आपकी ब्यूटी के साथ-साथ पर्यावरण भी रहेगा स्वस्थ, अपनाएं सस्टेंबल ब्यूटी के ये 3 टिप्स

दुनिया के महासागरों को प्रदूषित करने वाले 150 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक कचरा है, जिनमें ब्यूटी प्रोडक्ट्स के वेस्ट भी शामिल हैं।

Pallavi Kumari
Written by: Pallavi KumariPublished at: Jan 07, 2020Updated at: Jan 08, 2020
आपकी ब्यूटी के साथ-साथ पर्यावरण भी रहेगा स्वस्थ, अपनाएं सस्टेंबल ब्यूटी के ये 3 टिप्स

ब्यूटी प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल करते वक्त इस बात का भी ख्याल रखना भी जरूरी है कि इसके नुकसान कितने और कैसे हैं। जैसे तमाम शैंपू, लिपस्टिक, फेसपाउडर और तमाम तरह के ब्यूटी प्रोडक्ट्स में ऐसे तत्व होते हैं, जो वातावरण के लिए बहुत नुकसानदायक हैं। आप के सोच से परे जाकर ये हमें और हमारे वातावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके केमिकल्स जब आप पानी में फ्लश करते हैं या कूड़े में फेंक देते हैं तो पानी और मिट्टी में मिल कर ऑक्सीजन को खत्म करते हैं और हानिकारक केमिकल चेन नेटवर्क बनाते हैं। इस तरह ये हवाओं में घुलकर आपको कई और तरह से परेशान करते हैं। इसी कारण उपभोक्ताओं को  एकल-उपयोग वाले उत्पादों, प्लास्टिक के तिनके, पानी की बोतलें और डिस्पोजेबल कॉफी कप जैसी वस्तुओं के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसी के साथ उन्हें ब्यूटी प्रोडक्ट्स से जुड़ी चीजों के बारे में भी पता होना चाहिए।

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पर्यावरण पर मेकअप प्रोडक्ट्स के प्रभाव

आपके बाथरूम कैबिनेट या मेक-अप बैग में एक बार नजर डालिए आपको समझ आ जाएगा कि आप पर्यावरण को कितना नुकसान कर रही हैं। वन-टाइम यूजेबल प्लास्टिक में पैक किए गए ये ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं। यह अनुमान लगाया जाता है कि दुनिया के महासागरों को प्रदूषित करने वाले 150 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक कचरा है और प्रत्येक वर्ष अतिरिक्त 13 मिलियन टन डंप किया जाता है। हमारे समुद्र में मछली की तुलना में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2050 तक पृथ्वी के वजन से अधिक यहां प्लास्टिक हो सकता है। वहीं कुछ सरकार इसे सुधारने के लिए कदम उठा रही है, जैसे कुछ देशों में माइक्रोबिड्स पर प्रतिबंध - बॉडी स्क्रब, टूथपेस्ट और फेशियल एक्सफोलिएटर में इस्तेमाल न करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। वहीं आप भी इसके लिए कुछ छोटी-छोटी कोशिशें कर सकती हैं। आइए हम आपको तीन आसान तरीका बताते हैं।

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सूखे कॉटन की जगह बायोडिग्रेडेबल फेस वाइप्स

इस वर्ष की शुरुआत में, वॉटर यूके की एक रिपोर्ट की मानें तो शहर के पानी में गीले पोंछे (बेबी वाइप्स सहित) 93 प्रतिशत अवरोधों और गंदगी के कारणों में से एक थे। जिनमें से 9.3 मिलियन हर एक दिन शौचालय में बहा दिए जाते हैं। मेकअप हटाना यकीनन सबसे अधिक समय लेने वाला काम है और इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले कॉटन पर्यावरण के लिए नुकसानदायक होते हैं। जो मेकअप को हटाने के लिए आपबायोडिग्रेडेबल फेस वाइप्स का इस्तेमाल करें क्योंकि ये मिट्टी में जाकर मिल जाएंगे। वहीं ये चेहरे की सफाई के लिए भी बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इसलिए कपड़ा, रेयॉन और कॉटन से मेकअप साफ करने की जगह इन बायोडिग्रेडेबल फेस वाइप्स का इस्तेमाल करें।

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एरोसोल वाले डियो का इस्तेमाल न करें

एरोसोल वाले डिओडोरेंट्स का इस्तेमाल दुर्गन्ध को दूर रखते हैं पर पर्यावरण के लिए भी फायदेंमंद नहीं हैं। आपके फेवरेट डिओडोरेंट्स में शामिल उत्पादों की पैकेजिंग बहुत हानिकारक होती हैं। आमतौर पर, रोल-ऑन डिओडोरेंट्स को प्लास्टिक की दो परतों में पैक किया जाता है, जिसका अर्थ है कि उन्हें रीसायकल करना बेहद मुश्किल है। जबकि अच्छी खबर यह है कि अब नए डियो पुनर्नवीनीकरण हैं, जबकि एरोसोल डियो में उपयोग की जाने वाली गैसें CO2 उत्सर्जन पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं। सौंदर्य निर्माता यूनिलीवर के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 1 मिलियन लोगों ने एक नए डियो पर सिफ्ट कर लिया क्योंकि एरोसोल डियो में 696 टन सोओ2, और 20,000 बाइक बनाने के लिए पर्याप्त एल्यूमीनियम जितना एल्यूमीनियम इस्तेमाल हुआ था। वहीं प्राकृतिक डियोडरेंट, जो बहुत कम या बिना पैकेजिंग के साथ आते हैं, एक बढ़िया विकल्प है क्योंकि वे तन के लिए सही है और हमारे आसपास की दुनिया पर कम से कम प्रभाव डालते हैं।

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रिफिल, रीसायकल और खुले उत्पादों का इस्तेमाल 

गार्नियर और टेरासाइकल द्वारा किए गए शोध के अनुसार, केवल 90 प्रतिशत बाथरूम ब्यूटी प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग बायो नॉनडिग्रेडेबल हैं। यह देखते हुए कि वैश्विक सौंदर्य प्रसाधन उद्योग हर साल 120 बिलियन यूनिट की पैकेजिंग का उत्पादन करता है, जो कि बहुत खतरनाक है। सौभाग्य से, सौंदर्य की दुनिया में कुछ प्रगति हो रही है। उदाहरण के लिए, पैकेजिंग-मुक्त उत्पादों का बड़े पैमाने पर विस्तार किया है, जो अब शावर जैल, मॉइस्चराइजिंग बार और मोम से ढकी लिपस्टिक सहित 50 प्रतिशत कोर रेंज का पुन: प्रयोज्य मामलों में उस स्लॉट को पूरा करता है। 2015 और 2016 के बीच, खुला शैम्पू आने लगा है। कभ देशों में अब मिल रहा है और। वहीं बाकी प्रोडक्ट्स में 15 मिलियन से अधिक प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल हो रहा है, जिसमें एक बार 80 वाशेज तक रहता है, जिसका अर्थ है कि शैम्पू की तीन बोतलें भी पर्यावरण का नुकसान कर रही हैं।

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