियों का सामना नहीं कर सकते हैं। जैसे...

  • घर से बाहर निकलें तो अपनी शर्तों पर निकलें
  • एलजीबीटीयू समाज के लोगों के साथ दुष्कर्म के केस कम होते हैं
  • खुलकर न जी पाने की वजह से कई आत्महत्या तक का कदम उठा लेते हैं
  • अपने जेंडर व भविष्य को सोचकर मानसिक रूप से बीमार पड़ जाते हैं
  • उन्हें आगे चलकर काम नहीं मिलता है, आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं
  • पैरेंट्स या समाज स्वीकार नहीं करता तो गलत संगत में जा सकते हैं, जिसकी वजह से दुष्कर्म जैसी घटनाएं इनके साथ हो सकती है

फिजिकली के साथ इमोशनली लोगों के जेंडर का सम्मान जरूरी

जरूरी है कि इमोशनली के साथ फिजिकली जो लोग जैसे हैं उनके जेंडर का सम्मान करना चाहिए। वहीं समाज में ऐसी व्यवस्था कायम करनी चाहिए कि हर कोई अपने जज्बात बता सके, जो चाहे वो पहने व खुलकर जीए। इसकी शुरुआत लोगों को अपने घर से करनी होगी। यदि वो निर्णय नहीं ले पा रहे हैं तो हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स के साथ डॉक्टरी सलाह ले सकते हैं। यदि मानसिक तौर पर उनको सही राय न दिया गया तो उन्हें काफी परेशानी हो सकती है।

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