प्रेग्नेंसी में महिलाओं का वजन बढ़ना पूरी तरह सामान्य है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि गर्भ में पल रहे शिशु का विकास जैसे-जैसे होता है, वैसे-वैसे उसका भार बढ़ता है, जिससे महिला का वजन बढ़ने लगता है। हालांकि, प्रेग्नेंसी के दौरान सही पौष्टिक आहार लेने की वजह से भी महिलाओं के वजन फर्क नजर आता है। बहरहाल, अक्सर माना जाता है कि डिलीवरी के बाद वजन कम हो जाता है और कंप्लीट रेस्ट के बाद महिलाएं पूरी तरह नॉर्मल हो जाती हैं। हालांकि, महिलाओं के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि प्रेग्नेंसी में बढ़ा वजन भविष्य में फैटी लिवर का जोखिम बनता है या नहीं? इस बारे में जानने के लिए हमने वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता से बात की।
क्या प्रेग्नेंसी में बढ़ा वजन भविष्य में फैटी लिवर के रिस्क को बढ़ाता है?
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प्रेग्नेंसी के दौरान वजन का बढ़ना पूरी तरह सामान्य है। हालांकि, जिन प्रेग्नेंसी के दौरान जो महिलाएं ओबेसिटी का शिकार थीं, उन्हें फैटी लिवर यानी MASLD (Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease) का खतरा बना रहता है। साल 2024 में Intechopen में साइंटिफिक पब्लिशर द्वारा जारी एक अध्ययन के अनुसार, "हाल के सालों में गर्भावस्था के दौरान MASLD (लिवर में चर्बी जमा होने की बीमारी) एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है, क्योंकि इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह समस्या उन महिलाओं के लिए चिंताजनक है, जो मोटापे या प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली शुगर से पीड़ित रही हैं। इसकी वजह से मां और होने वाले बच्चे दोनों की सेहत पर भविष्य में बुरा असर पड़ सकता है और उन्हें दिल की बीमारी, डायबिटीज और लिवर से जुड़ी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इसमें फैटी लिवर भी शामिल है।"
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प्रेग्नेंसी में मोटापे के कारण फैटी लिवर की समस्या कैसे बढ़ती है?
मेटाबोलिक बदलावः प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं में हार्मोनल बदलाव काफी ज्यादा होते हैं। वहीं, मेटाबोलिक परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं। ऐसे में अगर महिला प्रेग्नेंसी में ओबेसिटी का शिकार है, तो उनमें ये दोनों समस्याएं बढ़ जाती हैं। इस वजह से इंसुलिन सेंसिटिविटी में कमी आ जाती है, जो कि लिवर के पास और भी ज्यादा फैट को एकत्रित कर सकती है।
गर्भकालीन मधमेहः कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज हो जाता है। इसका मतलब है कि गर्भावस्था में मधुमेह होना और डिलीवरी के बाद शुगर का स्तर अपने आप सामान्य हो जाना। विशेषज्ञों की मानें, तो मोटापे का गर्भकालीन मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर से से गहरा संबंध है। ये दोनों स्थितियां ऐसी हैं, जो भविष्य में फैटी लिवर के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
लंबे समय तक वजन बढ़नाः आमतौर पर प्रेग्नेंसी में आखिरी महीनों में वजन बढ़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं में लंबे समय तक वजन बढ़ा हुआ रहता है, तो आगे चलकर मेटाबॉलिज्म स्थायी रूप से बिगड़ सकता है। यह स्थिति भी फैटी लिवर के रिस्क को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।
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निष्कर्ष
प्रेग्नेंसी के दौरान सामान्य स्तर में वजन का बढ़ना किसी भी तरह से चिंता का विषय नहीं है। हालांकि, वजन कितना बढ़ रहा है और कितने समय से बढ़ रहा है, इस बात पर गौर किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेग्नेंसी में बढ़ते वजन के कारण मेटाबोलिक रेट प्रभावित हो सकता है, जो कि भविष्य में फैटी लिवर के जोखिम को बढ़ाता है। इसलिए, जरूरी है कि महिलाएं इस संबंध में लापरवाही न करें और नियमित रूप से अपने लिवर की जांच करवाते रहें।
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FAQ
प्रेग्नेंसी के दौरान कितना वजन बढ़ना सामान्य या हेल्दी माना जाता है?
प्रेग्नेंसी में कितना वजन बढ़ना चाहिए, यह महिला के कंसीव करने के समय के BMI (बॉडी मास इंडेक्स) पर निर्भर करता है। सटीक जवाब जानने के लिए अपने डॉक्टर से मिलें।प्रेग्नेंसी में मोटापा लिवर को कैसे प्रभावित करता है?
मोटापा शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल असंतुलन पैदा करता है, जिससे फैटी लिवर की समस्या का जोखिम बढ़ जाता है।जेस्टेशनल डायबिटीज का लिवर पर क्या असर पड़ता है?
जेस्टेशनल डायबिटीज के कारण डिलीवरी के बाद भी महिलाओं का मेटाबॉलिज्म धीमा रहता है, जिससे फैटी लिवर की समस्या बानी रहती है।
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Jun 29, 2026 09:36 IST
Modified By : Meera Tagore Jun 29, 2026 09:36 IST
Modified By : Meera TagoreJun 29, 2026 09:36 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Shobha Gupta