Mon Sep 28, 2026 | 08:39 PM IST

Medically Reviewed by Dr Sharad Sheth , Consultant & Head – Nephrology

किडनी फेल होने से हड्डियां क्यों कमजोर होने लगती हैं? डॉक्टर से जानें कनेक्शन

अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण कई लोगों को किडनी फेल होने जैसी परेशानियां हो सकती हैं और किडनी फेल होने के कारण हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और इनका स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है।
किडनी फेल होने से हड्डियां क्यों कमजोर होने लगती हैं? डॉक्टर से जानें कनेक्शनकिडनी फेल होने से हड्डियां क्यों कमजोर होने लगती हैं? डॉक्टर से जानें कनेक्शन

अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण कई लोगों को किडनी से जुड़ी कई समस्याएं होती हैं, जिसके कारण उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित होने लगता है, ऐसे में किडनी की परेशानी के कारण कैसे हड्डियों की हेल्थ पर असर पड़ता है? आइए, इस बारे में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट और हेड डॉ. शरद सेठ (Dr. Sharad Sheth, Consultant and Head, Nephrology at Kokilaben Dhirubhai Ambani Hospital, Mumbai) से जानें।

किडनी की समस्या से हड्डियां होती हैं कमजोर

डॉ. शरद सेठ के अनुसार, ज्यादातर लोग जानते हैं कि किडनी हमारे शरीर से वेस्ट (गंदगी) को फिल्टर करती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हड्डियों को स्वस्थ रखने में किडनी भी अहम भूमिका होती है। जब किडनी फेल होने लगती है, तो हड्डियां भी कमजोर होने लगती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए जिन मिनरल्स और हार्मोन की जरूरत होती है किडनी उनका बैलेंस नहीं बना पाती है।

  • समय के साथ यह समस्या 'क्रोनिक किडनी डिजीज-मिनरल एंड बोन डिसऑर्डर' (CKD-MBD) जैसी स्थिति को बढ़ावा देती है। इससे पीड़ित व्यक्ति को हड्डियों के कमजोर होने, फ्रैक्चर और हड्डियों में लगातार दर्द होने का खतरा बढ़ बढ़ता है।
  • डॉ. शरद का कहना है, किडनी का एक काम विटामिन डी को ऐसे रूप में बदलना है, जिसे शरीर इस्तेमाल कर सके, जिसे कैल्सीट्रियोल (calcitriol) कहते हैं।
  • यही एक्टिव रूप हमारी आंतों को खाने से कैल्शियम सोखने का संकेत देता है। जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो कैल्सीट्रियोल का प्रोडक्शन कम हो जाता है, साथ ही कैल्शियम का एब्जॉर्प्शन भी कम हो जाता है और खून में कैल्शियम का स्तर कम होने लगता है।

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National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases के अनुसार, क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) में मिनरल और बोन डिसऑर्डर एक ऐसी बीमारी है, जो इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की हड्डियों, दिल और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकती है। यह मिनरल और बोन की समस्या तब होती है, जब CKD की वजह से खराब हुई किडनी खून को ठीक से साफ नहीं कर पाती और न ही शरीर के हॉर्मोन्स को ठीक से नियंत्रित कर पाती है। इसके बाद, शरीर में हॉर्मोन्स का बैलेंस और कैल्शियम व फॉस्फोरस जैसे मिनरल्स का स्तर बिगड़ जाता है, जिससे शरीर को नुकसान पहुंचता है।

कैल्शियम की कमी से शुरू होती है परेशानी

डॉ. शरद आगे बताते हैं, खराब किडनी को खून से फास्फोरस को बाहर निकालने में भी मेहनत करनी पड़ती है, खून में जैसे-जैसे फास्फोरस जमा होता है, यह कैल्शियम से जुड़ जाता है और कैल्शियम के लेवल को और कम कर देता है। जब हमारे शरीर में कैल्शियम की कमी होने लगती है, तो गले में मौजूद पैराथायरॉइड ग्लैंड्स को इसका पता चल जाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए ये ग्लैंड पैराथायरॉइड हार्मोन रिलीज करने लगते हैं। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में सेकेंडरी हाइपरपैराथायरायडिज्म कहा जाता है।

  1. इस स्थिति में शरीर कैल्शियम की कमी को पूरा करने के लिए इसे सीधे हड्डियों से खींचता है और समय के साथ बार-बार होने वाली इस प्रक्रिया से हड्डियां धीरे-धीरे कमजोर हो जाती हैं।
  2. डॉ. शरद बताते हैं, जैसे-जैसे हड्डियां मिनरल्स खोती हैं और नॉर्मल रीमॉडलिंग (हड्डियों के बनने और टूटने की प्रक्रिया) में रुकावट आती है, वे ज्यादा कमजोर हो जाती हैं।
  3. इससे कूल्हे, रीढ़ की हड्डी और पसलियों में फ्रैक्चर की संभावना बढ़ जाती है। क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) वाले कई लोगों को हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, जोड़ों में अकड़न और चलने-फिरने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। ये ऐसी चीजें हैं, जो धीरे-धीरे डेली लाइफ पर असर डालती हैं।

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दिल का स्वास्थ्य भी होता है प्रभावित

डॉ. शरद का कहना है, यहां एक और हार्मोन भी शामिल है, जिसे FGF23 कहते हैं, जो फास्फोरस और विटामिन डी मेटाबॉलिज्म को रेगुलेट करने में मदद करता है। CKD की शुरुआती स्टेज में इसका लेवल बढ़ जाता है और यह विटामिन डी की समस्या को और भी बढ़ा देता है। हड्डियों की क्वालिटी पर असर डालने के अलावा, हार्मोन में ये बदलाव कार्डियोवैस्कुलर (दिल से जुड़े) के खतरे को भी बढ़ाते हैं, क्योंकि कैल्शियम और फास्फोरस ब्लड वेसल्स के अंदर जमा होने लगते हैं।

हड्डियों की जांच के लिए ब्लड टेस्ट है जरूरी

CKD से जुड़ी हड्डियों की बीमारी का पता लगाने के लिए कैल्शियम, फॉस्फोरस, PTH, बोन-स्पेसिफिक अल्कलाइन फॉस्फेटेज और विटामिन डी की जांच के लिए ब्लड टेस्ट किए जाते हैं। बोन डेंसिटी स्कैन और इमेजिंग से आमतौर पर कोई खास मदद नहीं मिलती है।

हेल्दी लाइफस्टाइल को फॉलो करें

इसके इलाज का मतलब है कि मिनरल के असंतुलन को सीधे ठीक करना। इलाज की शुरुआत आमतौर पर खाने में फॉस्फोरस की मात्रा कम करने से होती है, खासकर उन प्रोसेस्ड फूड्स से जिनमें फॉस्फेट एडिटिव्स ज्यादा होते हैं। फॉस्फेट बाइंडर्स (Phosphate binders) खाने से शरीर में सोखे जाने वाले फॉस्फोरस की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। एक्टिव विटामिन डी या इसके एनालॉग्स PTH लेवल को कम करते हैं और कुछ मरीजों के लिए कैल्सिमिमेटिक्स (calcimimetics) का इस्तेमाल किया जा सकता है।

जहां तक हो सके शारीरिक रूप से एक्टिव रहना, अच्छा खाना-पीना, धूम्रपान छोड़ना और CKD को अच्छी तरह कंट्रोल में रखना, ये सभी चीजें हड्डियों को सेफ रखने में मदद करती हैं।

इस समस्या का जल्द पता लगाना और उसे कंट्रोल करना ही सबसे जरूरी है। मिनरल मेटाबॉलिज्म की नियमित जांच और नेफ्रोलॉजिस्ट के बताए गए इलाज का पालन करने से फ्रैक्चर का खतरा कम हो सकता है, हड्डियों की मजबूती बनी रह सकती है और समय के साथ मरीज के  काम करने के तरीके में असल फर्क आ सकता है।

निष्कर्ष

किडनी खराब होने से शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस का बैलेंस बिगड़ जाता है, जिससे हड्डियों के कमजोर होने और फ्रैक्चर होने की समस्याएं हो सकती हैं, ये समस्या CKD-MBD की स्थिति को बढ़ावा दे सकती है। इससे बचाव के लिए नियमित ब्लड टेस्ट, कम फास्फोरस युक्त डाइट और फिजिकल एक्टिविटीज करें। इसके अलावा, नियमित रूप से नेफ्रोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें, ताकि सही इलाज किया जा सके।

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FAQ

  • हड्डी कमजोर होने के क्या लक्षण हैं?

    हड्डियों के कमजोर होने पर व्यक्ति को कमर में दर्द होने, हड्डियों का टूटना और आगे की तरफ झुकने में परेशानी हो सकती है।
  • किडनी खराब होने के संकेत क्या हैं?

    किडनी खराब होने पर व्यक्ति को पेशाब के रंग में बदलाव होने, बार-बार पेशाब आने, पेशाब में झाग आने, कमजोरी, थकान, शरीर में सूजन आने, पाचन से जुड़ी समस्याएं होने और भूख में कमी होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

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Priyanka Sharma

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प्रियंका शर्मा हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल मीडिया से की है। फिलहाल प्रियंका जागरण न्यू मीडिया (Onlymyhealth) में बतौर सब एडिटर काम कर रही हैं। प्रियंका को स्वास्थ्य, पोषण, स्किन केयर और फिटनेस जैसे विषयों पर लिखने का अच्छा अनुभव है। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म की है। Editorial Policy: प्रियंका द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Jul 29, 2026 11:27 IST

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