Fri Nov 6, 2026 | 10:18 PM IST

ब्रेस्ट कैंसर में स्तनों की असामान्य कोशिकाएं तेजी से बढ़कर ट्यूमर बनाने लगती हैं। अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए, तो यह ट्यूमर पूरे शरीर में फैल सकता है। शुरुआत में ट्यूमर ब्रेस्ट की नलियों या दूध बनाने वाले लोब्यूल्स के अंदर शुरू हो होता है। हालांकि, शुरुआती दौर में यह बीमारी जानलेवा नहीं होती, बशर्ते इसकी पहचान शुरुआती स्टेज पर ही हो जाए।

भारत में ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। Cancer Epidemiology के मुताबिक, भारत में ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में हर साल करीब 5.6% की वृद्धि होने की संभावना है। इसका मतलब है कि हर साल ब्रेस्ट कैंसर के करीब 50 हजार नए मामले सामने आते हैं। हालांकि, पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर के लगभग 0.5–1% होते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, साल 2024 में दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर से करीब 6.94 लाख मौतें हुईं। इसमें से करीब 80 फीसदी ब्रेस्ट कैंसर के मामले महिलाओं में पाए जाते हैं और इसका लिंग और उम्र के अलावा कोई स्पष्ट रिस्क फैक्टर मौजूद नहीं है।

ब्रेस्ट कैंसर कितने तरह का होता है?

Cleveland Clinic के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर सामान्यतः तीन तरह का होता है।

  • इनवेसिव डक्टल कार्सिनोमा (IDC) - इसमें दूध की नलियों में कैंसर का ट्यूमर शुरू होता है और फिर आस-पास के टिश्यू में फैलता है। यह सबसे आम ब्रेस्ट कैंसर होता है।
  • लोब्युलर ब्रेस्ट कैंसर (LBC) - यह दूध बनाने वाली ग्रंथियों से शुरू होता है, जो आस-पास के टिश्यू में फैलने लगता है। यह ब्रेस्ट कैंसर का दूसरा सबसे आम प्रकार है।
  • डक्टल कार्सिनोमा इन सिटू (DCIS) - इसमें ट्यूमर दूध की नलियों से शुरू होता है, लेकिन यह DCIS नलियों से बाहर या अन्य टिश्यू में नहीं फैलता।

ये कैंसर के प्रकार कम दिखाई देते हैं।

  • ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर (TNBC) - इसमें ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है, जो अन्य ब्रेस्ट कैंसर के मुकाबले बहुत तेजी से फैलता है।
  • इन्फ्लेमेटरी ब्रेस्ट कैंसर (IBC) - ये दुर्लभ किस्म का कैंसर होता है, जो ब्रेस्ट की स्किन पर दाने या रैशेज जैसा दिखता है।
  • स्तन का पैगेट रोग - यह दुर्लभ किस्म का ब्रेस्ट कैंसर है, जो निप्पल की स्किन को प्रभावित करता है।

ब्रेस्ट कैंसर होने के कारण

CDC के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर होने के रिस्क फैक्टर्स दो तरह के हो सकते हैं। एक तो जिन्हें बदला नहीं जा सकता है और दूसरे जिन्हें लाइफस्टाइल के जरिए कम किया जा सकता है।

रिस्क फैक्टर जिन्हें बदला नहीं जा सकता है।

  • उम्र बढ़ने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ सकता है। ज्यादातर मामलों में 50 साल की उम्र के बाद देखा गया है।
  • BRCA1 और BRCA2 जैसे जेनेटिक जीन के कारण ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर का रिस्क बढ़ सकता है।
  • जिन लड़कियों को 12 साल की उम्र से पहले पीरियड्स शुरू हो जाते हैं और 55 साल की उम्र के बाद मेनोपॉज आता है, उन महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क हो सकता है।
  • जिन महिलाओं के ब्रेस्ट बड़े होते हैं, उनके टिश्यू को मैमोग्राम पर देखना मुश्किल होता है।
  • फैमिली हिस्ट्री भी ब्रेस्ट कैंसर का कारण हो सकती है।
  • 30 साल की उम्र से पहले रेडिएशन थेरेपी कराने के बाद ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ सकता है।

रिस्क फैक्टर जिन्हें कंट्रोल किया जा सकता है।

  • फिजिकल एक्टिविटी कम करना
  • मेनोपॉज के बाद वजन बढ़ना
  • हार्मोन थेरेपी
  • गर्भनिरोधक दवाएं लेना
  • 30 साल के बाद प्रेग्नेंसी होना
  • बहुत ज्यादा शराब पीना
  • स्मोकिंग, केमिकल्स के संपर्क या नाइट शिफ्ट में काम करने से हार्मोनल बदलाव होना

ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर से जुड़े लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए। ब्रेस्ट में किसी भी तरह का बदलाव महसूस होने पर डॉक्टर से चेक कराना चाहिए।

  • ब्रेस्ट में बिना दर्द वाली गांठ होना
  • ब्रेस्ट की स्किन का मोटा होना
  • ब्रेस्ट के आकार या बनावट में अचानक बदलाव होना
  • ब्रेस्ट की स्किन पर गड्ढे पड़ना
  • ब्रेस्ट पर सूजन, लालिमा या स्किन का संतरे के छिलके जैसा दिखना
  • निप्पल का अंदर की तरफ धंसना
  • निप्पल से खून जैसा तरल पदार्थ निकलना

ब्रेस्ट कैंसर की जांच कैसे होती है?

CDC के अनुसार, अगर किसी महिला को ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण दिखाई देते हैं, तो मैमोग्राम किया जाता है। अगर इस टेस्ट में डॉक्टर को कुछ भी असामान्य लगता है, तो कैंसर की जांच के लिए कुछ टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं।

  • ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड - इसमें मशीन के जरिए साउंड वेव का इस्तेमाल करके ब्रेस्ट के अंदर के हिस्सों की इमेज ली जाती है।
  • डायग्नोस्टिक मैमोग्राम - अगर स्तन में किसी भी तरह की गांठ दिखाई देती है, तो इस टेस्ट के जरिए विस्तार में एक्स-रे करके गांठ को चेक किया जा सकता है।
  • ब्रेस्ट मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग - इसमें बॉडी स्कैन किया जाता है। MRI के जरिए स्तन के अंदर की और ज्यादा स्पष्ट इमेज बनती है।
  • बायॉप्सी - इसमें ब्रेस्ट के टिश्यू या फ्लूड को लेकर माइक्रोस्कोप में जांच की जाती है। इससे ब्रेस्ट कैंसर होने की पुष्टि हो सकती है।

ब्रेस्ट कैंसर की कितनी स्टेज होती है?

Cleveland Clinic में बताया गया है कि कैंसर के स्टेज से डॉक्टर को यह समझने में मदद मिलती है कि इलाज के बाद मरीज की कंडीशन कैसी रहने की संभावना है। ब्रेस्ट कैंसर का स्टेज कैंसर के प्रकार, ट्यूमर के आकार, लोकेशन और किन हिस्सों में फैले होने पर निर्भर करता है।

  • स्टेज 0 - इसमें कैंसर की कोशिकाएं अभी ब्रेस्ट की नलियों तक ही सीमित हैं। यह अभी स्तन के अन्य हिस्सों में नहीं फैली है।
  • स्टेज 1 - इसमें कैंसर की कोशिकाएं स्तन के आस-पास के टिश्यू में मौजूद हो सकती हैं।
  • स्टेज 2 - इस स्टेज में कैंसर की कोशिकाओं ने एक या इससे ज्यादा ट्यूमर बना लिए हैं। इसमें ट्यूमर या तो 2 सेमी से छोटा है और बगल की लिम्फ नोड्स तक फैल चुका है, या फिर यह 5 सेमी का है, लेकिन अभी बगल की लिम्फ नोड्स तक नहीं पहुंचा।
  • स्टेज 3 - इसमें कैंसर ब्रेस्ट के आस-पास के टिश्यू और लिम्फ नोड्स में फैल चुका है। इसे लोकल एडवांस्ड ब्रेस्ट कैंसर कहा जाता है।
  • स्टेज 4 - इस स्टेज पर कैंसर ब्रेस्ट के अलावा, शरीर के कई अंगों जैसे हड्डियों, लिवर, फेफड़ों या दिमाग तक फैल चुका है।

ब्रेस्ट कैंसर का इलाज कैसे होता है?

WHO के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर का सबटाइप क्या है और यह किस स्टेज पर है। इसमें डॉक्टर इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि कैंसर के वापस आने की संभावना को कम किया जा सके। ब्रेस्ट कैंसर में इलाज तभी बेहतर तरीके से काम करता है, अगर इसका इलाज जल्दी शुरू किया जाए।

  • सर्जरी - इसमें कैंसरग्रस्त टिश्यू या फिर पूरे ब्रेस्ट को ही निकाला जा सकता है। इसमें कैंसर से प्रभावित लिम्फ नोड्स भी निकाले जाते हैं। कई मामलों में बगल के लिम्फ नोड्स को भी हटा दिया जाता है।
  • रेडिएशन थेरेपी - सर्जरी के बाद अगर कोई भी टिश्यू या लिम्फ नोड्स में बहुत ही छोटी कैंसर की कोशिकाएं रह जाती हैं, तो रेडिएशन के जरिए इसे खत्म किया जाता है। अगर ब्रेस्ट कैंसर शुरुआती स्टेज पर होता है, तो रेडिएशन थेरेपी के जरिए इसे नष्ट किया जा सकता है।
  • दवाएं - कुछ मामलों में ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के लिए सर्जरी के पहले और बाद में दवाएं भी दी जा सकती है। इसमें दवाएं ओरल भी हो सकती हैं या फिर कीमोथेरेपी के जरिए भी दी जा सकती हैं। यह कैंसर के टाइप पर निर्भर करता है।

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के बाद मरीज के जीवित रहने की संभावना

Mayo Clinic के मुताबिक, यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (NCI) ने सर्वाइवल रेट इस आधार पर बताया है कि कैंसर कितना फैला हुआ है।

  • अगर कैंसर सिर्फ स्तन तक ही सीमित है, तो 5 साल का सर्वाइवल रेट 100% है।
  • अगर कैंसर लिम्फ नोड्स तक फैल चुका है, तो 5 साल का सर्वाइवल रेट 88% है।
  • अगर कैंसर शरीर के कई हिस्सों में फैल चुका है, तो 5 साल की सर्वाइवल रेट 34% है।

ब्रेस्ट कैंसर के बाद क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

Cleveland Clinic के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों को इलाज के बाद खुद का ध्यान रखना जरूरी है।

  • ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के बाद मरीज को पर्याप्त मात्रा में आराम करने की कोशिश करनी चाहिए।
  • इलाज के बाद मरीज की भूख पर असर पड़ सकता है। इसलिए मरीज को फल, सब्जियां, लीन प्रोटीन और पौष्टिक अनाज से भरपूर डाइट लेनी चाहिए, ताकि इम्यूनिटी बेहतर हो सके।
  • स्ट्रेस को मैनेज करने के लिए वॉक या एक्सरसाइज करें। इससे स्ट्रेस दूर करने में मदद मिलती है।
  • एक्सरसाइज करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
  • मरीज को मेंटल हेल्थ के लिए कैंसर सर्वाइवरशिप प्रोग्राम में जाना चाहिए। इससे मरीज को जीने की चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है।
  • रेगुलर डॉक्टर से फॉलो-अप लेना चाहिए।
  • दवाएं समय पर लेनी चाहिए।

ब्रेस्ट कैंसर से बचाव कैसे किया जा सकता है?

CDC में बताया गया है कि कुछ रिस्क फैक्टर्स को कम करना मुश्किल है, लेकिन लाइफस्टाइल से जुड़े खतरों को कम करके ब्रेस्ट कैंसर के रिस्क को कम किया जा सकता है।

  • अपने शरीर का वजन संतुलित रखना जरूरी है।
  • रोजाना एक्सरसाइज या वॉक जरूर करनी चाहिए।
  • शराब बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए।
  • गर्भनिरोधक दवाएं लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लें।
  • हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी लेने से पहले इसके रिस्क के बारे में पूरी जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
  • ब्रेस्टफीड जरूर कराना चाहिए।
  • अगर परिवार में किसी को ब्रेस्ट कैंसर हुआ है, तो रेगुलर स्क्रीनिंग कराते रहना चाहिए।

ब्रेस्ट सेल्फ-एग्जाम कैसे करें?

National Breast Cancer Foundation के मुताबिक, महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर से बचाव के लिए सेल्फ-एग्जामिनेशन करने की सलाह दी जाती है।

  • महिलाओं को पीरियड्स खत्म होने के कुछ दिनों बाद यह करना चाहिए।
  • जिन महिलाओं को मेनोपॉज हो गया है, तो वे हर महीने एक ही तारीख जैसे अगर 15 को चेक करती हैं, तो हर महीने के 15 तारीख को ही चेक करें।

ब्रेस्ट चेक करने का तरीका

  • नहाते समय 3 उंगलियों की मदद से हल्के, मध्यम और तेज दबाव के साथ पूरे ब्रेस्ट और बगल को दबाकर देखें। ब्रेस्ट में किसी तरह की गांठ, स्किन में मोटापन या सख्तपन तो महसूस नहीं हो रहा है।
  • शीशे के सामने खड़े होकर अपनी बांहों को बगल में रखकर ब्रेस्ट को ध्यान से देखें। स्तनों के आकार, बनावट, सूजन, निप्पल में बदलाव जरूर चेक करें। कई महिलाओं के बायां और दायां स्तन एक जैसे नहीं होते, तो कुछ महिलाओं के दोनों स्तन एक समान होते हैं। इसलिए थोड़ा बहुत फर्क हो सकता है।
  • लेटकर भी ब्रेस्ट एग्जाम किया जा सकता है। इसके लिए दाहिने कंधे के नीचे तकिया रखकर अपने दाहिने हाथ को सिर के पीछे रखें। इसके बाद बाएं हाथ से 3 उंगुलियों को हल्के, मध्यम और तेज दबाव के साथ गांठ, मोटापन या किसी भी तरह का बदलाव चेक करें।
  • फिर ऐसा ही बाएं स्तन के साथ करें। साथ ही दोनों निप्पल्स को भी हल्का दबाकर डिस्चार्ज जरूर चेक करें।

डॉक्टर से कब मिलें?

अगर स्तन में ये बदलाव दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर मामले में ब्रेस्ट कैंसर ही हो, लेकिन डॉक्टर से चेकअप कराना जरूरी हो जाता है।

  • नई गांठ महसूस होना
  • बगल में गांठ या सूजन
  • निप्पल से खून या असामान्य डिस्चार्ज होना
  • निप्पल का अचानक अंदर की ओर जाना
  • ब्रेस्ट की स्किन पर गड्ढे या असामान्य मोटापन महसूस होना
  • ब्रेस्ट के आकार में अचानक से बदलाव महसूस होना
  • ब्रेस्ट में लगातार दर्द बने रहना

निष्कर्ष
ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने से इलाज बेहतर और प्रभावी तरीके से हो सकता है। हालांकि, जरूरी नहीं है कि हर गांठ कैंसर ही हो, लेकिन समय पर इसकी स्क्रीनिंग कराने से बीमारी का जल्दी पता चल सकता है। अगर किसी को ब्रेस्ट में असामान्य बदलाव महसूस हो रहे हैं और लगातार दर्द बना हुआ है, तो खुद किसी नतीजे पर पहुंचने के बजाय डॉक्टर की सलाह लें।

 

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