Fri Sep 11, 2026 | 06:53 PM IST

Medically Reviewed by Dr Shobha Gupta , Medical Director and IVF Consultant

डिलीवरी में ज्यादा देरी से शिशु को कैसे हो सकता है इंफेक्शन? जानें डॉक्टर कब देते हैं तुरंत डिलीवरी की सलाह

अगर महिला की डिलीवरी में देरी होने लगे, तो इससे शिशु को इंफेक्शन का खतरा हो सकता है। इसे पोस्ट टर्म प्रेग्नेंसी कहा जाता है, जिसमें मां और शिशु दोनों के लिए कई तरह की जटिलताएं बढ़ सकती हैं। इसलिए ऐसी स्थिति में डॉक्टर मां और शिशु, दोनों की लगातार निगरानी करते हैं।

डिलीवरी की अनुमानित तारीख (Due Date) लगभग एक हफ्ता आगे या पीछे हो सकती है, लेकिन कई महिलाओं में डिलीवरी डेट निकलने के बाद भी लेबर पेन शुरू नहीं होता। यह कई महिलाओं के लिए सामान्य हो सकता है, क्योंकि हर शिशु 40वें हफ्ते में ही जन्म लें, यह जरूरी नहीं है। हालांकि, जब प्रेग्नेंसी 41 या 42 हफ्ते तक पहुंच जाती है, तो डॉक्टर मां और बच्चे, दोनों की सेहत पर खासतौर पर नजर रखते हैं। अगर डिलीवरी में देरी होती है, तो क्या इससे शिशु को इंफेक्शन हो सकता है? इस बारे में जानने के लिए हमने वृंदावन स्थित Birthing Paradise की Medical Director and IVF Specialist Dr. Shobha Gupta से बात की। उन्होंने बताया कि अगर डिलीवरी जरूरत से ज्यादा देर तक टलती है, तो कुछ मामलों में शिशु में इंफेक्शन और अन्य गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं।

डिलीवरी डेट में देरी होने से शिशु को इंफेक्शन का खतरा कैसे बढ़ सकता है?

Mayo Clinic के अनुसार, आमतौर पर महिलाओं की डिलीवरी 37 से 41 हफ्ते के बीच हो जाती है। अगर प्रेग्नेंसी 41 हफ्ते से 41 हफ्ते 6 दिन तक भी पहुंच जाए, तो इसे लेट टर्म प्रेग्नेंसी कहा जाता है और 42 हफ्ते या उससे ज्यादा होने पर इसे पोस्ट-टर्म प्रेग्नेंसी माना जाता है।

इस बारे में Dr. Shobha Gupta कहती हैं, “जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, प्लेसेंटा का फंक्शन धीरे-धीरे कम होने लगता है। प्लेसेंटा ही शिशु तक ऑक्सीजन और न्यूट्रिशन पहुंचाने का काम करता है। अगर प्लेसेंटा ठीक तरह से काम नहीं करता, तो शिशु को पर्याप्त न्यूट्रिशन और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता। ऐसी कंडीशन में एमनियोटिक फ्लूइड (पानी) भी कम हो सकता है। एमनियोटिक फ्लूइड कम होने से इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है। अगर इस दौरान वाटर बैग फट जाए और लंबे समय तक डिलीवरी न हो, तो बैक्टीरिया यूटरस तक पहुंच सकते हैं। इससे मां और शिशु दोनों को इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ सकती है।”

late delievery can cause infant infection

डिलीवरी में देरी से शिशु की पॉटी भी बन सकती है खतरा

Dr. Shobha Gupta के मुताबिक, “डिलीवरी में देरी होने पर कई बार शिशु गर्भ में ही पहली पॉटी यानी मीकोनियम कर सकता है। अगर यह एमनियोटिक फ्लूइड में मिल जाए और शिशु इसे जन्म से पहले या जन्म के दौरान सांस के साथ अंदर खींच लें, तो शिशु के फेफड़ों में इंफेक्शन के अलावा सांस लेने में भी परेशानी हो सकती है। कई बार ऐसी कंडीशन में शिशु को जन्म के तुरंत बाद आईसीयू में भर्ती भी करना पड़ सकता है।”

स्टडी में आए चौंकाने वाले तथ्य

European Journal of Cardiovascular Medicine में पोस्ट-टर्म प्रेग्नेंसी पर एक स्टडी प्रकाशित की गई। यह स्टडी असम के तेजपुर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में साल 2023 से जुलाई 2024 के बीच की गई थी। इसमें 106 प्रेग्नेंट महिलाओं को शामिल किया गया, जिनकी प्रेग्नेंसी को 40 हफ्ते से ज्यादा हो चुके थे। इस स्टडी में पाया गया कि पोस्ट-टर्म जन्म लेने वाले 16% शिशु सामान्य से बहुत भारी थे। इस वजह से डिलीवरी के दौरान शोल्डर डिस्टोसिया (कंधा फंसने) का खतरा बढ़ गया। 42.5% मामलों में बच्चे ने पेट के भीतर ही मल त्याग दिया, जिससे पानी गंदा हो गया। 7.5% शिशुओं में गंदा एमनियोटिक फ्लूइड फेफड़ों में जाने की समस्या देखी गई। इस स्टडी में यह भी देखा गया कि 1.9% नवजात शिशुओं की मृत्यु डिलीवरी के शुरुआती सात दिनों के अंदर गंभीर समस्याओं के कारण हो गई। प्लेसेंटा कमजोर होने के कारण शिशु में 6.4 गुना खतरा ज्यादा पाया गया।

डिलीवरी में देरी से मां और शिशु में होने वाली परेशानियां

Dr. Shobha Gupta के अनुसार, “डिलीवरी को ज्यादा देर टालने से शिशु में ऑक्सीजन की कमी, कम एमनियोटिक फ्लूइड की समस्या, फीटल डिस्ट्रेस, जन्म के समय सांस लेने में दिक्कत और ज्यादा वजन होने के कारण नॉर्मल डिलीवरी मुश्किल हो सकती है। डिलीवरी लेट होने पर मां को लंबे समय तक चलने वाला लेबर, इंफेक्शन का खतरा, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग और यूटरस में चोट लगने के रिस्क की वजह से सी-सेक्शन की संभावना बढ़ सकती है।”

डॉक्टर डिलीवरी कराने की सलाह कब देते हैं?

Dr. Shobha Gupta के मुताबिक, “अगर डिलीवरी डेट निकलने के बाद लेबर पेन शुरू नहीं होता, तो मां और शिशु को चेक किया जाता है। अगर कुछ भी रिस्क दिखता है, तो लेबर इनडक्शन की सलाह दी जा सकती है। इसके लिए सर्विक्स को नरम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं या मेम्ब्रेन स्वीपिंग की जा सकती है, लेकिन किसी भी प्रोसेस को करने का फैसला मरीज की कंडीशन देखकर ही किया जाता है।”

निष्कर्ष
Dr. Shobha Gupta कहती हैं कि देरी से डिलीवरी होना कोई चिंता का कारण नहीं होता, लेकिन इसे हल्के में भी नहीं लेना चाहिए। सही समय पर चेकअप कराने से इंफेक्शन का पता चल सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के घरेलू उपायों से लेबर शुरू करने की कोशिश न करें। मां और बच्चे की बेहतर सेहत के लिए सिर्फ डॉक्टर की सलाह ही मानें।

FAQ

  • पानी की कमी शिशु को बीमार कैसे बनाती है?

    9वें महीने के बाद गर्भ में मौजूद एमनियोटिक फ्लूइड (पानी) का स्तर तेजी से घटने लगता है। यह पानी शिशु के लिए सुरक्षा कवच और एंटी-बैक्टीरियल शील्ड का काम करता है। इसकी कमी होने से शिशु के अंगों पर दबाव पड़ता है और बाहरी कीटाणुओं से लड़ने की उसकी क्षमता खत्म हो जाती है।
  • शिशु में इंफेक्शन के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

    यदि संक्रमित बच्चा पैदा होता है, तो उसे नियोनेटल सेप्सिस हो सकता है। ऐसे शिशुओं को सांस लेने में भयंकर तकलीफ होती है, उनका शरीर ठंडा पड़ने लगता है, वे दूध नहीं पी पाते और उन्हें दौरे भी आ सकते हैं। ऐसे बच्चों को तुरंत एनआईसीयू में रखना पड़ता है।

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Aneesh Rawat

Aneesh Rawat

Chief Sub Editor

अनीश रावत को हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 16+ साल का अनुभव है। फिलहाल जागरण न्यू मीडिया के Onlymyhealth में चीफ सब एडिटर हैं। महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, मेडिटेशन और योग पर Research based, doctor verified और SEO फ्रेंडली लेख लिखने में विशेषज्ञ हैं। न्यूज 24, ऑल इंडिया रेडियो और ThinkRight मेडिटेशन ऐप जैसे भरोसेमंद platforms पर काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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