कई बार महिलाओं को स्ट्रेस, एंग्जायटी, मूड स्विंग्स, घबराहट होने, छोटी-छोटी बातों को भूल जानें और ब्रेन फॉग जैसी ब्रेन से जुड़ी कई समस्याएं होती हैं। इसके कारण उनको लगता है कि उन्हें कोई गंभीर परेशानी या याददाश्त से जुड़ी समस्या हो गई है, लेकिन हर बार इसका कारण मानसिक बीमारी नहीं होती है। कई बार शरीर में हार्मोन्स के बदलाव भी इसका कारण हो सकते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य से जुड़ी कोई भी परेशानी होने पर इनका कारण जानना जरूरी हो जाता है। ऐसे में आइए Dr. Parth Nagda, Consultant, Psychiatry, Kokilaben Dhirubhai Ambani Hospital, Navi Mumbai से जानें।
एस्ट्रोजन ब्रेन को कैसे प्रभावित करता है?
डॉ. पार्थ के अनुसार, एस्ट्रोजन को महिलाओं में अक्सर रिप्रोडक्टिव हेल्थ से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह सिर्फ एक रिप्रोडक्टिव हार्मोन नहीं है। यह एक ब्रेन केमिकल है। यह हार्मोन ब्रेन के उन केमिकल्स के साथ भी काम करता है, जो हमारे मूड, स्ट्रेस और इमोशन्स को प्रभावित करते हैं। एस्ट्रोजन सीधे सेरोटोनिन, डोपामाइन और GABA (जिन्हें हर एंटीडिप्रेसेंट और एंटी-एंग्जायटी दवा टारगेट करती है) पर असर डालता है। जब शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर बैलेंस रहता है, तो ब्रेन की कई अहम प्रक्रियाएं भी नॉर्मल रूप से काम करती हैं, लेकिन अगर किसी कारण से एस्ट्रोजन के स्तर में बदलाव होता है, तो इसका असर मानसिक स्थिति पर भी दिख सकता है।
साल 2015 में Physiological Reviews में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, एस्ट्राडिएल (estradiol) हॉर्मोन का असर दिमाग पर सिर्फ हाइपोथैलेमस द्वारा नियंत्रित होने वाले प्रजनन कार्यों तक ही सीमित नहीं है। ये हिप्पोकैम्पस और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (PFC) जैसे ब्रेन के हिस्सों में शरीर में पाए जाने वाले सभी प्रमुख एस्ट्रोजन रिसेप्टर्स (ERs) मौजूद होते हैं और ये एस्ट्राडिएल के प्रति बहुत ज्यादा सेंसिटिव होते हैं, साथ ही वे कॉग्निटिव व्यवहार को भी नियंत्रित करते हैं।
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ब्रेन पर कब बढ़ सकता है एस्ट्रोजन का असर?
डॉ. पार्थ का कहना है, जब एस्ट्रोजन का स्तर स्टेबल होता है, तो ये ब्रेन की प्रक्रिया आसानी से चलती रहती है। वहीं, महिलाओं में कुछ स्थितियों में एस्ट्रोजन हार्मोनल में बदलाव होना एक नॉर्मल बात है। जैसे -
- प्री मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS)
- पोस्टपार्टम (postpartum)
- पेरिमेनोपॉज (perimenopause)
- मेनोपॉज (menopause)
इन स्थितियों में बहुत सी महिलाएं अपने साइकिल के कुछ हफ्ते में, बच्चे के जन्म के बाद या 40 की उम्र के आखिर में महसूस हो सकता है कि उनका व्यवहार, सोचने का तरीका या इमोशन्स पहले जैसी नहीं हैं।
अचानक बढ़ सकती है चिंता और बैचेनी
डॉ. पार्थ के अनुसार, एस्ट्रोजन ब्रेन में मौजूद GABA नामक न्यूरोट्रांसमीटर के काम में मदद करता है। यह ब्रेन को शांत रखने में अहम भूमिका निभाता है। जब एस्ट्रोजन का स्तर कम होता है, तो GABA की एक्टिविटी भी कम हो सकती है। इसका असर यह होता है कि महिलाओं को बिना किसी कारण के घबराहट, बेचैनी या चिंता महसूस होने लगती है। ऐसा उन महिलाओं में भी हो सकता है, जिन्हें पहले कभी चिंता की समस्या नहीं रही हो, खासकर पीरिड्स से पहले, डिलीवरी के बाद या मेनोपॉज की शुरुआत में।
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मूड में होता है बदलाव
डॉ. पार्थ के अनुसार, एस्ट्रोजन का कनेक्शन सेरोटोनिन (serotonin) नामक केमिकल से भी होता है, जिसे अक्सर फील गुड केमिकल कहा जाता है। जब एस्ट्रोजन का स्तर कम होता है, तो सेरोटोनिन की एक्टिविटी भी प्रभावित हो सकती है। इसके कारण महिलाओं को चिड़चिड़ापन होने, उदासी होने, रोने का मन होना या बिना किसी बड़ी वजह के मन खराब रहना या मूड स्विंग्स होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। बिहेवियर में हर बदलाव को मूड स्विंग्स समझकर नजरअंदाज न करें।
क्या ब्रेन फॉग का मतलब याददाश्त का कमजोर होना है?
एस्ट्रोजन हिप्पोकैम्पस (hippocampus) यानी ब्रेन की मेमोरी और फोकस सेंटर को सपोर्ट करता है। ऐसे में कम एस्ट्रोजन का मतलब है शब्दों को धीरे-धीरे याद करना, ध्यान लगाने में परेशानी होना और छोटी-छोटी बातें भूलने जैसी परेशानी होती हैं। यह पेरिमेनोपॉज और पोस्टपार्टम में बहुत आम समस्या है और यह शुरुआती डिमेंशिया नहीं होता है। यह हार्मोनल फॉग है और इस समस्या को ठीक किया जा सकता है।
एस्ट्रोजन हार्मोन की सही पहचान क्यों है जरूरी?
डॉ. पार्थ बताते हैं, अगर किसी महिला में लगातार चिंता, उदासी, चिड़चिड़ापन या भूलने जैसे लक्षण बने रहते हैं, पर किसी मानसिक बीमारी के बारे में सोचना सही नहीं है। बल्कि इसके लिए सही तरीके से हार्मोनल स्थिति का डायग्नोसिस कराना जरूरी है।
एस्ट्रोजन हार्मोन रखने और अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्या करें?
- अपनी पीरियड साइकिल या हार्मोनल बदलावों के अनुसार अपने लक्षणों पर ट्रैक करें।
- इसे सिर्फ मूड खराब होना समझकर नजरअंदाज न करें। अगर लक्षण बार-बार या लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से तुरंत सलाह लें और लक्षणों की जांच होनी चाहिए।
- मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, दोनों की जांच जरूरी हो सकती है, ताकि स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिल सके।
- पर्याप्त नींद, नियमित एक्सरसाइज और बैलेंस डाइट शरीर को हेल्दी रखने में मदद कर सकते हैं, हालांकि ये हार्मोनल बदलावों का इलाज नहीं हैं।
निष्कर्ष
महिलाओं में स्ट्रेस, मूड स्विंग्स और ब्रेन फॉग जैसी समस्याओं का कारण मानसिक बीमारी नहीं होती है। कई बार शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन के असंतुलित, खासकर PMS, पोस्टपार्टम या मेनोपॉज जैसी स्थितियों में भी हो सकता है। इसे भूलने की बीमारी यानी डिमेंशिया समझने के बजाय हार्मोनल डायग्नोसिस करना और समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है। ध्यान रहे, मानसिक स्वास्थ्य को कई भी परेशान लंबे समय तक दिखे तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
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FAQ
एस्ट्रोजन हार्मोन बढ़ने के क्या नुकसान हैं?
शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर बढ़ने के कारण व्यक्ति को वजन बढ़ने, पीरियड्स के अनियमित होने, मूड में बदलाव होने, फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याएं और ब्रेस्ट में बदलाव होने जैसी कई समस्याएं होती हैं।याददाश्त कमजोर हो तो क्या करना चाहिए?
याददाश्त के कमजोर होने पर भरपूर नींद लें, हेल्दी डाइट लें, नियमित एक्सरसाइज करें और स्ट्रेस कम करें। ध्यान रहे, इन सभी आदतों के बाद भी याददाश्त के कमजोर होने की समस्या बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
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Jul 29, 2026 17:59 IST
Published By : Priyanka Sharma
Reviewed By : Dr Parth Nagda