National Institute of General Medical Sciences के अनुसार, ग्लैंड्स हार्मोन बनाकर सीधे ब्लड में छोड़ते हैं और वहां से ब्लड के जरिए हार्मोन शरीर के विभिन्न अंगों और टिश्यू तक पहुंचते हैं। हार्मोन को केमिकल मैसेंजर भी कहा जा सकता है, क्योंकि ये शरीर के सभी बायोलॉजिकल फंक्शन को कंट्रोल करते हैं। वैज्ञानिकों ने अब तक मनुष्य शरीर में 50 से अधिक हार्मोन्स की पहचान की है। हार्मोन का लेवल दिनभर बदलता रहता है और जीवनभर यह घटता-बढ़ता रहता है। हार्मोन का हर उम्र के पड़ाव पर क्या असर होता है, कैसे ये शरीर को प्रभावित करता है? इस बारे में जानने के लिए हमने दिल्ली स्थित PSRI Hospital में Senior Consultant Endocrinology and Diabetology डॉ. हिमिका चावला से बात की। उन्होंने बताया कि दिनभर के छोटे-छोटे कामों के कारण हार्मोन में बदलाव हो सकते हैं। सोने से लेकर जागने तक का साइकिल हार्मोन्स द्वारा ही कंट्रोल होता है। डाइट से लेकर लाइफस्टाइल में बदलाव होने पर हार्मोन प्रभावित होते हैं।
हार्मोन कैसे बनते हैं?
डॉ. हिमिका कहती हैं, “जब हार्मोन ब्लड में जाते हैं, तो वे पूरे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद रिसेप्टर्स से जुड़ते हैं। इस जुड़ाव से शरीर में नए प्रोटीन बनने लगते हैं। इसे उदाहरण के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। जब ब्लड में ग्लूकोज का लेवल बढ़ जाता है, तो पैंक्रियाज इंसुलिन छोड़ता है। इंसुलिन लिवर या मांसपेशियों के टिश्यू पर मौजूद रिसेप्टर्स से जुड़ता है। इससे ‘ग्लूकोज ट्रांसपोर्टर प्रोटीन’ कोशिकाओं की सतह पर आ जाता है और ग्लूकोज टिश्यू के अंदर चला जाता है। इससे ब्लड शुगर नॉर्मल हो जाता है। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि हार्मोन शरीर में चाबी की तरह काम करता है और रिसेप्टर ताले की भूमिका निभाते हैं। हार्मोन शरीर के हिस्से में तब काम करता है, जब वे अंगों या टिश्यू की कोशिकाओं में खास तरह के रिसेप्टर्स में फिट बैठते हैं। जैसे ही हार्मोन फिट बैठते हैं, तो वे टिश्यू को वहां उस जगह खास काम को करने का मैसेज देते हैं।"
हार्मोन कितने तरीके से काम करते हैं?
डॉ. हिमिका कहती हैं कि शरीर, हार्मोन को दो तरीकों से इस्तेमाल करता है।
- ग्लैंड से ग्लैंड के बीच - एक ग्लैंड हार्मोन छोड़ती है, जो दूसरी ग्लैंड को अपने हार्मोन के लेवल को बदलने के लिए स्टिमुलेट करती है। जैसे कि पिट्यूटरी ग्लैंड थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (TSH) छोड़ती है, जो थायराइड ग्लैंड को अपने हार्मोन छोड़ने के लिए एक्टिव करती है।
- ग्लैंड से अंग के बीच - ग्लैंड सीधे शरीर के अंग को मैसेज देती है। जैसे पैंक्रियाज इंसुलिन छोड़ता है, तो यह इंसुलिन सीधे मांसपेशियों और लिवर जैसे अंगों पर काम करता है ताकि ग्लूकोज को प्रोसेस किया जा सके।

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शरीर में कौन से टिश्यू हार्मोन बनाते हैं?
Cleveland Clinic के अनुसार, एंडोक्राइन सिस्टम की खास ग्लैंड द्वारा हार्मोन बनाए और छोड़े जाते हैं। एंडोक्राइन सिस्टम में ये ग्लैंड्स होती हैं।
- हाइपोथैलेमस - दिमाग से जुड़ा यह छोटा सा हिस्सा पिट्यूटरी ग्लैंड से जुड़ा होता है। हाइपोथैलेमस में डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन, सोमैटोस्टैटिन और CRH, GnRH, GHRH, TRH जैसे कई हार्मोन्स बनते हैं और ये पिट्यूटरी ग्लैंड को कंट्रोल करते हैं।
- पिट्यूटरी ग्लैंड - यह दिमाग में मटर के दाने जितनी होती है, जिसके अगले भाग में ACTH, FSH, ग्रोथ हार्मोन (GH), LH, प्रोलैक्टिन और TSH बनते हैं और पिट्यूटरी का पिछला भाग ADH और ऑक्सीटोसिन छोड़ता है।
- पीनियल ग्लैंड - यह दिमाग में होती है, जो मेलाटोनिन हार्मोन छोड़ती है, जो सोने-जागने के साइकिल को कंट्रोल करती है।
- थायराइड ग्लैंड - गर्दन में तितली के आकार की ये ग्लैंड मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करती है और यह थायरोक्सिन (T4), ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) और कैल्सीटोनिन हार्मोन बनाती है।
- पैराथायराइड ग्लैंड - यह थायराइड के पीछे मटर के दाने जितनी ग्लैंड होती है, जो पैराथायराइड हार्मोन छोड़ती है, जो ब्लड में कैल्शियम का संतुलन रखती है।
- एड्रेनल ग्लैंड - दोनों एड्रेनल ग्रंथियां किडनी के ऊपर होती हैं, जो कोर्टिसोल, एल्डोस्टेरोन, एड्रेनालाईन (एपिनेफ्रीन) और नॉरएड्रेनालाईन हार्मोन बनाती हैं।
- पैंक्रियाज - यह पेट के पीछे होती है, जो डाइजेशन के साथ इंसुलिन और ग्लूकागन हार्मोन बनाती है।
- ओवरी और टेस्टिस - ओवरी महिलाओं में एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बनाती हैं। टेस्टिस पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बनाते हैं।
- इसके अलावा, एडिपोज टिश्यू, किडनी, लिवर, आंत और प्लेसेंटा भी हार्मोन बनाते हैं।
ग्रंथि |
प्रमुख हार्मोन |
मुख्य कार्य |
हाइपोथैलेमस |
डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन |
पिट्यूटरी ग्रंथि को कंट्रोल करना |
पिट्यूटरी |
GH, TSH, FSH, LH |
मास्टर ग्लैंड, जो अन्य ग्रंथियों को चलाती है |
पीनियल |
मेलाटोनिन |
सोने और जागने की साइकिल को नियंत्रित करना |
थायराइड |
T3, T4, कैल्सीटोनिन |
मेटाबॉलिज्म और कैल्शियम का बैलेंस |
एड्रेनल |
कोर्टिसोल, एड्रेनालाईन |
स्ट्रेस कंट्रोल और एनर्जी बढ़ाना |
पैंक्रियाज |
इंसुलिन, ग्लूकागन |
ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करना |
ओवरी/टेस्टिस |
एस्ट्रोजन / टेस्टोस्टेरोन |
प्रजनन और यौन स्वास्थ्य |
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हार्मोन की वजह से कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?
डॉ. हिमिका कहती हैं, "हार्मोन बैलेंस न होने के कारण कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। इसमें महिलाओं को पीरियड्स रेगुलर न होना, PCOS, इनफर्टिलिटी, मुंहासे आना और मोटापे की समस्या हो सकती है, वहीं पुरुषों का टेस्टोस्टेरोन का लेवल कम हो सकता है। इसके अलावा, दोनों को डायबिटीज, थायराइड और मोटापा जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। इसलिए हार्मोन्स का संतुलन होना बहुत महत्वपूर्ण है। अगर किसी को बहुत ज्यादा प्यास लगे, थकान, हाई ब्लड शुगर, वजन में बदलाव होना और एनर्जी महसूस न हो, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए।"
उम्र के हिसाब से हार्मोन में बदलाव
डॉ. हिमिका कहती हैं, “उम्र बढ़ने के साथ-साथ हार्मोन्स में भी बदलाव होता है और यह बदलाव कई फिजिकल और मेंटल बदलावों के कारण होता है। अक्सर लोग सोचते हैं कि हार्मोन्स सिर्फ फर्टिलिटी और पीरियड्स तक ही सीमित होते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हार्मोन्स शरीर की लंबाई, मांसपेशियों, हड्डियों, स्ट्रेस, नींद और सेक्शुअल हेल्थ सभी को प्रभावित करते हैं।”
जन्म के बाद
साल 2025 में Translational Pediatrics में एक स्टडी प्रकाशित की गई। इसमें चीन के वुहान चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल ने एक अध्ययन किया। इसमें जन्म से लेकर 19 साल तक के कुल 2477 सेहतमंद बच्चों को शामिल किया गया। इसमें सितंबर 2022 से लेकर अगस्त 2023 तक स्टडी की गई। इसमें कुल छह हार्मोन्स पर टेस्ट किया गया। इसमें E2 (एस्ट्राडियोल), FSH (फॉलिकल-स्टिमुलेटिंग हार्मोन), LH (ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन) PRL (प्रोलैक्टिन), PROG (प्रोजेस्टेरोन) और TESTO (टेस्टोस्टेरोन) शामिल थे। इस अध्ययन में पाया गया कि नवजात बच्चों के पहले महीने के दौरान सभी हार्मोन्स के लेवल में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिले। इससे डॉक्टर्स को बचपन के विकास संबंधी बीमारियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली। डॉ. हिमिका कहती हैं कि शुरुआत में बच्चों में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं, लेकिन बाद में थोड़ा स्टेबल हो जाते हैं। प्यूबर्टी में हार्मोन फिर तेजी से बदलते हैं।
प्यूबर्टी के दौरान
Cleveland Clinic के अनुसार, लड़कियों में प्यूबर्टी 8 से 13 साल के बीच आती है और लड़कों में 9 से 14 साल के बीच शुरू होती है। डॉ. हिमिका कहती हैं, "लड़कियों में प्यूबर्टी ओवरी में हार्मोन्स स्त्राव के कारण होती है। इसमें एस्ट्राडियोल या एस्ट्रोजन हार्मोन ब्रेस्ट के ग्रोथ, कूल्हों के चौड़ा होने और यूटरस की ग्रोथ में मदद करता है। प्रोजेस्टेरोन पीरियड्स के दौरान बनना शुरू होता है। एड्रेनल एंड्रोजन हार्मोन बगल और जननांग के बालों की ग्रोथ करने में मदद करते हैं।"
लड़कों की प्यूबर्टी के बारे में डॉ. हिमिका चावला कहती हैं, “लड़कों में प्यूबर्टी के समय टेस्टोस्टेरोन हार्मोन टेस्टिकल बनाते हैं। इस हार्मोन के जरिए लिंग और अंडकोष का आकार बढ़ने का प्रोसेस शुरू होता है। लड़कों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की वजह से वॉयस बॉक्स बढ़ता है, जिस वजह से लड़कों की आवाज भारी होने लगती है। इसके अलावा, चेहरे, छाती और जननांगों पर बालों की ग्रोथ होने लगती है। हार्मोनल परिवर्तन स्पर्मेटोजेनेसिस की प्रक्रिया को एक्टिव करते हैं। हार्मोनल बदलाव की वजह से मांसपेशियों का विकास होता है।"
20 से 30 साल
डॉ. हिमिका कहती हैं, "20 से 30 की उम्र में महिलाओं में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का लेवल सबसे ज्यादा होता है और इस दौरान फर्टिलिटी और बोन डेंसिटी काफी ज्यादा होती है। जैसे-जैसे महिलाएं 30 की उम्र के पास पहुंचने लगती हैं, तो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का बैलेंस बिगड़ सकता है। इस दौरान पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं और कुछ महिलाओं को पेरिमेनोपॉज के शुरुआती लक्षण भी नजर आने लगते हैं। प्रोजेस्टेरोन की कमी के कारण पीरियड्स से पहले के लक्षण और मूड स्विंग्स हो सकते हैं। एंड्रोजन का लेवल कम होने के कारण महिलाओं में मूड और लिबिडो में भी कमी देखी जा सकती है। एस्ट्रोजन की कमी के कारण कुछ महिलाओं का मेटाबॉलिज्म धीमा होने लगता है, जिससे महिलाओं का वजन बढ़ सकता है।"
इस दौरान कई महिलाएं बच्चे को जन्म देती हैं और जन्म के बाद उनके हार्मोन के लेवल में तेजी से गिरावट आती है, जिससे इम्यून सिस्टम फिर से अपनी पुरानी स्थिति में लौटने लगता है। Frontiers में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, डिलीवरी के बाद कोर्टिसोल और प्रोलैक्टिन का स्तर बढ़ जाता है, जबकि एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के स्तर में तेजी से गिरावट होती है। इस प्रोसेस के कारण कई बार ऑटोइम्यून कंडीशन्स को फिर से उभार सकता है या इंफेक्शन्स को एक्टिव कर सकता है। इस स्टडी में बताया गया है कि इस दौरान महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन का रिस्क भी हो सकता है।
पुरुषों के बारे में डॉ. हिमिका ने कहा, "20 से 30 के पड़ाव में पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का लेवल काफी ज्यादा होता है, जिस वजह से मांसपेशियों की डेंसिटी और एनर्जी दोनों ही बहुत ज्यादा होते हैं, लेकिन 30 की उम्र आते-आते टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का लेवल कम होने लगता है, जिस वजह से पुरुषों में पेट की चर्बी बढ़ने लगती है और एनर्जी का स्तर गिरने लगता है।"
डॉ. हिमिका ने बताया कि इस दौर में महिलाओं और पुरुषों, दोनों में ही कोर्टिसोल हार्मोन का असर ज्यादा होने की संभावना रहती है, जिस वजह से स्ट्रेस देखा जा सकता है। इसके अलावा, 30 की उम्र के आसपास थायराइड फंक्शन में भी बदलाव आ सकता है।

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30 से 40 साल
डॉ. हिमिका ने कहा, "30 से 40 साल की उम्र में हार्मोन्स में कई बदलाव होते हैं, क्योंकि इस उम्र के आसपास कुछ महिलाओं में पेरिमेनोपॉज की शुरुआत हो सकती है, वहीं पुरुषों के लिए एंड्रोपॉज का समय होता है। जिस तरह महिलाओं में मेनोपॉज होता है, उसी तरह पुरुषों में एंड्रोपॉज होता है। इस दौरान पुरुषों में टेस्टेरोन का स्तर कम होने लगता है। इस दौरान महिलाओं में प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन के लेवल में उतार-चढ़ाव बहुत ज्यादा होता है। इस दौरान महिलाओं में फर्टिलिटी कम होने लगती है। 40 की उम्र में एस्ट्रोजन का लेवल अनियमित रूप से घटता-बढ़ता है, जबकि प्रोजेस्टेरोन लगातार कम होता रहता है।"
डॉ. हिमिका ने बताया कि पुरुषों में 30 की उम्र के बाद टेस्टोस्टेरोन लगातार गिरता है और 40 के पड़ाव में बढ़े हुए कोर्टिसोल और ग्रोथ हार्मोन की कमी के कारण मांसपेशियों में कमी आने लगती है, बहुत ज्यादा थकान होने लगती है, कामेच्छा की कमी और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।
40 से 50 साल
Cleveland Clinic के अनुसार, पेरिमेनोपॉज अक्सर 40 के मध्य में (Mid 40's) शुरू होता है, लेकिन कुछ महिलाओं में जल्दी भी हो सकता है। पेरिमेनोपॉज आमतौर पर मेनोपॉज से 8 से 10 साल पहले शुरू होता है। पेरिमेनोपॉज के दौरान महिलाओं को अनियमित पीरियड्स होने लगते हैं। रेगुलर पीरियड्स होने की बजाय हल्की स्पॉटिंग या पीरियड्स पूरी तरह से मिस होने लगते हैं। इस दौरान महिलाओं को हॉट फ्लैशेस और योनि का सूखापन भी शुरू हो सकता है। जैसे-जैसे शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर कम होने लगता है, शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होने लगते हैं। इसमें मूड स्विंग्स होना, चिड़चिड़ापन, यौन इच्छा न रहना, नींद की कमी और बार-बार पेशाब आना शामिल हैं। डॉ. हिमिका कहती हैं, "40 से 50 के के बीच में महिलाओं का मेटाबॉलिज्म स्लो होने के कारण वजन बढ़ना और एस्ट्रोजन हार्मोन के कम होने से ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा भी बढ़ सकता है।
Mayo Clinic के अनुसार, 30 साल के बाद पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर आमतौर पर हर साल लगभग 1% कम हो जाता है। हालांकि, ज्यादातर उम्रदराज पुरुषों में यह स्तर सामान्य सीमा में ही रहता है, लेकिन 10% से 25% पुरुषों में ही स्तर इतना कम होता है जिसे लो कहा जा सकता है। वैसे तो लो टेस्टोस्टेरोन के लक्षण जल्दी नजर नहीं आते लेकिन अगर लेवल बहुत ज्यादा कम हो जाए, तो हड्डियों की डेंसिटी कम होने लगती है, मामूली चोट पर फ्रैक्चर होना, इनफर्टिलिटी की समस्या, इरेक्टाइल डिस्फंक्शन होना, डिप्रेशन और फोकस कम होने लगता है। टेस्टोस्टेरोन कम होने के कारण पिट्यूटरी ग्लैंड का चेकअप कराया जा सकता है ताकि हार्मोनल असंतुलन का पता लगाया जा सके।
50 से 60 साल
डॉ. हिमिका कहती हैं, "50 से 60 की उम्र में महिलाओं में मेनोपॉज आ जाता है। आमतौर पर महिलाओं में 52 से 55 साल में मेनोपॉज हो जाता है। इसमें ओवरी एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन बनाना बंद कर देती है। एस्ट्रोजन का लेवल काफी तेजी से गिर सकता है। इस दौरान FSH और LH हार्मोन्स का लेवल बहुत तेजी से बढ़ सकता है। इस दौर में हार्मोनल असंतुलन के कारण महिलाओं को हार्ट की बीमारियों का खतरा काफी ज्यादा बढ़ सकता है।"
डॉ. हिमिका कहती हैं, "60 साल तक पुरुषों का टेस्टोस्टेरोन स्तर सामान्य से नीचे जा सकता है। इस उम्र में सेक्स हार्मोन-बाइंडिंग ग्लोबुलिन (SHBG) बढ़ जाता है, जो टेस्टोस्टेरोन को कम करने लगता है। इस दौरान पुरुषों की हड्डियों की डेंसिटी भी कम होने लगती है, हालांकि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में यह प्रक्रिया थोड़ी लेट शुरू होती है।"
60+ साल
डॉ. हिमिका कहती हैं, "60 साल के बाद महिलाओं में पोस्टमेनोपॉजल स्टेज पूरी तरह से स्टेबल हो चुकी होती है, ऐसे में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन स्थायी रूप से कम बना रहता है। इसके परिणाम में महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस और स्किन का कोलेजन तेजी से कम होने लगता है। इस दौरान स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का लेवल बढ़ सकता है, जिसकी वजह से नींद पूरी नहीं होती और न ही वजन कम हो पाता है। वहीं पुरुषों में 60 साल के बाद 20% पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर सामान्य से काफी कम हो जाता है। इसकी वजह से SHBG प्रोटीन बढ़ सकता है। 60 के बाद पुरुषों में ग्रोथ हार्मोन काफी ज्यादा कम हो जाता है, जिस वजह से मांसपेशियों की ताकत कम हो सकती है और शरीर की बनावट में बदलाव आ सकता है। इस दौरान मेलाटोनिन हार्मोन कम होने से नींद न आने की परेशानी भी देखी जा सकती है। कुछ लोगों में उम्र के साथ थायराइड फंक्शन कम हो सकता है, क्योंकि मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। इस वजह से 60 की उम्र के बाद वजन बढ़ तो जाता है, लेकिन घटाना मुश्किल हो जाता है।"
हार्मोन असंतुलित होने पर इलाज
Cleveland Clinic के अनुसार, हार्मोनल असंतुलन का इलाज करते समय डॉक्टर समस्या का मूल कारण ढूंढ़ते हैं। आमतौर पर हार्मोनल असंतुलन का इलाज दो भागों में किया जा सकता है।
अगर हार्मोन का लेवल नॉर्मल से कम है
इसमें आमतौर पर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी की सलाह दी जा सकती है। HRT से फ्लूइड रिटेंशन, ब्लोटिंग, सिरदर्द, वजाइनल ब्लीडिंग और डिप्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती है। इसलिए हार्मोनल रिप्लेसमेंट थेरेपी लेने से पहले डॉक्टर से जरूर सलाह लें। जो हार्मोन कम होते हैं, उन्हें नॉर्मल करने के लिए दवाएं या इंजेक्शन दिए जा सकते हैं। जैसे हाइपोथायरायडिज्म में थायराइड हार्मोन का लेवल कम होता है, तो इसके इलाज में डॉक्टर थायराइड हार्मोन की दवाएं लिख सकते हैं।
अगर हार्मोन का लेवल नॉर्मल से ज्यादा है
हाई लेवल होने पर हार्मोन को संतुलित करने के कई तरीके हैं।
- इसमें दवाओं के जरिए हार्मोन का लेवल कम किया जा सकता है।
- अगर कोई ट्यूमर हार्मोन बढ़ा रहा है, तो सर्जरी की सलाह दी जा सकती है।
- ट्यूमर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए रेडिएशन थेरेपी दी जा सकती है।
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क्या हार्मोनल असंतुलन खुद से ठीक हो सकता है?
डॉ. हिमिका के अनुसार, डायबिटीज और थायराइड जैसी कई कंडीशन में मेडिकल इलाज की जरूरत होती है। खुद से हार्मोनल असंतुलन ठीक हो पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। आमतौर पर देखा गया है कि हार्मोनल संतुलन के लिए कई तरह के सप्लीमेंट्स हैं, लेकिन उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लेना खतरनाक हो सकता है। हार्मोनल बैलेंस के लिए लोगों को अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करने चाहिए।
- स्ट्रेस को मैनेज करने की कोशिश करें ताकि कोर्टिसोल हार्मोन का लेवल कंट्रोल में रहे।
- रोजाना वॉक और एक्सरसाइज करने से इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिज्म में सुधार होता है।
- हार्मोन संतुलन के लिए नींद पूरी करना बहुत जरूरी है।
- खानपान में बैलेंस्ड और हेल्दी डाइट लें।
- पानी प्रचुर मात्रा में पिएं।
- पैकेज्ड फूड, रिफाइंड फूड, तला-भुना और बाहर के खाने से परहेज करें।
- नमक और चीनी को कम से कम लें।
- स्मोकिंग और शराब से दूर रहें।
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर आपको अपने शरीर में कोई भी बदलाव लगातार महसूस हो, तो आपको एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लेनी चाहिए।
- बिना किसी डाइट या एक्सरसाइज में बदलाव के वजन का बहुत ज्यादा बढ़ना या घटना
- नींद पूरी होने के बावजूद हर समय थकान और एनर्जी की कमी महसूस होना
- अचानक बहुत ज्यादा मुहांसे, चेहरे पर अनचाहे बाल या बालों का तेजी से गिरना
- नींद न आना, बहुत ज्यादा एंग्जायटी या गंभीर मूड स्विंग्स होना
- बहुत ज्यादा प्यास लगना और बार-बार पेशाब आना
- बहुत ज्यादा ठंड या बहुत ज्यादा गर्मी महसूस करना
- महिलाओं में पीरियड्स का समय पर न आना या बहुत ज्यादा दर्द होना।
निष्कर्ष
जीवनभर शरीर में हार्मोनल बदलाव होते रहते हैं और यह नेचुरल प्रोसेस है, लेकिन खराब खानपान और लाइफस्टाइल के कारण हार्मोनल असंतुलन से बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि 20 से 30 साल की उम्र में बोन डेंसिटी और पीरियड्स पर जरूर ध्यान दें। इस दौरान फर्टिलिटी का चेक जरूर रखें। 30 साल के बाद रेगुलर चेकअप कराते रहना जरूरी है ताकि हार्मोनल असंतुलन के कारण होने वाली बीमारियों के बारे में पता चल सके। 60 साल की उम्र के बाद मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने के लिए हेल्दी डाइट के साथ हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूर करनी चाहिए। अगर समय पर लक्षणों की पहचान कर ली जाए, तो डॉक्टर से सलाह लेकर इलाज शुरू किया जा सकता है।
FAQ
क्या तनाव वास्तव में मेरे हार्मोन्स को बिगाड़ सकता है?
स्ट्रेस से शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का लेवल बढ़ता है। अगर स्ट्रेस लंबे समय तक रहे, तो कोर्टिसोल का बढ़ा हुआ लेवल सेक्स हार्मोन और मेटाबॉलिज्म को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।क्या प्यूबर्टी के दौरान मुंहासे होना सामान्य है?
प्यूबर्टी में एंड्रोजन हार्मोन बढ़ने से तेल ग्रंथियां एक्टिव हो जाती हैं, जिससे मुंहासे हो सकते हैं। अगर ये बहुत ज्यादा और दर्दनाक हैं, तो डॉक्टर की सलाह लें।क्या डाइट बदलने से हार्मोन ठीक हो सकते हैं?
अगर हार्मोन में बहुत कम असंतुलन है, तो हेल्दी डाइट और एक्सरसाइज से सुधारा जा सकता है, लेकिन थायराइड या डायबिटीज जैसी स्थितियों के लिए मेडिकल इलाज जरूरी होता है।पुरुषों में 'लो टेस्टोस्टेरोन' का मुख्य संकेत क्या है?
आमतौर पर लो टेस्टोस्टेरोन में मांसपेशियों की कमी, कामेच्छा में गिरावट, हर समय थकान और फोकस करने में मुश्किल हो सकती है।
इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।
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Apr 22, 2026 13:54 IST
Modified By : Aneesh Rawat Apr 22, 2026 13:54 IST
Modified By : Aneesh RawatApr 22, 2026 13:54 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Himika Chawla