Fri Sep 11, 2026 | 06:55 PM IST

Medically Reviewed by Dr Shobha Gupta , Medical Director and IVF Consultant

प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज से लेबर और डिलीवरी पर कैसे असर पड़ सकता है? डॉक्टर से जानें

क्या आप भी जेस्टेशनल डायबिटीज से जूझ रही हैं? अगर हां, तो गर्भावस्था के दौरान इस स्थिति को इग्नोर करने की गलती न करें। यह आपकी डिलीवरी और लेबर पेन को कई मायनों में प्रभावित करती है। जानें, कैसे?

यह बात हम सभी जानते हैं कि डायबिटीज अपने आप में एक गंभीर मेडिकल कंडीशन है। इसमें ब्लड शुगर का स्तर स्थिर नहीं रहता है और अगर इसे समय पर कंट्रोल न किया जाए, तो भविष्य में रक्त वाहिकाओं को नुकसान हो सकता है। ऐसी स्थिति में ब्लड फ्लो बाधित होता है, जिससे हार्ट हेल्थ पर नेगेटिव असर पड़ सकता है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर किसी को प्रेग्नेंसी में डायबिटीज हो जाए, तो यह कितना जोखिम भरा हो सकता है। इसके बावजूद, देखने में आता है कि कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज हो जाता है, जिसे जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है। हालांकि, यह कंडीशन डिलीवरी के बाद अपने आप ठीक भी हो जाती है, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान हुए डायबिटीज को कंट्रोल किया जाना बहुत जरूरी होता है। माना जाता है कि ऐसा न किया जाए, तो लेबर और डिलीवरी में कई जटिलताएं हो सकती हैं। वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट एवं IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता से जानें इसके बारे में।

जेस्टेशनल डायबिटीज लेबर और डिलीवरी को कैसे प्रभावित करती है?

how does gestational diabetes influence labor and deliver 01 (21)

जेस्टेशनल डायबिटीज मुख्य रूप से लेबर और डिलीवरी को दो तरह से प्रभावित करता है, जैसे-

समय से पहले प्रसव की आवश्यकता

गर्भकालीन मधुमेह यानी जेस्टेशनल डायबिटीज होने पर समय से पहले प्रसव की आवश्यकता हो जाती है। असल में, गर्भावस्था के आखिरी महीनों में शिशु का भार काफी ज्यादा बढ़ जाता है। नाॅर्मल प्रेग्नेंसी में यह सही संकेत है, लेकिन जेस्टेशनल डायबिटीज के कारण गर्भ में शिशु का आकार काफी बढ़ सकता है (मैक्रोसोमिया), जिससे प्रसव के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं।

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सी-सेक्शन का जोखिम

डॉ. शोभा गुप्ता समझाती हैं कि जेस्टेशनल डायबिटीज के कारण महिला का ब्लड शुगर बार-बार अस्थिर हो सकता है, जिस पर कड़ी निगरानी रखे जाने की जरूरत होती है। कई बार शुगर के स्तर को सुरक्षित और सामान्य बनाए रखने के लिए मां को इंसुलिन या ग्लूकोज की ड्रिप भी देनी पड़ जाती है। इसके अलावा, बच्चे का आकार बड़ा होने के कारण प्रसव की गति धीमी हो सकती है। यह कई अन्य समस्याओं को जन्म दे सकती है, जैसे शोल्डर डिस्टोसिया। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें डिलीवरी के दौरान बच्चे का कंधा मां की पेल्विक हड्डी में फंस जाता है। यह भी सही कंडीशन नहीं है।

डिलीवरी के बाद की समस्याएं

जेस्टेशनल डायबिटीज में सिर्फ डिलीवरी होने तक की परेशानियां नहीं होती हैं। डिलीवरी होने के बाद भी मां से ज्यादा शिशु के स्वास्थ्य को खतरा होता है। इस बारे में डाॅ. शोभा गुप्ता समझाती हैं, "जेस्टेशनल डायबिटीज से पीड़ित महिलाओं को लगता है कि जन्म के बाद उनके शिशु से डायबिटीज का खतरा टल गया, जबकि ऐसा नहीं है। असल में, डिलीवरी के बाद शिशु को नियोनेटल हाइपोग्लाइसीमिया होने का रिस्क होता है। वास्तव में गर्भ में मां के हाई शुगर के कारण बच्चा अधिक मात्रा में इंसुलिन बना रहा होता है। जन्म के बाद मां से मिलने वाला ग्लूकोज अचानक बंद हो जाता है, जिससे बच्चे का शुगर लेवल खतरनाक रूप से गिर सकता है।" डॉ. शोभा गुप्ता आगे बताती हैं, "समस्या यहीं टल नहीं जाती है। कई जन्म के बाद बच्चों को सांस लेने में तकलीफ भी हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि ऐसे बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित होने में समय लेते हैं, जिससे उन्हें जन्म के बाद सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।"

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प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज को कैसे मैनेज करें?

ब्लड शुगर कंट्रोल करेंः जेस्टेशनल डायबिटीज को जरा भी हल्के में लेने की कोशिश न करें। यह शिशु और गर्भवती महिला, दोनों के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। जेस्टेशनल डायबिटीज होने की अवस्था में सबसे पहले अपने ब्लड शुगर को कंट्रोल करने की कोशिश करें। इसके लिए लो ग्लाइसेमिक डाइट लें यानी साबुत अनाज, लीन प्रोटीन और पर्याप्त मात्रा में फाइबर का सेवन करें। इसके अलावा, दो मील्स के बीच कम से कम 2.5 से 3 घंटे का समय रखें ताकि ब्लड शुगर का स्तर स्थिर रहे।

एक्सरसाइज करेंः जेस्टेशनल डायबिटीज में नियमित रूप से एक्सरसाइज करना बहुत जरूरी है। अगर आपका स्वास्थ्य सही है और एक्सरसाइज कर सकती हैं, तो रोजाना कम से कम 30 मिनट के लिए वर्कआउट जरूर करें। अगर ज्यादा मूवमेंट में दिक्कत आती है, तो महज 15 मिनट की वाॅक भी आपके लिए फायदेमंद हो सकती है।

ब्लड शुगर माॅनिटर करेंः जेस्टेशनल डायबिटीज में ब्लड शुगर को न सिर्फ स्थिर बनाए रखना जरूरी है, बल्कि समय-समय उसे माॅनिटर किया जाना भी जरूरी है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि ताकि ब्लड शुगर में जरा भी बदलाव दिखे या किसी तरह का खास पैटर्न नजर आए, तो तुरंत उसका इलाज किया सके।

समय पर दवा लेंः अगर डाॅक्टर ने जेस्टेशनल डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए दवा दी है, तो उसे समय पर लें। अपनी दवाओं के साथ किसी तरह की लापरवाही न करें। कुछ महिलाओं को इस दौरान इंसुलिन की सलाह दी जाती है।

निष्कर्ष

प्रेग्नेंसी के दौरान कई महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हो जाता है। ऐसा नहीं है कि इस स्थिति को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है। जीवनशैली में अच्छी आदतों को अपनाकर और डाइट में जरूरी बदलाव करके आप प्रेग्नेंसी के सफर को आसान बना सकती हैं। हालांकि, यह ध्यान जरूर रखें कि इसकी वजह से समय पूर्व प्रसव हो सकता है और कई जटिलताएं भी बढ़ सकती हैं। इसके लिए शुरू से तैयार रहें और पूरी प्रेग्नेंसी की जर्नी में डाॅक्टर की देखरेख में रहें।

All Image Credit: Freepik

FAQ

  • क्या जेस्टेशनल डायबिटीज होने पर वजाइनल डिलीवरी हो सकती है?

    जेस्टेशनल डायबिटीज होने के बावजूद नाॅर्मल डिलीवरी हो सकती है, लेकिन इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है। जैसे मां का ब्लड शुगर पूरी तरह नियंत्रित हो और अल्ट्रासाउंड में शिशु का वजन और आकार सामान्य रहे। इसके बाद, डाॅक्टर गर्भवती महिला की कंडीशन देखते हुए वजाइनल डिलीवरी का प्रयास कर सकते हैं।
  • प्रसव के दौरान मां का ब्लड शुगर लेवल कितना होना चाहिए?

    विशेषज्ञों के अनुसार डिलीवरी के दौरान मां का ब्लड शुगर 70 से 110 mg/dl के बीच होना चाहिए तभी बच्चे को जन्म के बाद हाइपोग्लाइसीमिया से बचाया जा सकता है।

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Disclaimer

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Meera Tagore

Meera Tagore

Senior Sub Editor

मीरा टैगोर 2009 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और पिछले 5 वर्षों से विशेष रूप से हेल्थ जर्नलिज्म पर काम कर रही हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealthमें सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। वह महिला स्वास्थ्य और यौन स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर लिखती हैं और इनसे जुड़ी जानकारी को प्रमाणित स्रोतों और रिसर्च के आधार पर सटीक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। जिन विषयों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की थी और OnlyMyHealth से पहले Image Reflection Centre, Haribhoomi और MyUpchar के साथ काम कर चुकी हैं।

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    Jul 08, 2026 11:12 IST

    Modified By : Meera Tagore
  • Jul 08, 2026 11:12 IST

    Published By : Meera Tagore
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