अमृत जैसी है ब्रह्ममुहूर्त की हवा, सुबह उठकर टहलने से मिलते हैं ये फायदे

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Sep 20, 2017
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Quick Bites

  • ब्रह्ममुहूर्त के बारे में जरूर सुना होगा
  • पूजा-पाठ के लिहाज से यह समय सबसे अच्छा होता है
  • मगर यह समय सेहत के लिहाज से भी अच्छा होता है

बदलती लाइफस्टाइल की वजह से हमारे सोने और जागने का समय भी बदल गया है। कोई निर्धारित नहीं है कि हम कितने बजे सोएंगे और कितने बजे सोकर उठेंगे। इससे हमें शारीरिक रूप से तो नुकसान पहुंच ही रहा है, मानसिक रूप से भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है। हम रात में फोन व लैपटॉप में आनंद ढूंढते हैं और जब प्रकृति के आनंद बरसाने का समय आता है, तब हमारी सोने की तैयारी होती है। भारतीय संस्कृति से वाकिफ लोगों ने ब्रह्ममुहूर्त के बारे में जरूर सुना होगा। मोटे तौर पर हम ये भी जानते हैं कि पूजा-पाठ के लिहाज से यह समय सबसे अच्छा होता है। मगर यह समय सेहत के लिहाज से भी कई मायनों में बहुत अच्छा होता है।

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अमृत के समान है ब्रह्ममुहूर्त की हवा

आयुर्वेद का सम्मान तो आप करते ही होंगे। उसी के हवाले से आपको बताते हैं कि ब्रह्ममुहूर्त में बहने वाली हवा को अमृत के समान माना जाता है, इसीलिए कहते हैं कि इस वक्त उठकर टहलने से शरीर में शक्ति आती है। वैज्ञानिक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि ब्रह्ममुहूर्त में ऑक्सीजन की मात्रा सबसे ज्यादा होती है। ऑक्सीजन को प्राण वायु कहा जाता है। इससे आपके पूरे शरीर को अच्छा एहसास होता है। खासकर फेफड़ों को बहुत आराम मिलता है, जो प्रदूषण की भट्टी में दिन-रात जलते हैं। यह बात सौ फीसदी सच है कि इस वक्ता पॉल्यूशन का लेवल सबसे कम होता है। हम मानते हैं कि शहर में रहने वाले ज्यादातर नौकरी-पेशा लोग ब्रह्ममुहूर्त का आनंद रोजाना नहीं ले सकते, क्यों कि उनकी नौकरी ऐसी होती है। मगर कोशिश करनी चाहिए कि जब भी समय मिले, तो ब्रह्ममुहूर्त का आनंद लें।

ब्रह्ममुहूर्त का सही समय

सामान्य तौर पर कहा जाता है कि ब्रह्ममुहूर्त का समय तड़के 4 से 5 बजे का होता है। शास्त्र कहते हैं कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के का समय ब्रह्ममुहूर्त होता है। आजकल के दौर में शास्त्रों के हिसाब से चलना काफी टफ होता है, इसलिए आप इतना ही समझ लें कि अगर आप तड़के उठ सकते हैं, तो जरूर जरूर उठें। आपको शिमला, मनाली सब यहीं मिल जाएगा। आपके फेफड़े आपको दुआ देंगे और शरीर आर्शिवाद।
Avanish Kumar Upadhyay

 

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