कभी किसी शांत कमरे में बैठे-बैठे अचानक ऐसा लगा है कि किसी ने आपका नाम पुकारा? आप तुरंत पीछे मुड़कर देखते हैं, आसपास नजर दौड़ाते हैं, लेकिन वहां कोई नहीं होता। कुछ सेकंड तक आप सोचते रहते हैं कि आवाज सच में आई थी या सिर्फ आपको ऐसा लगा। खास बात यह है कि यह अनुभव कई लोगों को कभी-कभार हो सकता है और आवाज इतनी वास्तविक लग सकती है कि व्यक्ति इसे महज कल्पना मानने को तैयार नहीं होता।
यशोदा हॉस्पिटल, हैदराबाद के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी बताते हैं कि हमारा दिमाग हर समय आस-पास मौजूद आवाजों, शोर और दूसरी संवेदनाओं को समझने की कोशिश करता रहता है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी अस्पष्ट या अधूरी आवाज का मतलब दिमाग अपने तरीके से निकाल सकता है। अपना नाम ऐसी चीज है जिसे हम बहुत जल्दी पहचान लेते हैं, इसलिए किसी सामान्य आवाज या शोर में भी हमें अपना नाम सुनाई देने जैसा अनुभव हो सकता है।
कभी-कभी अपना ही नाम सुनाई देने जैसा क्यों लगता है?
डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी के अनुसार, हमारा दिमाग लगातार आस-पास मौजूद आवाजों और दूसरी संवेदनाओं को प्रोसेस करता रहता है। कई बार किसी अस्पष्ट आवाज, शोर या अधूरी आवाज को दिमाग अपने लिए जरूरी शब्द के रूप में समझ लेता है। जब व्यक्ति बहुत ज्यादा थका हुआ हो, नींद पूरी न हुई हो या लंबे समय से तनाव में हो, तो दिमाग की आवाजों और दूसरी संवेदनाओं को समझने की प्रोसेस प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में सामान्य आवाजें भी ज्यादा जरूरी या अलग महसूस हो सकती हैं। खासकर सोने-जागने के आस-पास भी कुछ लोगों को आवाज सुनाई देने जैसी अनुभूति हो सकती है।
- चूंकि अपना नाम हमारे लिए खास और आसानी से पहचाना जाने वाला शब्द है, इसलिए हल्की या अस्पष्ट आवाज में भी दिमाग को अपना नाम सुनाई देने का अनुभव हो सकता है।
- उदाहरण के लिए पंखे की आवाज, बाहर से आने वाला ट्रैफिक का शोर, लोगों की बातचीत या टीवी की धीमी आवाज को दिमाग कभी-कभी किसी परिचित शब्द जैसा समझ सकता है।
- इसका मतलब यह नहीं कि वास्तव में किसी ने आपका नाम पुकारा था।
- हर बार इसे केवल वहम कहना सही नहीं होगा। कई बार यह सुनने संबंधी गलत धारणा यानी auditory misperception हो सकती है, जिसमें बाहर से आने वाली वास्तविक आवाज को दिमाग अलग तरीके से समझता है।
- वहीं कुछ स्थितियों में व्यक्ति को बिना किसी बाहरी आवाज के भी आवाज सुनाई देने का अनुभव हो सकता है।
- इन दोनों अनुभवों में अंतर होता है। इसलिए सिर्फ एक-दो बार अपना नाम सुनाई देने जैसा महसूस होने के आधार पर किसी मानसिक बीमारी का अनुमान निकालना सही नहीं है।
साल 2006 में Brain Research जर्नल में प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार-
- फंगशनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (fMRI) का उपयोग करके यह देखा गया कि जब कोई व्यक्ति अपना खुद का नाम सुनता है, तो उसका दिमाग कैसे रिएक्ट करता है।
- रिजल्ट से पता चला कि दूसरों के नाम की तुलना में अपना नाम सुनने पर बाएं हिस्से (लेफ्ट हेमिस्फेयर) के कई हिस्सों में ज्यादा हलचल होती है, जैसे मिडिल फ्रंटल कॉर्टेक्स, टेम्पोरल कॉर्टेक्स और क्यूनियस।
- यह साबित करता है कि अपना नाम सुनना हमारे दिमाग के लिए एक बेहद खास और अलग प्रोसेस है, जो दूसरों के नाम सुनने से पूरी तरह अलग तरीके से काम करती है।
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कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?
- डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी सलाह देते हैं कि अगर बिना किसी बाहरी सोर्स के आवाजें बार-बार सुनाई देने लगें, आवाजें स्पष्ट हों या लगातार परेशान करें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
- खासकर अगर आवाजें आपको कुछ करने के लिए कहती हों, डर पैदा करती हों या आपकी नींद, काम और डेली रूटीन प्रभावित होने लगे, तो मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है।
- इसके अलावा, अगर इस तरह के अनुभवों के साथ बहुत ज्यादा कंफ्यूजन व्यवहार में अचानक बदलाव, गंभीर नींद की समस्या या वास्तविकता को समझने में परेशानी होने लगे, तो बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
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निष्कर्ष
कभी-कभी अपना नाम पुकारे जाने जैसा महसूस होना हमेशा वहम या मानसिक बीमारी का संकेत नहीं होता। हालांकि, अगर आवाजें बार-बार, स्पष्ट रूप से और बिना किसी बाहरी सोर्स के सुनाई दें या आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। केवल एक अनुभव के आधार पर खुद को किसी बीमारी से जोड़ने के बजाय इसके पैटर्न और दूसरे लक्षणों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।
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FAQ
क्या कानों की समस्या से अलग आवाज सुनाई देती है?
कान से जुड़ी कुछ समस्याओं के कारण अलग सी आवाज सुनाई दे सकती है। लगातार असामान्य आवाजें सुनाई देने पर डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।एक ही बात बार-बार दिमाग में आने का क्या कारण है?
तनाव, एंग्जायटी के कारण एक ही बात बार-बार दिमाग में आ सकती है, जिससे व्यक्ति को कई अन्य समस्याएं हो सकती हैं।
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Sep 11, 2026 15:47 IST
Published By : Akanksha Tiwari
Reviewed By : Dr Bharath Kumar Surisetti