प्रेग्नेंसी, होने वाली मां और पिता के लिए एक बेहद अद्भुत पल होता है। नए मेहमान के आने की खुशी में कई बार होने वाली माता-पिता यह भूल जाते हैं कि उन्हें खुद का भी ख्याल रखना है। डिलीवरी के बाद कई बार मां या पिता डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं, इसे मेडिकल भाषा में पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression) कहते हैं। पोस्टपार्टम डिप्रेशन का अगर समय पर इलाज न किया जाए, तो यह लंबे समय में बीमारी का कारण बन सकता है, लाइफ को डिस्टर्ब कर सकता है और रिश्तों पर भी इसका असर आ सकता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण कई बार महसूस नहीं होते, लेकिन इसका असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है। इस लेख में हम ऐसी दो मांओं की आपबीती सुनेंगे जिन्होंने पोस्टपार्टम डिप्रेशन के खिलाफ जंग जीती।
केस 1:
29 वर्षीय गृहिणी अर्चना साहू रांची की रहने वाली हैं। अर्चना ने 21 अगस्त 2025 को अपने बेटे को जन्म दिया। जन्म के समय तो सब कुछ ठीक था, लेकिन जैसे-जैसे दिन हफ्ते में बदले, अर्चना को तनाव महसूस होने लगा। उन्हें दिनभर शिशु को स्तनपान करवाना अच्छा नहीं लगता था जिसके कारण उनकी मिल्क सप्लाई भी कम हो गई थी। अर्चना को बार-बार रोना आता और वह शिशु की देखभाल के कारण अनिद्रा का सामना भी कर रही थीं। थोड़े दिन हालात ऐसे हो गए कि अर्चना ने शिशु को पूरी तरह से ब्रेस्टफीड करवाना बंद कर दिया। अर्चना की मां ने उन्हें समझाया और सपोर्ट किया और ब्रेस्टफीडिंग के लिए एक्सपर्ट से मदद मांगने की सलाह दी। ब्रेस्टफीडिंग की प्रक्रिया ठीक होते ही अर्चना ने पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बाहर आने के लिए खुद को समझाया और पहले जो काम वो बोझ समझकर पूरा कर रही थीं उसे खुशी के साथ करने लगीं। अर्चना ने खुद को समय दिया, सुबह वॉक की और हेल्दी डाइट ली और इन छोटी-छोटी कोशिशों ने अर्चना को डिप्रेशन से बाहर आने में मदद की।
केस 2:

31 वर्षीय पुणे निवासी प्रतीक्षा जोशी ने 14 अक्टूबर 2025 को सी-सेक्शन के जरिए स्वस्थ शिशु को जन्म दिया। डिलीवरी के बाद जब प्रतीक्षा घर आईं, तब तक सब कुछ ठीक था, जैसे ही शिशु की जिम्मेदारी बढ़ी, प्रतीक्षा को डिप्रेशन के लक्षण महसूस होने लगे। अचानक से प्रतीक्षा की डाइट कम हो गई जिसका असर स्तनपान पर भी आया। प्रतीक्षा को हर समय चिड़चिड़ापन महसूस होता था और उन्हें यह लगता था कि शिशु की परवरिश के लिए वह एक सफल मां नहीं बन पाईं। प्रतीक्षा ने डॉक्टर से सलाह मांगी, तो डॉक्टर ने उन्हें हेल्दी डाइट लेने की सलाह दी और प्रतीक्षा ने सुबह उठकर योग करना शुरू किया। कुछ ही समय में अंतर नजर आया और प्रतीक्षा को बेहतर महसूस हुआ।
सपोर्ट, भरोसा और आराम हैं तीन जरूरी चीजें
Dr. Tanima Singhal, Lactation Expert, Ma-Si Care Clinic, Lucknow ने बताया कि कई मांओं को पोस्टपार्टम डिप्रेशन होता है, लेकिन वह किसी से कहती नहीं हैं। वह अकेला महसूस करती हैं।ब्रेस्टफीउिंग की दिक्कतें अक्सर पोस्टपार्टम डिप्रेशन में तकलीफ को दोगुना कर देती हैं। इसका बुरा असर मां की मेंटल हेल्थ पर होता है। नई मां को सपोर्ट, भरोसा और आराम करने से काफी फर्क पड़ता है।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बाहर आने के लिए ये कदम उठाएं
- अगर पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बाहर आना है, तो सबसे पहले आपको यह स्वीकार करना होगा कि आप इस समस्या से जूझ रहे हैं और आपको मदद की जरूरत है।
- डॉक्टर से मिलें और उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बताएं। सीबीटी थेरेपी या एंटीडिप्रेसेंट दवाओं की मदद से डिप्रेशन का इलाज किया जा सकता है।
- नींद की कमी से पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बाहर आना मुश्किल होगा इसलिए सबसे पहले नींद को प्राथमिकता दें और रोज कम से कम सात से आठ घंटे सोएं।
- खुद के लिए कुछ वक्त निकालना जरूरी है। अपने लिए समय निकालें और इस दौरान एक्सरसाइज या योग करें, वॉक पर जाएं और अपनी हॉबी को वक्त दें।
- डिलीवरी के बाद शरीर को पोषण की जरूरत होती है इसलिए डाइट में प्रोटीन, आयरन, ओमेगा 3 वगैरह को शामिल करें।
निष्कर्ष:
पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक मेडिकल कंडीशन है जिसमें डिलीवरी के बाद मां या पिता डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। इससे बाहर आने के लिए आराम, सपोर्ट और हेल्दी लाइफस्टाइल जीना जरूरी है।
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Photo Credit: Pratiksha Joshi
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Feb 22, 2026 17:33 IST
Modified By : Yashaswi Mathur Feb 22, 2026 17:33 IST
Modified By : Yashaswi MathurFeb 22, 2026 17:33 IST
Published By : Yashaswi Mathur
Reviewed By : Dr Tanima Singhal