Sun Oct 11, 2026 | 12:43 AM IST

Medically Reviewed by Dr Sharadhi C , Consultant – Psychiatrist

रात में नींद आने के बावजूद फोन रखकर सोने का मन क्यों नहीं करता? मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से समझें

रात में नींद आने पर भी फोन न छोड़ पाने की आदत को 'रिवेंज बेडटाइम प्रोक्रैस्टिनेशन' कहते हैं। दिनभर अपने लिए समय न मिलने और मानसिक संतुष्टि की चाहत इसके कारण हैं, जिससे नींद पर बुरा असर पड़ता है।
रात में नींद आने के बावजूद फोन रखकर सोने का मन क्यों नहीं करता? मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से समझेंरात में नींद आने के बावजूद फोन रखकर सोने का मन क्यों नहीं करता? मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से समझें

कई लोग पूरे दिन फोन में लगे रहते हैं और रात को भी फोन नहीं छोड़ पाते हैं। कई बार तो लोग रात को नींद आने के बाद भी सोशल मीडिया को स्क्रॉल करना नहीं छोड़ पाते हैं और फोन चलाते रहते हैं, लेकिन ऐसा होता क्यों है? आइए इस बारे में Dr. Sharadhi C, Consultant – Psychiatry, Aster CMI Hospital, Bengaluru से जानें।

नींद आने पर भी फोन क्यों नहीं छोड़ते लोग?

Dr. Sharadhi के अनुसार, नींद आने पर भी फोन न रख पाना एक आम बात है। मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट इसे "रिवेंज बेडटाइम प्रोक्रैस्टिनेशन" (revenge bedtime procrastination) कह सकते हैं। ऐसा तब होता है, जब लोग सोने में देरी करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि दिनभर उन्हें अपने लिए काफी समय नहीं मिला है।

Dr. Sharadhi आगे कहती हैं, काम, जिम्मेदारियों और लोगों से मिलने-जुलने से भरे व्यस्त दिन के बाद, रात का समय ही ऐसा लगता है, जो सच में आपका अपना है। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना, वीडियो देखना या चैटिंग करने से आराम और आजादी का एहसास होता है, जिससे शरीर के थके होने पर भी इसे रोकना मुश्किल हो जाता है। कुछ मामलों में, यह आदत उन विचारों या चिंताओं से बचने का एक तरीका भी बन सकती है, जो सब कुछ शांत होने पर ज्यादा महसूस होती हैं।

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होती है और देखने की इच्छा

Dr. Sharadhi बताती हैं, फोन इस्तेमाल करने से एक तरह का साइकोलॉजिकल रिवॉर्ड (मानसिक संतुष्टि) भी मिलता है। सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, मैसेज और एंटरटेनमेंट से लगातार और अनएक्सपेक्टेड स्टिमुलेशन (उत्तेजना) मिलता है, जिससे दिमाग व्यस्त रहता है। भले ही आप शारीरिक रूप से थके हों, आपका दिमाग एक और वीडियो, पोस्ट या मैसेज की तलाश में लगा रह सकता है।

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ब्लू लाइट के कारण नींद पर असर

Dr. Sharadhi बताती हैं, चमकदार स्क्रीन और लगातार मिलने वाली मानसिक स्टिमुलेशन नींद आने की नेचुरल प्रक्रिया में और देरी कर सकती है। समय के साथ, दिमाग सोने के समय को आराम करने के बजाय फोन के इस्तेमाल से जोड़ने लग सकता है।

स्ट्रेस और अकेलेपन से बढ़ती है आदत

स्ट्रेस, एंग्जायटी, अकेलापन या नींद का अनियमित शेड्यूल इस आदत को और मजबूत बना सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी में सेल्फ-कंट्रोल की कमी है। अक्सर, यह आदत, भावनात्मक जरूरतों और बहुत ज्यादा स्टिमुलेशन वाले माहौल का मिला-जुला असर होता है।

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क्या कहती है स्टडी?

साल 2020 में PLos One में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, थके होने के बाद रात को फोन न छोड़ पाने के कई प्रमुख कारण हैं। जैसे-

  • मानसिक और शारीरिक उत्तेजना (Pre-sleep hyperarousal): मोबाइल फोन पर उपलब्ध मीडिया कंटेंट और गेम दिमाग और शरीर में कॉग्निटिव (cognitive) तथा शारीरिक (somatic) उत्तेजना पैदा करते हैं, जिससे थकावट के बावजूद नींद आने में परेशानी होती है।
  • सोने से पहले फोन चलाने की आदत: रात में सोने से ठीक पहले या लाइट बंद करने के बाद भी फोन इस्तेमाल करना एक आम आदत बन जाता है।
  • स्क्रीन की रोशनी का प्रभाव: मोबाइल फोन से निकलने वाली रोशनी नींद की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
  • सोने के समय में देरी (Delayed bedtime): इस मानसिक उत्तेजना और आदत के कारण सोने के समय में लगातार देरी होती जाती है, जिससे नींद कम मिलती है और दिन में थकान बनी रहती है।

फोन की लत से राहत और अच्छी नींद के लिए क्या करें?

Dr. Sharadhi का कहना है, मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट आमतौर पर सिर्फ इच्छाशक्ति पर निर्भर रहने के बजाय दिन और सोने के समय के बीच एक साफ बदलाव (ट्रांजिशन) बनाने की सलाह देते हैं।

  • फोन को बिस्तर से दूर रखें।
  • जरूरी न होने वाले नोटिफिकेशन बंद करें।
  • फोन बंद करने का एक तय समय (आइडियली सोने से 30-60 मिनट पहले) तय करने की कोशिश करें।
  • स्क्रॉल करने के बजाय कुछ सुकून देने वाली चीजें करें, जैसे- पढ़ना, हल्की स्ट्रेचिंग करना, आरामदेह गाने सुनना या बस किसी से बात करना।

खुद से यह पूछना भी मददगार हो सकता है, "अभी जागते रहने से मुझे क्या मिल रहा है?" अगर जवाब आराम, मनोरंजन या अपने लिए समय है, तो शाम को ही जान-बूझकर ऐसा समय निकालने की कोशिश करें।

डॉक्टर से सलाह कब लें?

Dr. Sharadhi कहती हैं, अगर सोने के लिए काफी मौके मिलने के बावजूद यह आदत बनी रहती है या इसके साथ लगातार बेचैनी, उदासी या दिन में बहुत ज्यादा थकान महसूस होती है, तो किसी मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से बात करने से असल समस्या का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

निष्कर्ष

रात को नींद आने के बावजूद फोन न छोड़ पाना सिर्फ इच्छाशक्ति की कमी नहीं है, बल्कि यह रिवेंज बेडटाइम प्रोक्रैस्टिनेशन और मानसिक उत्तेजना (Pre-sleep hyperarousal) के कारण होता है। दिनभर की व्यस्तता के बाद रात का समय ही वह अकेला मौका होता है, जब व्यक्ति को अपने लिए समय और आजादी महसूस होती है। हालांकि, फोन की ब्लू लाइट, लगातार मिलता मानसिक स्टिमुलेशन और स्ट्रेस इस आदत को और गहरा कर देते हैं।

इससे बचने के लिए फोन को बिस्तर से दूर रखना, सोने से 30–60 मिनट पहले स्क्रीन बंद करना और उसकी जगह पढ़ने या गाने सुनने जैसी सुकून भरी आदतें अपनाना मददगार होता है। अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे या इसके साथ अधिक थकान और बेचैनी महसूस हो, तो किसी मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से तुरंत सलाह लें।

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FAQ

  • मोबाइल को पास में रखकर सोने से कौन सी बीमारी होती है?

    मोबाइल को पास रखकर सोने से व्यक्ति को अनिद्रा, नींद की कमी, सिरदर्द, माइग्रेन, स्ट्रेस, याददाश्त या एकाग्रता में कमी और एंग्जायटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
  • अच्छी नींद के लिए क्या करें?

    अच्छी नींद के लिए सोने का समय फिक्स रखें, स्क्रीन से दूरी बनाएं, फिजिकल एक्टिविटीज करें, कैफीन का इस्तेमाल से बचें और सोते समय शांत माहौल बनाए रखें।

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Priyanka Sharma

Health & Lifestyle Journalist

प्रियंका शर्मा पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से 2 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सब एडिटर हैं। वह महिला स्वास्थ्य, पोषण, प्रेगनेंसी, स्किनकेयर, हेयरकेयर, आयुर्वेद, योग और हार्ट हेल्थ जैसे विषयों पर शोध आधारित लेख लिखती हैं और जटिल स्वास्थ्य जानकारी को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञों की राय और भरोसेमंद मेडिकल स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन लेखों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। OnlyMyHealth से पहले वह Grehlakshmi (महिला केंद्रित हिंदी पत्रिका) और Noida Khabar के साथ काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: प्रियंका द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Oct 10, 2026 23:53 IST

    Published By : Priyanka Sharma
    Reviewed By : Dr Sharadhi C