आज के समय में फिटनेस और वजन कंट्रोल को लेकर लोगों की डाइटिंग आदतों में काफी बदलाव आया है। कई लोग यह मानते हैं कि दिन में बार-बार छोटे-छोटे मील (Small Frequent Meals) लेने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है, वजन कंट्रोल रहता है और एनर्जी बनी रहती है। यही कारण है कि ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के अलावा लोग बीच-बीच में स्नैक्स या छोटे मील लेना शुरू कर देते हैं। मॉडर्न न्यूट्रिशन इसे कई मामलों में फायदेमंद मानता है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार बार-बार भोजन करना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। इस लेख में सिरसा स्थित रामहंस चेरिटेबल हॉस्पिटल के आयुर्वेदिक डॉ. श्रेय शर्मा से जानिए, क्या छोटे-छोटे मील बार-बार लेना सही है?
क्या छोटे-छोटे मील बार-बार लेना सही है?
आयुर्वेदिक डॉ. श्रेय शर्मा के अनुसार, भोजन के बीच पर्याप्त अंतर न रखने से जठराग्नि (Digestive Fire) कमजोर हो सकती है, जिससे पाचन से जुड़ी कई समस्याएं शुरू हो जाती हैं। जठराग्नि भोजन को पचाने और उसे एनर्जी में बदलने का काम करती है। जब जठराग्नि मजबूत होती है, तो भोजन सही तरीके से पचता है और शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं लेकिन जब व्यक्ति बार-बार भोजन करता है और पिछले भोजन के पूरी तरह पचने से पहले ही नया भोजन ले लेता है, तो जठराग्नि पर दबाव बढ़ जाता है और वह कमजोर होने लगती है।
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- डॉक्टर श्रेय शर्मा के अनुसार, जब भोजन के बीच पर्याप्त अंतर नहीं रखा जाता, तो पाचन प्रक्रिया अधूरी रह जाती है।
- इससे भोजन का कुछ हिस्सा सही तरीके से नहीं पच पाता और शरीर में आम (Toxins) बनने लगता है।
- यह आम धीरे-धीरे शरीर की धातुओं में जमने लगता है, जिससे गैस, एसिडिटी, पेट में भारीपन और कब्ज जैसी समस्याएं शुरू हो सकती हैं।
- लंबे समय तक ऐसा चलने पर यह स्थिति क्रॉनिक डाइजेस्टिव डिसऑर्डर का कारण भी बन सकती है।
दो बार भोजन में कितने समय का अंतर होना चाहिए?
आयुर्वेद के अनुसार, भोजन के बीच पर्याप्त अंतर रखना जरूरी है ताकि पिछला भोजन पूरी तरह पच सके। आमतौर पर दो मुख्य भोजन के बीच 4 से 6 घंटे का अंतर बेहतर माना जाता है। इस दौरान शरीर को पाचन के लिए पूरा समय मिलता है और जठराग्नि संतुलित रहती है। बार-बार खाने की बजाय सही समय पर संतुलित भोजन लेना पाचन के लिए फायदेमंद माना जाता है।
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डॉक्टर की सलाह
आयुर्वेद में हर व्यक्ति की प्रकृति (Prakriti), पाचन क्षमता और लाइफस्टाइल के अनुसार डाइट की सलाह दी जाती है। कुछ लोगों के लिए छोटे-छोटे मील फायदेमंद हो सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी पाचन शक्ति कमजोर है या जिन्हें डायबिटीज जैसी स्थिति में ब्लड शुगर को स्थिर रखना होता है लेकिन सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए लगातार स्नैकिंग या बार-बार खाना जठराग्नि को असंतुलित कर सकता है।
निष्कर्ष
आयुर्वेदाचार्य डॉक्टर श्रेय शर्मा के अनुसार, बार-बार छोटे-छोटे मील लेना हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होता। जब भोजन के बीच पर्याप्त अंतर नहीं रखा जाता, तो जठराग्नि कमजोर होती है और पाचन अधूरा रह जाता है, जिससे शरीर में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं। हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में यह तरीका उपयोगी हो सकता है, लेकिन सामान्य रूप से संतुलित अंतराल पर भोजन करना ही स्वस्थ पाचन का आधार माना जाता है।
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FAQ
आयुर्वेद में जठराग्नि क्या होती है?
जठराग्नि शरीर की वह पाचन शक्ति है जो भोजन को पचाकर एनर्जी में बदलती है।आयुर्वेद में 'आम' क्या होता है?
यह अधपचे भोजन से बनने वाले टॉक्सिन्स होते हैं जो शरीर में जमा हो सकते हैं।पाचन के लिए सबसे जरूरी क्या है?
संतुलित भोजन, सही समय पर खाना और जठराग्नि का संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है।
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Current Version
Jun 15, 2026 14:37 IST
Modified By : Akanksha Tiwari Jun 15, 2026 14:37 IST
Published By : Akanksha Tiwari
Reviewed By : Dr Shrey Sharma