Fri Sep 11, 2026 | 06:54 PM IST

Medically Reviewed by Dr Vidya Tickoo , Consultant Endocrinologist & Diabetologist

जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का खतरा क‍िन मह‍िलाओं में ज्‍यादा होता है? डॉक्‍टर से जानें बचाव के उपाय

जब गर्भवती मह‍िला के शरीर में पर्याप्‍त इंसुलि‍न नहीं बन पाती है, तो ब्‍लड में ग्‍लूकोज का लेवल बढ़ने लगता है और इसे ही जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज कहा जाता है। डॉक्‍टर से जानें क‍िन मह‍िलाओं को इसका अध‍िक खतरा हो सकता है?

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ज‍िन मह‍िलाओं का शुगर लेवल हाई या असामान्‍य होता है उनमें जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का खतरा ज्‍यादा हो सकता है। जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज को आसान भाषा में समझें, तो जब क‍िसी मह‍िला को प्रेग्नेंसी में डायब‍िटीज होती है, तो उसे गर्भकालीन या जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज के नाम से जाना जाता है। जरूरी नहीं है क‍ि हर मह‍िला को प्रेग्नेंसी में डायब‍िटीज हो या शुगर लेवल असंतुल‍ित हो, लेक‍िन शुगर लेवल असंतुल‍ित होने के कारण नॉर्मल ड‍िलीवरी में अड़चन आ सकती है और गर्भस्‍थ श‍िशु की सेहत भी ब‍िगड़ सकती है। कई सरकारी अस्‍पतालों में हाई र‍िस्‍क वार्ड बनाए जाते हैं ताक‍ि जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज के मरीजों की खास देखभाल की जा सके, लेक‍िन अगर हर महि‍ला को यह समस्‍या नहीं होती, तो क‍िन्‍हें इसका ज्‍यादा खतरा होता है? इस सवाल का जवाब जानने के ल‍िए हमने Dr. Vidya Tickoo, Consultant Endocrinologist & Diabetologist At Yashoda Hospitals, Hitech City Hyderabad से बात की।

क‍िन मह‍िलाओं को जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का खतरा ज्‍यादा होता है?

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1. मोटापे से पीड़ि‍त मह‍िलाएं

Dr. Vidya Tickoo ने कहा ''ज‍िन मह‍िलाओं का वजन ज्‍यादा है या जो मोटापे का श‍िकार हैं, उनके शरीर में सूजन बढ़ने से इंसुल‍िन प्रभाव‍ित हो सकता है। सूजन और ज्‍यादा वजन से इंसुल‍िन रेजि‍स्‍टेंस बढ़ सकता है ज‍िससे शुगर को कंट्रोल करना मुश्‍क‍िल हो सकता है और म‍ह‍िला जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का श‍िकार हो जाती है।''

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अध‍िक BMI से भी बढ़ सकता है खतरा

साल 2025 में European Journal Of Cardiovascular Medicine में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के मुताब‍िक, 15.9% गर्भवती महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज की समस्‍या न‍िकली। सबसे अधिक मामले 25 से 29 वर्ष की महिलाओं में देखे गए। स्‍टडी के मुताब‍िक, जिन महिलाओं का BMI ज्‍यादा था, ज‍िनकी लाइफस्‍टाइल एक्‍ट‍िव नहीं थी या ज‍िनके पर‍िवार में डायब‍िटीज का इत‍िहास था, उनमें जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज की संभावना देखी गई।

2. ज‍िन मह‍िलाओं के पर‍िवार में डायब‍िटीज का इत‍िहास हो

Dr. Vidya Tickoo ने कहा ''ज‍िन मह‍िलाओं के पर‍िवार में डायब‍िटीज का इत‍िहास रहा है, वहां एक जैसा खानपान जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का खतरा बढ़ा सकता है। पर‍िवार में सभी का खानपान लगभग एक जैसा होता है। ऐसे में गलत डाइट का असर होने वाली मां को जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज के करीब कर सकता है। आनुवंश‍िक कारणों से शरीर के इंसुल‍िन बनाने की क्षमता प्रभाव‍ित हो सकती है।''

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3. प‍िछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज हो

अगर क‍िसी मह‍िला को पहली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज हो, तो यह संभव है क‍ि उसे दूसरी प्रेग्नेंसी में भी जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज हो सकती है। यह इस बात का संकेत है क‍ि शरीर में इंसुल‍िन रेजि‍स्‍टेंस पहले से मौजूद है। बाद में बढ़ा हुआ वजन या अध‍िक उम्र, इस खतरे को और बढ़ा सकती है।

ज्‍यादा उम्र भी बन सकता है कारण

साल 2023 में Journal Of Endocrinological Investigation में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के मुताब‍िक, 30 से 35 साल या उससे अध‍िक उम्र की मह‍िलाओं में मोटापा और 30 से 35 साल सा उससे अध‍िक उम्र में प्रेग्नेंसी को जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज के दो मुख्‍य कारण बताया गया है।

4. अध‍िक वजन वाले बच्‍चे को जन्‍म द‍िया हो

Dr. Vidya Tickoo ने बताया क‍ि अगर पहली प्रेग्नेंसी में 4 या उससे अध‍िक वजन वाले बच्‍चे को जन्‍म द‍िया है, तो कभी-कभी मां में पहले से मौजूद शुगर का असंतुलन इसका कारण बन सकता है। प्रेग्नेंसी में अगर ज्‍यादा शुगर शरीर में मौजूद है, तो भ्रूण को ज्‍यादा ग्‍लूकोज म‍िलता है ज‍िससे श‍िशु का वजन बढ़ सकता है। ऐसी महिलाओं में भविष्य की प्रेग्नेंसी में इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा अधिक हो सकता है।

5. PMOS से पीड़ि‍त मह‍िलाएं

PMOS (पूर्व नाम पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) की स्‍थ‍ित‍ि में भी ब्लड शुगर बढ़ने का खतरा रहता है। PMOS से जुड़ा हार्मोन असंतुलन शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकता है। PMOS से पीड़ि‍त कई महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या होती है, जो जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का जोखिम बढ़ाती है।

प्रेग्नेंसी के 24वें या 28वें हफ्ते के बीच जांच कराएं

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताब‍िक, जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज आमतौर पर प्रेग्नेंसी के 24वें हफ्ते के आसपास होती है। इससे बचने के ल‍िए प्रेग्नेंसी के 24वें या 28वें हफ्ते के बीच जांच करानी चाह‍िए। अगर आप जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज के खतरे में हैं, तो पहले भी जांच करा सकती हैं। इसे नजरअंदाज करने से भव‍िष्‍य में टाइप 1 और टाइप 2 डायब‍िटीज का र‍िस्‍क बढ़ सकता है। साथ ही हर प्रीनेटल टेस्‍ट में शुगर की जांच भी शाम‍िल होनी चाह‍िए।

जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज से कैसे बचें?

  • प्रेग्नेंसी से पहले हेल्दी वजन बनाए रखें। ब्रि‍स्‍क वॉक, स्‍ट्रेच‍िंग और हल्‍की एक्‍सरसाइज की मदद लें।
  • डाइट में फाइबर को शाम‍िल करें। फाइबर र‍िच फूड्स जैसे ताजे फल और सब्‍ज‍ियों का सेवन करें। इससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है और ओवरईट‍िंग से बचाव होता है।
  • प्रेग्नेंसी के दौरान सही समय पर एंटीनेटल चेकअप भी जरूरी है और समय-समय पर डायब‍िटीज की स्‍क्रीन‍िंग भी कराएं, खासकर अगर पर‍िवार में मां या अन्‍य करीबी र‍िश्‍तेदार को डायब‍िटीज हो।
  • साबुत अनाज, लीन प्रोटीन से भरपूर आहार लें।
  • मीठी चीजें और र‍िफाइंड कार्ब्स से दूरी बनाएं। इन चीजों से शुगर लेवल बढ़ सकता है।

डॉक्‍टर से संपर्क कब करें?

  • अगर शुगर लेवल में लगातार बदलाव आ रहा हो।
  • आंखों के सामने धुंधला दिखाई दे या चक्कर आ जाए।
  • बहुत ज्यादा प्यास लगना।
  • बार-बार पेशाब आना।
  • जब बहुत अध‍िक थकान महसूस हो।

न‍िष्‍कर्ष:

मोटापे से पीड़ि‍त मह‍िलाएं, ज‍िन मह‍िलाओं के पर‍िवार में डायब‍िटीज का इत‍िहास हो, प‍िछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज हो, अध‍िक वजन वाले बच्‍चे को जन्‍म द‍िया हो या PMOS से पीड़ि‍त मह‍िलाओं में जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज का खतरा ज्‍यादा हो सकता है। शुगर लेवल में लगातार बदलाव आए या बार-बार पेशाब, थकान, चक्‍कर, धुंधलापन जैसे लक्षण नजर आएं, तो तुरंत डॉक्‍टर से संपर्क करें।

FAQ

  • जेस्‍टेशनल डायब‍िटीज क्‍यों खतरनाक है?

    प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज से हाई बीपी और प्रीक्लेम्पसिया का खतरा और सी-सेक्शन की संभावना बढ़ सकती है, आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज हो सकती है। समय से पहले ड‍िलीवरी का खतरा भी हो सकता है।
  • जेस्टेशनल डायबिटीज की जांच कैसे होती है?

    जेस्टेशनल डायबिटीज की जांच के ल‍िए ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट क‍िया जाता है। जरूरत होने पर फास्टिंग ब्लड शुगर, रैंडम ब्लड शुगर या HbA1 की र‍िपोर्ट देखकर भी जेस्‍टेशनल डायब‍ि‍टीज की पुष्‍ट‍ि होती है।

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Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

Yashaswi Mathur

Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Aug 04, 2026 20:14 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
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