National Library of Medicine के अनुसार, जब कोई महिला की प्रेग्नेंसी सिजेरियन हुई है और इसके बाद सामान्य डिलीवरी हुई है, उसे NBAC (Vaginal Birth After Cesarean) कहा जाता है। इस स्टडी के मुताबिक, ऐसी महिलाओं में VBAC की सफलता दर 60% से 80% होती है। अगर सर्जरी के आंकड़ों को देखा जाए, तो दुनियाभर में सिजेरियन डिलीवरी की दर 1970 में 5% थी, जो साल 2022 में बढ़कर 32.1% हो गई है। हालांकि, बढ़ते आंकड़ों के बावजूद, अगर महिला की मेडिकल स्थिति बिल्कुल ठीक है, तो नॉर्मल डिलीवरी कराने की सलाह दी जाती है। कई मामलों में तो पहली सर्जरी के बाद अगर महिला की प्रेग्नेंसी सही है, तो उसकी नॉर्मल डिलीवरी की जाती है। इस बारे में हमने Mumma's Blessing IVF और वृंदावन स्थित Birthing Paradise की Medical Director and IVF Specialist डॉ. शोभा गुप्ता और Dr. Saumya, Consultant- Obstetrics & Gyaenocology, Regency Hospital Gorakhpur से बात की।
किन महिलाओं को पहले सी-सेक्शन के बाद नॉर्मल डिलीवरी की संभावना होती है?
Dr. Shobha Gupta कहती हैं, “आजकल मेडिकल क्षेत्र में इतनी तरक्की हो रही हैं कि महिलाओं की सही तरीके से मॉनिटरिंग करने की वजह से सी-सेक्शन के बाद नॉर्मल डिलीवरी कराना काफी आसान हो गया है। हालांकि, नॉर्मल डिलीवरी की फैसला मां और भ्रूण की मेडिकल कंडीशन देखकर लिया जाता है।”
पहले सी-सेक्शन की वजह अस्थायी रही हो
Dr. Saumya ने बताया कि सबसे पहले यह देखा जाता है कि पिछली बार सी-सेक्शन क्यों करना पड़ा था। अगर बच्चा ब्रीच पोजिशन में था, जुड़वा प्रेग्नेंसी थी या बच्चे की हार्ट बीट में अचानक बदलाव आया था और इस बार ऐसी कोई दिक्कत नहीं है, तो नॉर्मल डिलीवरी के चांस काफी ज्यादा बढ़ जाते हैं। इसके साथ यह भी ध्यान रखा जाता है कि अगर पहली बार सर्जरी करने की वजह लेबर पेन या पेल्विस से जुड़ी हुई थी, तो फिर दूसरी बार ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ती है।

पहले कभी नॉर्मल डिलीवरी हो चुकी हो
Dr. Shobha Gupta के मुताबिक, “अगर किसी महिला की प्रेग्नेंसी में पहले कभी नॉर्मल डिलीवरी हो चुकी है, फिर चाहे बाद में सी-सेक्शन हुआ हो, ऐसे मामलों में नॉर्मल डिलीवरी के चांस बढ़ सकते हैं। इसलिए सी-सेक्शन होने के बाद भी महिलाओं की सामान्य डिलीवरी संभव है।”
लो ट्रांसवर्स सी-सेक्शन होना
Dr. Saumya कहती हैं, “सी-सेक्शन के दौरान यह बहुत महत्वपूर्ण होता है कि यूटरस में किस तरह का चीरा लगाया गया है। अगर महिलाओं को लो ट्रांसवर्स यानी नीचे दाईं से बाईं ओर चीरा लगाया जाता है, तो ऐसे चीरे में अगली बार सामान्य डिलीवरी के दौरान यूटरस फटने की संभावना काफी कम रहती है। अगर किसी महिला के यूटरस पर ऊपर से नीचे की ओर चीरा लगा होता है, तो उसे नॉर्मल डिलीवरी की सलाह नहीं दी जाती।”
दो प्रेग्नेंसी के बीच अंतर होना
Dr. Saumya के अनुसार, “महिला के सी-सेक्शन होने के बाद शरीर को रिकवर होने के लिए पूरा समय देना जरूरी होता है। अगर दो डिलीवरी के बीच कम से कम 18 से 24 महीने का अंतर नहीं होता, तो गर्भाशय में लगा चीरा पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ होता। इसलिए मैं आमतौर पर महिलाओं को दो प्रेग्नेंसी के बीच दो साल का गैप रखने की सलाह देती हूं, अगर महिला की डिलीवरी सी-सेक्शन से हुई है।”
लेबर पेन अपने आप शुरू हो जाए
Dr. Shobha Gupta ने कहा, “अगर महिला को प्रेग्नेंसी के दौरान हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, प्लेसेंटा से जुड़ी समस्या या मेडिकल कॉम्प्लिकेशन नहीं है, तो नॉर्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में शिशु का वजन सामान्य है और लेबर पेन खुद ही शुरू हो जाए, तो VBAC के सफल होने के चांस और बेहतर हो जाते हैं।”
निष्कर्ष
Dr. Shobha Gupta सलाह देती हैं कि अगर किसी महिला के पहले दो या इससे ज्यादा सी-सेक्शन हो चुके है, प्लेसेंटा प्रीविया की समस्या या पहले गर्भाशय फटने जैसी दिक्कत हो चुकी है, तो महिलाओं को नॉर्मल डिलीवरी नहीं कराई जाती। हालांकि, सी-सेक्शन के बाद नॉर्मल डिलीवरी कई महिलाओं के लिए बेहतर ऑप्शन होता है, लेकिन इसका फैसला पिछली सर्जरी के कारण, गर्भाशय की स्थिति, दोनों गर्भधारण के बीच का अंतर और मां की सेहत पर निर्भर करती है।
FAQ
क्या मां की उम्र और वजन भी VBAC की सफलता को प्रभावित करते हैं?
डॉक्टरों के अनुसार, 35 साल से कम उम्र की महिलाओं और गर्भावस्था के दौरान जिनका वजन संतुलित रहता है, उनमें सी-सेक्शन के बाद नॉर्मल डिलीवरी की संभावना काफी ज्यादा होती है। अत्यधिक वजन या मोटापा होने पर प्रसव की राह में जटिलताएं बढ़ सकती हैं।अगर पिछली बार 'लेबर प्रोग्रेस न होने' के कारण सी-सेक्शन हुआ था, तो क्या इस बार नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है?
इसकी संभावना थोड़ी कम हो जाती है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं है। अगर पिछली बार गर्भाशय का मुंह पूरी तरह न खुलने या बच्चा नीचे न खिसकने के कारण ऑपरेशन करना पड़ा था, तो डॉक्टर इस बार महिला के पेल्विस (कूल्हे की हड्डी) के आकार और बच्चे के वजन का दोबारा बारीकी से आकलन करते हैं। यदि सब अनुकूल हो, तो प्रयास किया जा सकता है।
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Current Version
Jun 30, 2026 16:59 IST
Modified By : Aneesh Rawat Jun 30, 2026 16:59 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Shobha Gupta