Tue Sep 29, 2026 | 06:52 PM IST

Medically Reviewed by Dr Rajeev Chowdry , General Physician & Internal Medicine Specialist, Yatharth Super Speciality Hospital, Faridabad | 23 Years of Clinical Experience

डायबिटि‍क मरीजों को हड्डियों से जुड़ी समस्याओं का खतरा क्यों होता है? डॉक्‍टर से समझें कारण

हड्ड‍ियों की समस्‍या हमेशा कैल्‍श‍ियम की कमी से नहीं होती, बल्‍क‍ि इसके पीछे डायब‍िटीज हो सकती है। ज‍िन लोगों का शुगर लेवल ज्‍यादा होता है उनमें अक्‍सर हड्ड‍ियों की बीमारी का खतरा ज्‍यादा होता है। डॉक्‍टर से समझें कारण।
डायबिटि‍क मरीजों को हड्डियों से जुड़ी समस्याओं का खतरा क्यों होता है? डॉक्‍टर से समझें कारणडायबिटि‍क मरीजों को हड्डियों से जुड़ी समस्याओं का खतरा क्यों होता है? डॉक्‍टर से समझें कारण

डायब‍िटीज शरीर को कई तरह से नुकसान पहुंचाती है ज‍िनमें से एक नुकसान है हड्ड‍ियों की बीमारी होना या हड्ड‍ियों का समय से पहले कमजोर होना। कई बार आपने नोट‍िस क‍िया होगा क‍ि कुछ लोग 30 या 40 की उम्र में आते-आते हड्ड‍ियों के दर्द या गंभीर बीमारी का श‍िकार हो जाते हैं। दरअसल इसके पीछे डायब‍िटीज हो सकती है। डायब‍िटीज हड्ड‍ियों की मजबूती को प्रभाव‍ित करती है। Metabolism Open नामक जर्नल में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी कहती है क‍ि ज‍िन लोगों को टाइप 2 डायब‍िटीज होता है उनमें बोन म‍िनरल डेंस‍िटी सामान्‍य होने के बाद भी हड्ड‍ियां कमजोर हो सकती हैं। आगे जानेंगे क‍ि डायब‍िटीज हड्ड‍ियों की सेहत को क्‍यों और कैसे खराब कर सकती है? बेहतर जानकारी के ल‍िए हमने Dr. Rajeev Chowdry, Internal Medicine Specialist At Yatharth Super Speciality Hospital, Faridabad से बात की।

डायब‍िटि‍क मरीजों में हड्ड‍ियों की समस्‍या क्‍यों होती है?

Dr. Rajeev Chowdry ने बताया क‍ि जब शुगर लेवल लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो शरीर के ट‍िशूज में कई तरह के बदलाव होते हैं ज‍िसका असर हड्ड‍ियों की संरचना पर पड़ सकता है। साथ ही लंबे समय तक हाई ब्‍लड शुगर लेवल से हड्ड‍ियों में मौजूद कोलेजन भी प्रभाव‍ित हो सकता है ज‍िससे हड्डि‍यां कमजोर हो सकती हैं। इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध भी हड्डि‍यों पर बुरा असर डालती है। साल 2024 में Metabolism Open में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के अनुसार, अगर ब्‍लड शुगर लेवल लंबे समय तक बढ़ा हुआ है, तो इंसुल‍िन रेजि‍स्‍टेंस और सूजन से हड्ड‍ियां प्रभाव‍ित हो सकती हैं। इससे हड्ड‍ियों की संरचना और गुणवत्ता पर बुरा असर होता है और फ्रैक्‍चर का खतरा बढ़ सकता है।

क्रॉन‍िक डायब‍िटीज से हड्ड‍ियां हो सकती हैं कमजोर

साल 2025 में Diabetology में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के मुताब‍िक, क्रॉन‍िक डायब‍िटीज यानी ज‍िन लोगों को लंबे समय से डायबि‍टीज है और शुगर लेवल कंट्रोल में नहीं है, उनमें हड्ड‍ियों की समस्‍याएं होने का खतरा ज्‍यादा होता है। क्रॉन‍िक डायब‍िटीज के कारण हड्ड‍ियां कमजोर हो जाती हैं।

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डायब‍िटीज में हड्डियों से जुड़ी कॉमन समस्याएं

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डायब‍िटीज शरीर के ज्‍यादातर अंगों को प्रभाव‍ित करता है ज‍िनमें हड्ड‍ियां, नस, मांसपेश‍ियां और जोड़ भी शाम‍िल हैं। डायब‍िटीज में शुगर लेवल का असंतुलि‍न इन समस्‍याओं को जन्‍म दे सकता है-

1. फ्रोजन शोल्‍डर

डायब‍िटि‍क मरीजों में होने वाली कॉमन समस्‍या में से एक है फ्रोजन शोल्‍डर। इसमें कंधे के कैप्‍सूल में शुगर मॉलि‍क्‍यूल्‍स जमा हो जाते हैं। इससे शोल्‍डर की मोबि‍ल‍िटी कम हो जाती है ज‍िसके कारण हाथ उठाने में तकलीफ होती है। इससे बचने के ल‍िए शुगर को कंट्रोल करना जरूरी है। मोबि‍लि‍टी बढ़ाने के ल‍िए स्‍ट्रेंथ ट्रेन‍िंग एक्‍सरसाइज करने की सलाह दी जाती है।

2. पेरिफेरल न्यूरोपैथी

Dr. Rajeev Chowdry ने बताया क‍ि शुगर लेवल जब कंट्रोल में नहीं होता है, तो नसों पर इसका बुरा असर पड़ता है ज‍िसके कारण झुनझुनी महसूस होती है। पेरिफेरल न्यूरोपैथी से बचाव के ल‍िए स‍िंकाई या दवाओं का सहारा लेने के बजाय जांच कराएं और शुगर की दवाएं लें।

3. हाथ और पैरों में सूजन

हाई शुगर लेवल के कारण हाथ और पैरों की उंगल‍ियों में सूजन हो जाती है ज‍िसके कारण हाथ या पैर की उंगल‍ियां स्‍ट‍िफ हो जाती हैं और द‍िनचर्या प्रभाव‍ित होती है।

4. चारकोट न्यूरोपैथी

पैरों के ज्‍वॉइंट में होने वाली कॉमन समस्‍या है चारकोट न्यूरोपैथी (Charcot Neuroarthropathy)। यह डायब‍िट‍िक मरीजों में अध‍िक देखी जाती है। जब शुगर लेवल बढ़ता है, तो ज्‍वॉइंट्स पर इसका बुरा प्रभाव देखने को म‍िलता है।

5. ऑस्टियोपोरोसिस

डायब‍िट‍िक मरीजों में अक्‍सर हड्ड‍ियों के जल्‍दी-जल्‍दी घ‍िसने की समस्‍या देखी जाती है। इसके कारण हड्डि‍यों या मांसपेश‍ियों में दर्द होता है।

ब्‍लड शुगर लेवल को कंट्रोल करना जरूरी है

  • डायब‍िटीज में हड्ड‍ियों की समस्‍याओं से बचने के ल‍िए ब्‍लड शुगर लेवल को कंट्रोल करना जरूरी है। शुगर लेवल को कंट्रोल करने के ल‍िए न‍ियम‍ित जांच कराएं और शुगर लेवल मॉन‍िटर करें।
  • डायब‍िटीज है, तो दवाओं का सेवन समय पर करें।
  • भोजन में पर्याप्‍त मात्रा में कैल्श‍ियम को शाम‍िल करें।
  • न‍ियम‍ित एक्‍सरसाइज जरूरी है। वॉक‍िंग या स्‍ट्रेंथ ट्रेन‍िंग एक्‍सरसाइज करें। इससे मांसपेश‍ियां और हड्ड‍ियां मजबूत होंगी।
  • धूम्रपान और अल्‍कोहल के सेवन से बचें। इससे ब्‍लड शुगर लेवल को कंट्रोल करना मुश्‍क‍िल हो सकता है।
  • पैरों की सेंस‍िटि‍व‍िटी कम होने पर ध्‍यान दें और तुरंत चेकअप करांए।

डॉक्‍टर से संपर्क कब करें?

  • अगर बार-बार हड्ड‍ियों या जोड़ों में दर्द हो।
  • पैरों में सुन्नपन या झनझनाहट महसूस हो।
  • बार-बार फ्रैक्चर होना।
  • चलने या हाथ-पैरों से काम करने में तकलीफ होना।

न‍िष्‍कर्ष:

फ्रोजन शोल्‍डर, पेरिफेरल न्यूरोपैथी, हाथ और पैरों में सूजन, चारकोट न्यूरोपैथी और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी कंडीशन डायब‍िटीज में मरीजों में ज्‍यादा कॉमन होती हैं। डायब‍िटीज में हाई शुगर लेवल, कोलेजन पर असर, इंसुल‍िन की कमी या प्रतिरोध से हड्डि‍यों पर बुरा असर पड़ता है। हड्ड‍ियों में दर्द, सूजन, सुन्नपन या झनझनाहट महसूस होने पर तुरंत डॉक्‍टर से संपर्क करें। बचाव के ल‍िए समय-समय पर शुगर जांच कराएं और ब्‍लड शुगर लेवल को मॉन‍िटर करें। पर्याप्‍त मात्रा में कैल्‍श‍ियम लें और एक्‍सरसाज को प्राथम‍िकता दें। डायब‍िटीज में धूम्रपान और अल्‍कोहल से पूरी तरह परहेज करें।

FAQ

  • क्या डायबिटि‍क मरीजों के ल‍िए बोन डेंसिटी टेस्ट जरूरी है?

    हर डायब‍िट‍िक मरीज के ल‍िए बोन डेंस‍िटी टेस्‍ट जरूरी नहीं है। उम्र, जेंडर, फ्रैक्‍चर का इति‍हास और अन्‍य जोख‍िम कारकों के आधार पर डॉक्‍टर बोन डेंस‍िटी टेस्‍ट कराने की सलाह दे सकते हैं। 
  • टाइप 1 डायबि‍टीज हड्डि‍यों को कैसे प्रभाव‍ित करती है?

    टाइप 1 डायबिटीज में हड्डियों में मिनरल की मात्रा कम होने की संभावना रहती है, जिससे हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। इससे फ्रैक्‍चर का खतरा भी बढ़ सकता है।

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Disclaimer

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Yashaswi Mathur

Health Journalist

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े।

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    Aug 10, 2026 19:38 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Dr Rajeev Chowdry