Fri Sep 11, 2026 | 06:55 PM IST

Medically Reviewed by Dr Shobha Gupta , Medical Director and IVF Consultant

प्रेग्नेंसी में बार-बार सर्जरी कराने से क्यों बढ़ जाता है Placenta Accreta का खतरा? जानें डॉक्टर से

प्रेग्नेंसी में डिलीवरी के लिए सर्जरी कराना आम हो गया है, लेकिन जिन महिलाओं की दो या उससे अधिक बार सिजेरियन डिलीवरी हो चुकी है। उनमें Placenta Accreta Spectrum (PAS) होने का खतरा हो सकता है। इस बारे में डॉक्टर ने विस्तार से समझाया कि बार-बार सी-सेक्शन होने से ये खतरा क्यों बढ़ सकता है?  

सी-सेक्शन से डिलीवरी कई कंडीशन्स में जरूरी और सुरक्षित विकल्प हो सकता है, लेकिन जब डिलीवरी के लिए सर्जरी दो या इससे ज्यादा बार हो जाए, तो महिलाओं को अगली प्रेग्नेंसी में Placenta Accreta का खतरा बढ़ सकता है। इसे प्रेग्नेंसी की गंभीर कंडीशन्स में से एक माना जाता है। इस बारे में हमने वृंदावन स्थित Birthing Paradise की Medical Director and IVF Specialist Dr. Shobha Gupta से बात की। उन्होंने बताया कि बार-बार सी-सेक्शन के कारण डिलीवरी के समय प्लेसेंटा यूटरस की दीवार के साथ असामान्य तरीके से चिपक जाता है, जिसे अलग करना मुश्किल हो जाता है। इससे बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होने का रिस्क बढ़ सकता है।

बार-बार सी-सेक्शन से Placenta Accreta का रिस्क क्यों बढ़ता है?

Dr. Shobha Gupta कहती हैं, “प्रेग्नेंसी के दौरान प्लेसेंटा, मां और भ्रूण के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम करता है। प्लेसेंटा के जरिए भ्रूण को ऑक्सीजन और जरूरी न्यूट्रिशन मिलते हैं और जब नॉर्मल डिलीवरी होती है, तो प्लेसेंटा आसानी से गर्भाशय से अलग हो जाता है, लेकिन बार-बार सी-सेक्शन के कारण प्लेसेंटा असामान्य रूप से चिपक जाता है और कई बार गंभीर मामलों में यह यूटरस की मांसपेशियों के अंदर तक पहुंच सकता है। दरअसल, डिलीवरी के समय बार-बार सर्जरी किए जाने पर चीरा लगाया जाता है, जिसका जख्म भरने में समय लगता है, लेकिन इसका परमानेंट स्कार बन जाता है। अगर अगली प्रेग्नेंसी में प्लेसेंटा उसी पुराने निशान वाली जगह पर विकसित हो जाए, तो नाल के सामान्य रूप से जुड़ने के बजाय गर्भाशय की दीवार में गहराई से धंसने की संभावना बढ़ सकती है। यही Placenta Accreta का कारण बन सकता है।”

Mayo Clinic के अनुसार, जितनी बार सी-सेक्शन किया जाता है, अगली प्रेग्नेंसी में प्लेसेंटा से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का खतरा भी उतना बढ़ता जाता है। इनमें Placenta Accreta और प्लेसेंटा प्रिविया सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। हालांकि, एक्सपर्ट्स यह नहीं बता पाए हैं कि कितने सी-सेक्शन के बाद यह रिस्क बढ़ सकता है।

Placenta Accreta

रिसर्च क्या कहती है?

Scientific Reports में प्रकाशित स्टडी में Placenta Accreta के बारे में बताया गया है। यह स्टडी फ्रांस में साल 2013 से 2015 के बीच 5,20,114 डिलीवरी मामलों पर की गई। इनमें से 396 महिलाओं की पहले सिजेरियन डिलीवरी हई थी। ऐसे में जिन महिलाओं को पहले एक सी-सेक्शन हुआ था, तो उनमें 19 फीसदी महिलाओं में Placenta Accreta की समस्या देखी गई और दो बार सी-सेक्शन के बाद 36% महिलाओं में यह देखने को मिला और तीन से ज्यादा बार सी-सेक्शन होने पर 57% महिलाओं में Placenta Accreta की समस्या देखी गई। जिन महिलाओं का वजन ज्यादा था, उनमें रिस्क बहुत ज्यादा देखा गया था।

प्रेग्नेंसी में Placenta Accreta होने के रिस्क

Dr. Shobha Gupta के मुताबिक, “Placenta Accreta होने पर न सिर्फ डिलीवरी होना मुश्किल होता है, बल्कि महिलाओं को बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो सकती है, समय से पहले डिलीवरी होना, इमरजेंसी सी-सेक्शन, मूत्राशय या आसपास के अंगों को नुकसान पहुंचना और लंबे समय तक महिलाओं को भर्ती रहना पड़ सकता है। इसी वजह से इसे हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी माना जाता है।”

निष्कर्ष
Dr. Shobha Gupta कहती हैं कि जिन महिलाओं का पहले एक या इससे ज्यादा बार सी-सेक्शन हो चुका है, तो प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले डॉक्टर से जरूर बात करनी चाहिए। डॉक्टर महिला की मेडिकल हिस्ट्री और प्लेसेंटा की लोकेशन को ध्यान में रखकर ही प्रेग्नेंसी की सलाह देते हैं। वैसे तो डिलीवरी के समय मां और शिशु को बचाने के लिए सी-सेक्शन किया जाता है और आजकल की आधुनिक तकनीकों के जरिए रिस्क बहुत कम रह जाता है, लेकिन बार-बार सर्जरी से Placenta Accreta का खतरा बढ़ सकता है।

FAQ

  • डिलीवरी के समय प्लेसेंटा एक्रिटा होने पर क्या गंभीर खतरा होता है?

    बच्चे के जन्म के बाद जब डॉक्टर प्लेसेंटा को बाहर निकालने की कोशिश करते हैं, तो वह गर्भाशय की दीवार से अलग नहीं होता। जबरन अलग करने पर गर्भाशय की नसें फट जाती हैं और महिला को बहुत ज्यादा ब्लीडिंग शुरू हो सकती है, जिससे मरीज शॉक में जा सकता है।
  • डॉक्टर इस स्थिति की पहचान डिलीवरी से पहले कैसे करते हैं?

    इस बीमारी के कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखते, इसलिए इसकी पहचान केवल रूटीन चेकअप से होती है। गर्भावस्था की दूसरी और तीसरी तिमाही में किए जाने वाले कलर डॉपलर अल्ट्रासाउंड (USG) या गंभीर मामलों में MRI Scan के जरिए डॉक्टर यह साफ देख लेते हैं कि नाल गर्भाशय की दीवार में कितनी गहराई तक धंसी हुई है।

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Disclaimer

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Aneesh Rawat

Aneesh Rawat

Chief Sub Editor

अनीश रावत को हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 16+ साल का अनुभव है। फिलहाल जागरण न्यू मीडिया के Onlymyhealth में चीफ सब एडिटर हैं। महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, मेडिटेशन और योग पर Research based, doctor verified और SEO फ्रेंडली लेख लिखने में विशेषज्ञ हैं। न्यूज 24, ऑल इंडिया रेडियो और ThinkRight मेडिटेशन ऐप जैसे भरोसेमंद platforms पर काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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  • Jul 01, 2026 19:00 IST

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