National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases (NIDDK) के अनुसार, जब मरीज को पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द, भूख न लगना और गंभीर स्थिति में अचानक से वजन कम होना, पेट में सूजन या खाना न पचने जैसी दिक्कतें होती हैं, तो फैटी लिवर की समस्या हो सकती है। जब मरीज को फैटी लिवर की समस्या होती है, तो डॉक्टर फैटी लिवर का ग्रेड चेक करते हैं। फैटी लिवर को आमतौर पर तीन ग्रेड (ग्रेड 1, 2 और 3) में बांटा गया है। साल 2010 में Magnetic Resonance Imaging Clinics of North America में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, डॉक्टर फैटी लिवर का ग्रेड चेक करने के लिए लिवर पर जमा फैट को चेक करते हैं। अगर लिवर के सेल्स पर 5 से 33% फैट है, तो उसे ग्रेड 1 में रखा जाता है, ग्रेड 2 में फैट 34 से 66% तक हो सकता है, अगर फैट 67% से ज्यादा है, तो फैटी लिवर ग्रेड 3 है। फैटी लिवर की जांच में फाइब्रोस्कैन भी बहुत महत्वपूर्ण है। फाइब्रोस्कैन टेस्ट किस तरह से काम करता है और इसके क्या फायदे हैं, पूरी जानकारी के लिए हमने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट, लैप्रोस्कोपिक, लेजर और जनरल सर्जन डॉ. नीरज धमीजा और शारदाकेयर हेल्थसिटी के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के सीनियर डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. विनीत कुमार गुप्ता से बात की। उन्होंने बताया कि फाइब्रोस्कैन सिर्फ लक्षण दिखने पर ही नहीं किया जाता, बल्कि कई बार तब भी किया जाता है, जब अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर दिखाई देता है, लिवर एंजाइम बढ़े हुए मिलते हैं, मरीज को हेपेटाइटिस B, हेपेटाइटिस C, मेटाबॉलिक सिंड्रोम या लंबे समय से शराब पीने की हिस्ट्री रही है।
लिवर की बीमारी में फाइब्रोस्कैन टेस्ट क्यों कराते हैं?
डॉ. नीरज धमीजा कहते हैं, “अगर फाइब्रोस्कैन टेस्ट के बारे में आम लोगों को समझना है, तो इसे कुछ ऐसे कहा जा सकता है कि फाइब्रोस्कैन एक मशीन है और इसमें ट्रांजिएंट इलास्टोग्राफी टेक्नीक है। फाइब्रोस्कैन इसी तकनीक पर काम करती है। आजकल यह तकनीक काफी फायदेमंद साबित हो रही है क्योंकि इसे अल्ट्रासाउंड की तरह इस्तेमाल किया जाता है। जैसे अल्ट्रासाउंड में दर्द नहीं होता, ठीक वैसे ही इस टेस्ट को करने में किसी भी तरह का दर्द नहीं होता।”

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डॉक्टर को टेस्ट के लिए कब दिखाएं?
डॉ. नीरज कहते हैं, “अगर मरीज को फैटी लिवर के लक्षण लगातार महसूस हो रहे हों और डॉक्टर की सलाह पर दी गई लिवर की दवाइयां काफी समय से चल रही हों, तो फाइब्रोस्कैन टेस्ट लिवर की कठोरता (fibrosis) और लिवर में जमा फैट का आकलन करने में मदद करता है, इसलिए इसे एक नॉन-इनवेसिव टेस्ट कहा जाता है। इस टेस्ट के जरिए फैटी लिवर, फाइब्रोसिस और सिरोसिस की गंभीरता समझने में मदद मिलती है। दरअसल, अगर मरीज अपनी डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव करता है, तो लिवर की बीमारी को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।”
फाइब्रोस्कैन कराने से पहले मरीज को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
डॉ. धमीजा और NHS फाउंडेशन के अनुसार, फाइब्रोस्कैन कराने से पहले मरीज को कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए ताकि फाइब्रोस्कैन की रिपोर्ट सटीक आए।
- फाइब्रोस्कैन से पहले मरीज को कम से कम दो से तीन घंटे पहले तक कुछ भी नहीं खाना चाहिए। अगर बहुत प्यास लग रही है, तो मरीज एक घूंट पानी पी सकते हैं।
- अगर मरीज कोई भी दवाई ले रहे हैं, तो उसे नहीं छोड़नी चाहिए। फाइब्रोस्कैन कराने के दिन भी अपनी दवाई ले सकते हैं।
- फाइब्रोस्कैन भी अल्ट्रासाउंड की तरह होता है, इसलिए मरीज को सिर्फ शर्ट जैसे ऊपर के कपड़े ही उठाने पड़ते हैं। फाइब्रोस्कैन कराने से पहले मरीज शर्ट जैसा कुछ पहनकर जाए, तो आरामदायक रहेगा।
- अगर मरीज ने बेली बटन पियर्सिंग कराई है, तो उसे भी निकालने की जरूरत नहीं होती।
- स्कैन शुरू करने से पहले मरीज डॉक्टर से फाइब्रोस्कैन के बारे में बात कर सकते हैं, ताकि सभी तरह के संदेह खत्म हो सके।
फाइब्रोस्कैन टेस्ट कैसे किया जाता है?
डॉ. नीरज कहते हैं, “मरीज का जैसे अल्ट्रासाउंड होता है, उसी तरह से डॉक्टर पेट के दाहिने हिस्से में जेल लगाकर फाइब्रोस्कैन डिवाइस से चेक करते हैं। मरीज के दाहिने हाथ को सिर के पीछे रखने की सलाह दी जाती है। इस दौरान मरीज को स्किन में थोड़ा वाइब्रेशन महसूस होता है। इस टेस्ट में साउंड वेव कम से कम 10 बार रिपीट की जाती है ताकि सटीक परिणाम आ सके। स्कैनर के जरिए औसतन (average) रीडिंग ली जाती है। इस स्कैन को करने में आमतौर पर 10 से 15 मिनट ही लगते हैं।”
डॉ. नीरज आगे कहते हैं, “फाइब्रोस्कैन में लिवर की तरफ एक शियर वेव भेजी जाती है और मशीन के जरिए मापा जाता है कि यह वेव लिवर के अंदर कितनी तेजी से जा रही है। अगर लिवर सेहतमंद है, तो वेव की रफ्तार धीमी होती है और अगर लिवर कड़ा (स्टिफ) या सूजन होगी, तो वेव की रफ्तार बहुत तेज होती है। फाइब्रोस्कैन की रीडिंग जितनी ज्यादा होगी, लिवर उतना ही ज्यादा बीमार होगा। फाइब्रोस्कैन को किलोपास्कल (kPa) में मापा जाता है।
फाइब्रोस्कैन के कौन-से दो पैरामीटर्स हैं?
डॉ. विनीत कुमार गुप्ता कहते हैं, “फाइब्रोस्कैन टेस्ट में दो पैरामीटर्स के आधार पर लिवर की जानकारी मिल सकती है। इसमें लिवर स्टिफनेस मेजरमेंट (LSM) के जरिए लिवर की कठोरता या फाइब्रोसिस की मात्रा मापी जाती है। इसके साथ कैप स्कोर (Controlled Attenuation Parameter) के जरिए लिवर में जमा फैट की मात्रा का पता चलता है। फाइब्रोस्कैन करते समय इन दोनों पैरामीटर्स के जरिए लिवर की पूरी जानकारी मिल जाती है। इससे फैटी लिवर, फाइब्रोसिस या लिवर डैमेज की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।”
फाइब्रोस्कैन की रिपोर्ट कैसे पढ़ी जा सकती है?
डॉ. नीरज कहते हैं, “फाइब्रोस्कैन की रिपोर्ट पढ़ने के लिए कैप स्कोर को जानना जरूरी है। कैप स्कोर के जरिए ही हम स्टेटोसिस ग्रेड को मापते हैं। कैप स्कोर को मापने के लिए decibels per meter (dB/m) का इस्तेमाल किया जाता है।”
Ministry of Health and Family Welfare (MoHFW) के अनुसार कैप स्कोर देखने का तरीका
| CAP स्कोर | स्टेटोसिस ग्रेड | फैटी लिवर |
| 238 से लेकर 260 dB/m | S1 | 11 से 33% |
| 260 से 290 dB/m | S2 | 34% से 66% |
| 290 से 400 dB/m | S3 | 67% से ज्यादा |
डॉ. नीरज ने कहा, “kPa को आमतौर पर कुछ ऐसे पढ़ा जा सकता है कि लगभग 2 से 7 kPa सामान्य या न्यूनतम फाइब्रोसिस, 7–10 kPa मध्यम फाइब्रोसिस, 10–14 kPa उन्नत फाइब्रोसिस और 14 kPa से अधिक होने पर सिरोसिस की संभावना हो सकती है।”

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हालांकि, Memorial Sloan Kettering Cancer Center ने फाइब्रोस्कैन का परिणाम मापने का तरीका यह बताया है।
| डिसीज डायग्नोसिस | लिवर स्टिफनेस परिणाम | फाइब्रोसिस स्कोर | लिवर की सेहत |
| अल्कोहल संबंधी बीमारी | 2 से 7 kPa | F0 से F1 | नॉर्मल |
| 7 से 11 kPa | F2 | मॉडरेट | |
| 11 से 19 kPa | F3 | गंभीर | |
| 19 kPa या इससे अधिक | F4 | सिरोसिस | |
| कोलेस्टेटिक लिवर बीमारी | 2 से 7 kPa | F0 to F1 | नॉर्मल |
| 7 से 9 kPa | F2 | मॉडरेट | |
| 9 से 17 kPa | F3 | गंभीर | |
| 17 kPa या ज्यादा | F4 | सिरोसिस | |
| हेपेटाइटिस B | 2 से 7 kPa | F0 से F1 | नॉर्मल |
| 8 से 9 kPa | F2 | मॉडरेट | |
| 8 से 11 kPa | F3 | गंभीर | |
| 12 kPa या ज्यादा | F4 | सिरोसिस | |
| हेपेटाइटिस C | 2 से 7 kPa | F0 से F1 | नॉर्मल |
| 8 से 9 kPa | F2 | मॉडरेट | |
| 9 से 14 kPa | F3 | गंभीर | |
| 14 kPa या ज्यादा | F4 | सिरोसिस | |
| MASLD (NAFLD) फैटी लिवर | 2 से 7 kPa | F0 से F1 | नॉर्मल |
| 7.5 to 10 kPa | F2 | मॉडरेट | |
| 10 to 14 kPa | F3 | गंभीर | |
| 14 kPa या ज्यादा | F4 | सिरोसिस |
फाइब्रोस्कैन टेस्ट और लिवर बायोप्सी में कौन-सा बेहतर है?
डॉ. विनीत कुमार कहते हैं, “वैसे तो फाइब्रोस्कैन और लिवर बायोप्सी दोनों ही टेस्ट लिवर की बीमारियों का पता लगाने के लिए किए जाते हैं। फाइब्रोस्कैन बहुत ही सिंपल और बिना दर्द वाला टेस्ट है, जिसमें अल्ट्रासाउंड की तरह लिवर का स्कैन किया जाता है, लेकिन बायोप्सी इनवेसिव प्रोसेस है, जिसमें सुई के जरिए लिवर से टिश्यू का बहुत ही छोटा सैंपल लिया जाता है और लैब में उसकी जांच की जाती है।”
| फाइब्रोस्कैन (FibroScan) | लिवर बायोप्सी (Liver Biopsy) | |
| प्रोसेस | अल्ट्रासाउंड की तरह प्रोसेस | शरीर में सुई के जरिए लिवर का टिश्यू निकालना |
| दर्द | बिल्कुल भी दर्द न होना | दर्द और बेचैनी हो सकती है |
| समय | 10 से 15 मिनट में प्रोसेस पूरा | प्रोसेस के बाद कई घंटों तक मरीज को ऑब्सर्वेशन में रखना |
| रिस्क | सुरक्षित और नॉन-इनवेसिव टेस्ट | इंटरनल ब्लीडिंग या इंफेक्शन का डर हो सकता है |
| अस्पताल में रुकना | तुरंत घर जा सकते हैं | 2 से 6 घंटे तक ऑब्जर्वेशन में रुकना |
| रिजल्ट | तुरंत | लैब से रिपोर्ट आने में दो से तीन दिन का समय |
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किन लोगों को फाइब्रोस्कैन टेस्ट नहीं कराना चाहिए?
साल 2012 में Gastroenterology and Hepatologyजर्नल के अनुसार, फाइब्रोस्कैन टेस्ट के जरिए लिवर की स्टिफनेस यानी सख्ती को चेक किया जाता है। फैटी लिवर के मरीजों, बहुत ज्यादा शराब पीने वाले लोगों और हेपेटाइटिस B या C इंफेक्शन वाले लोगों को यह टेस्ट कराना चाहिए, लेकिन कुछ मरीजों को इस टेस्ट से बचना चाहिए।
- जिन लोगों के पेट में बीमारी के कारण पानी (ascites) भर गया हो।
- वैसे तो बहुत ज्यादा मोटापे से ग्रस्त लोगों को फाइब्रोस्कैन हो सकता है, लेकिन कुछ मामलों में दिक्कत आ सकती है।
- अगर मरीज की पसलियों और लिवर के बीच फैट की परत बहुत मोटी है, तो फाइब्रोस्कैन कराने का फायदा नहीं है।
क्या प्रेग्नेंट महिलाओं को फाइब्रोस्कैन कराना चाहिए?
NHS के अनुसार, फाइब्रोस्कैन बहुत ही सेफ प्रक्रिया है और लगभग सभी लोग करा सकते हैं। अगर कोई महिला प्रेग्नेंट है, तो डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए ताकि डॉक्टर प्रेग्नेंसी से जुड़ी मेडिकल कंडीशन को देख सके।
क्या बच्चों के लिए फाइब्रोस्कैन सेफ है?
Journal of Pediatric Gastroenterology and Nutrition के अनुसार, फाइब्रोस्कैन के जरिए पेट और खाने की नली की नसों की सूजन चेक करने के लिए की जाती है। फाइब्रोस्कैन को खासतौर पर छोटे बच्चों के लिए S प्रोब बनाए गए हैं। इसका इस्तेमाल पतली स्किन के लिए किया जाता है। अगर पसलियों के बीच कम जगह होती है या लिवर का आकार छोटा होता है, तो S1 या S2 प्रोब का इस्तेमाल किया जा सकता है।
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निष्कर्ष
फाइब्रोस्कैन में मरीज के शरीर पर किसी भी तरह का कट नहीं लगाया जाता। इस वजह से मरीज को दर्द जैसी कोई समस्या नहीं होती। सबसे अच्छी बात यह है कि मरीज टेस्ट के बाद अपने सामान्य काम कर सकते हैं। जिन मरीजों में अल्कोहल या नॉन-अल्कोहोलिक वजह से लिवर में सूजन आई है, लिवर सिरोसिस और हेपाटाइटिस B या C के मरीज फाइब्रोस्कैन टेस्ट करा सकते हैं। इस टेस्ट को करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें क्योंकि डॉक्टर ही मरीज की मेडिकल कंडीशन देखकर टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। इसके साथ यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि फाइब्रोस्कैन मुख्य रूप से एक स्क्रीनिंग और मॉनिटरिंग टेस्ट है, आगे की जांच और इलाज का फैसला डॉक्टर मरीज की पूरी मेडिकल स्थिति को देखकर ही लेते हैं।
FAQ
फाइब्रोस्कैन की नॉर्मल रेंज क्या है?
फाइब्रोस्कैन को kPa में जांचा जाता है। अगर रीडिंग 2 से 7 kPa के बीच है, तो लिवर सेहतमंद माना जाता है।क्या फाइब्रोस्कैन टेस्ट हानिकारक है?
फाइब्रोस्कैन में दर्द नहीं होता और वाइब्रेशंस के जरिए लिवर के अंदरूनी भाग को चेक किया जाता है। इससे किसी भी तरह का शरीर में कट नहीं लगाया जाता, इसलिए इस टेस्ट को कराने में कोई रिस्क नहीं है।फाइब्रोस्कैन कितनी बार किया जाना चाहिए?
फाइब्रोस्कैन हर मरीज के लिए अलग हो सकता है। आमतौर पर डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार 6 महीने से लेकर एक से दो साल के अंतराल पर इसकी सलाह देते हैं।फैटी लिवर की दवा का नाम क्या है?
फैटी लिवर के लिए आमतौर पर डॉक्टर लाइफस्टाइल में सुधार, वजन कम करना, रेगुलर एक्सरसाइज, डायबिटीज और लिपिड कंट्रोल करने की सलाह देते हैं। दवाइयों की सलाह सिर्फ डॉक्टर मरीज की कंडीशन देखकर ही फैसला करते हैं।फाइब्रोस्कैन टेस्ट कितने का होता है?
फाइब्रोस्कैन टेस्ट की कीमत आमतौर पर भारत में दो हजार रुपये से लेकर सात हजार रुपये तक हो सकती है। इसकी कीमत काफी हद तक शहर, डायग्नोस्टिक सेंटर और अस्पताल की सुविधाओं पर निर्भर करती है।
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Apr 02, 2026 16:31 IST
Modified By : Aneesh Rawat Apr 02, 2026 16:31 IST
Modified By : Aneesh RawatApr 02, 2026 16:31 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Neeraj Dhamija