Wed Sep 30, 2026 | 11:50 PM IST

Medically Reviewed by Dr. Yatish Singh , Paediatrician and Neonatologist - Cloudnine Hospital, Ghaziabad

मोबाइल चलाने से बच्चों पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर से जानें

मोबाइल ज्यादा चलाने से बच्चों की आंखों, नींद, व्यवहार और ध्यान पर असर पड़ सकता है। यहां डॉक्टर से जानिए, स्क्रीन टाइम से जुड़े संभावित नुकसान और बच्चों के लिए जरूरी सावधानियां क्या हैं?
मोबाइल चलाने से बच्चों पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर से जानेंमोबाइल चलाने से बच्चों पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर से जानें

आजकल बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन होना आम बात है। खाना खिलाने से लेकर बच्चे को बिजी रखने तक, कई पेरेंट्स मोबाइल का सहारा लेते हैं। वहीं ऑनलाइन पढ़ाई, कार्टून, गेम के कारण बच्चों का स्क्रीन से जुड़ाव पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चा रोजाना कई घंटे मोबाइल देखने लगे तो उसके शरीर और व्यवहार पर क्या असर पड़ सकता है? क्लाउडनाइन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स, इंदिरापुरम के सीनियर कंसल्टेंट - पीडियाट्रिशियन और नियोनेटोलॉजिस्ट, डॉ. यतीश सिंह के अनुसार, जरूरत से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल बच्चे की नींद, फिजिकल एक्टिविटी, पढ़ाई, पारिवारिक बातचीत और बाहर खेलने के समय को प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्क्रीन के प्रभाव को केवल ''मोबाइल अच्छा है या बुरा'' के रूप में देखने के बजाय उसके इस्तेमाल के पूरे पैटर्न को समझना जरूरी है।

मोबाइल चलाने से बच्चों पर क्या असर पड़ सकता है?

लंबे समय तक मोबाइल या दूसरी स्क्रीन देखने से बच्चों की आंखों में थकान, सूखापन, जलन और कभी-कभी सिरदर्द जैसी शिकायतें हो सकती हैं। स्क्रीन देखते समय बच्चे सामान्य से कम पलक झपकाते हैं, जिससे आंखों में ड्राईनेस और असहजता बढ़ सकती है। हालांकि मोबाइल स्क्रीन सीधे आंखों की रोशनी को स्थायी रूप से कम करती है, इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं है।

दूसरी ओर, लंबे समय तक पास की चीजें देखना और बाहर कम समय बिताना बच्चों में मायोपिया यानी दूर की नजर कमजोर होने के बढ़ते जोखिम से जुड़ा पाया गया है। अगर बच्चा बार-बार आंखें मलता है, स्क्रीन देखते समय आंखें सिकोड़ता है, बहुत पास से स्क्रीन देखता है या सिरदर्द की शिकायत करता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

  • सोने से पहले मोबाइल चलाने की आदत बच्चों की नींद के रूटीन को प्रभावित कर सकती है।
  • वीडियो या गेम में व्यस्त रहने से बच्चा देर तक जाग सकता है और उसका सोने का समय आगे बढ़ सकता है। पर्याप्त नींद न मिलने पर अगले दिन बच्चा थका हुआ, चिड़चिड़ा महसूस कर सकता है।
  • इसलिए सोने से लगभग एक घंटे पहले स्क्रीन से दूरी रखना और रात में बच्चे के बैडरूम में मोबाइल या टैबलेट रखने से बचना बेहतर है।

1. पढ़ाई और ध्यान पर असर

डॉ. यतीश सिंह बताते हैं कि बार-बार बदलते वीडियो, नोटिफिकेशन और पढ़ाई के बीच लगातार मोबाइल चेक करना बच्चे की एकाग्रता और सीखने को प्रभावित कर सकता है। हालांकि हर तरह का स्क्रीन इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता। पढ़ाई से जुड़ा कंटेंट और माता-पिता के साथ देखकर समझाया गया उम्र के हिसाब से सही कंटेंट सीखने में मदद भी कर सकता है।

इसलिए पेरेंट्स को केवल स्क्रीम टाइम ही नहीं, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि बच्चा स्क्रीन पर क्या देख रहा है और किस चीज में उसका इस्तेमाल हो रहा है।

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2. फिजिकल एक्टिविटी की कमी

मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने से बच्चे का बाहर खेलना, दौड़ना और दूसरी फिजिकल एक्टिविटीज कम हो सकती हैं। बच्चों के विकास के लिए केवल पढ़ाई और स्क्रीन से जुड़ी एक्टिविटीज पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें रोजाना उम्र के अनुसार फिजिकल एक्टिविटी, बाहर खेलने, फैमली के साथ बातचीत और पर्याप्त नींद भी मिलनी चाहिए।

3. व्यवहार और मूड में बदलाव

कुछ बच्चों में स्क्रीन बंद करने पर गुस्सा, चिड़चिड़ापन या जिद दिखाई दे सकती है। अगर बच्चा हर खाली समय में मोबाइल मांगता है, मोबाइल न मिलने पर बहुत ज्यादा परेशान होता है या स्क्रीन उसकी नींद, पढ़ाई, खेल और पारिवारिक एक्टिविटीज को प्रभावित करने लगती है, तो पेरेंट्स को उसकी स्क्रीन की आदत पर ध्यान देना चाहिए। इसे तुरंत ''मोबाइल की लत'' कहना सही नहीं होगा। कई बार यह एक व्यवहार संबंधी आदत भी हो सकती है।

मोबाइल अचानक पूरी तरह बंद करने के बजाय स्पष्ट नियम बनाना, बच्चे को पहले से बताना कि स्क्रीन कब बंद होगी और उसके लिए वैकल्पिक एक्टिविटीज उपलब्ध कराना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

Effects of mobile phone on kidsEffects of mobile phone on kids

साल 2023 में Cureus Journal of Medical Science में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार-

  • बच्चों द्वारा स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल उनके विकास पर नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों तरह के प्रभाव डालता है।
  • इससे बच्चों की शिक्षा और सीखने में मदद मिल सकती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम से उनकी याददाश्त, भाषा और सामाजिक-भावनात्मक विकास पर बुरा असर पड़ता है, जिससे मोटापा और नींद की समस्या जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
  • बच्चों के हेल्दी विकास के लिए पेरेंट्स की भूमिका बहुत अहम होती है। उन्हें बच्चों के लिए सही सीमाएं तय करनी चाहिए और स्क्रीन टाइम को कम करके अन्य क्रिएटिव एक्टिविटीज को बढ़ावा देना चाहिए।

बच्चे के मोबाइल को कैसे कंट्रोल करें?

डॉ. यतीश सिंह के अनुसार, अधिकांश बच्चों के लिए स्क्रीन को पूरी तरह बंद करना प्रैक्टिकल या जरूरी नहीं है। इसके बजाय परिवार में हेल्दी स्क्रीन रूल्स बनाए जा सकते हैं। खाना खाते समय मोबाइल न देना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी रखना, लंबे स्क्रीन सेशल के बीच ब्रेक लेना और बच्चे को आउटडोर गेम्स, किताबें, क्रिएटिव प्ले तथा फैमिली एक्टिविटीज के लिए बढ़ावा देना उपयोगी हो सकता है।

छोटे बच्चों को हर बार रोने या परेशान होने पर मोबाइल देकर शांत कराने की आदत भी धीरे-धीरे कम करनी चाहिए। साथ ही पेरेंट्स को अपने स्क्रीम यूज पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बच्चे अक्सर बड़ों को देखकर ही डिजिटल हैबिट सीखते हैं।

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निष्कर्ष

मोबाइल अपने आप में बच्चों के लिए नुकसानदायक नहीं है, लेकिन जरूरत से ज्यादा और बिना निगरानी के स्क्रीन इस्तेमाल उनकी नींद, आंखों के आराम, फिजिकल एक्टिविटी, पढ़ाई और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। इसलिए बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर करने के बजाय उसके इस्तेमाल का समय और तरीका तय करना ज्यादा जरूरी है। अगर बच्चे को लगातार आंखों में परेशानी हो, सिरदर्द, नींद की समस्या या व्यवहार में बदलाव दिखाई दे, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

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FAQ

  • क्या मोबाइल गेम बच्चों के लिए खतरनाक हैं?

    हर डिजिटल गेम एक जैसा नहीं होता है। गेम के कंटेंट खेलने में बिताया गया समय और उसका बच्चे की नींद, पढ़ाई तथा दूसरी फिजिकल एक्टिविटी तथा सोशल इंटरेक्शन पर असर देखना जरूरी है।
  • बच्चे को मोबाइल से दूर करने पर गुस्सा क्यों आता है?

    अगर स्क्रीन बच्चे की रूटीन का बड़ा हिस्सा बन गई है, तो अचानक मोबाइल हटाने पर गुस्सा या जिद दिखाई दे सकती है। इसका मतलब हर बार लत नहीं होती। धीरे-धीरे सीमाएं बनाना, पहले से चेतावनी देना और दूसरी एक्टिविटीज उपलब्ध कराना मददगार हो सकता है।
  • क्या मोबाइल से बच्चे की आंखों की रोशनी कम होती है?

    मोबाइल स्क्रीन से सीधे आंखों की रोशनी स्थायी रूप से कम होने का स्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालांकि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, सूखापन और सिरदर्द हो सकता है।

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Akanksha Tiwari

Health & Lifestyle Journalist

आकांक्षा तिवारी पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 3 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। वह पोषण, आयुर्वेद, प्रेगनेंसी, हार्ट हेल्थ और फिटनेस जैसे विषयों पर लिखती हैं और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी को प्रमाणित स्रोतों और रिसर्च के आधार पर सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं। जिन लेखों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। OnlyMyHealth से पहले वह India TV, India Ahead और News Nation के साथ काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: आकांक्षा द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Sep 30, 2026 22:48 IST

    Published By : Akanksha Tiwari
    Reviewed By : Dr. Yatish Singh