समय से पहले जन्में शिशु को हो सकती हैं ये 5 परेशानियां, इन लक्षणों से करें पहचान

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Nov 13, 2018
Quick Bites

  • सामान्यतया शिशु का जन्म गर्भकाल के 37 से 40 सप्ताह के बीच होता है।
  • इन बच्चों का वजन भी सामान्य शिशु की तुलना में कम होता है।
  • ऐसे बच्चों को अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर (एडीएचडी) कहा जाता है।

सामान्यतया शिशु का जन्म गर्भकाल के 37 से 40 सप्ताह के बीच होता है। यदि किसी कारणवश शिशु का जन्म 37 सप्ताह से पूर्व होता है तो समय पूर्व प्रसव कहा जाता है। डॉक्टर्स का कहना है कि जन्म से पहले जन्में शिशु सामान्य बच्चों की तुलना में कई समस्याओं के शिकार हो सकते हैं। ऐसे बच्चों को चीजों को पहचानने, किसी चीज का सही निर्णय लेने में दिक्कतों के साथ ही कई तरह की अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। समय से पहले जन्में ज्यादातर शिशुओं को ध्यान केंद्रित करने जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है, जिसे अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर (एडीएचडी) कहा जाता है। ऐसे बच्चे स्कूल में भी अपना 100 प्रतिशत नहीं दे पाते हैं। आज डॉक्टर शिशु रोग विशेषज्ञ (पीडीअट्रिशन) से बातचीत के आधार कुछ जरूरी सुझाव के बारे में बता रहे हैं। आइए जानते हैं क्या हैं वो चीजें-

  • समय से पहले जन्में बच्चे अपरिपक्त होते है। इन बच्चों का वजन भी सामान्य शिशु की तुलना में कम होता है। ऐसे शिशु को सामन्य शिशु की अपेक्षा विशेष देखभाल की जरूरत होती है।
  • 1800 ग्राम से 2,000 ग्राम तक के शिशु यदि स्तनपान कर रहा हो तो इसे विशेष देखभाल के साथ घर पर भी रखा जा सकता है, परन्तु 1800 ग्राम से कम वजन के शिशु या 34 सप्ताह से पूर्व जन्मे नवजात को शिशु विशेषज्ञ के यहां रखना उचित है।
  • 1500 ग्राम से कम वजन के शिशु को इक्यूबेटर में रखा जाता है। जहां शिशु को गर्भ जैसा वातावरण मिलता है।
  • ऐसे शिशु में कई तरह की समस्याएं आती है, जैसे कि शरीर का ताप कम होना, इसके लिए 37 डिग्री तापमान लगातार बनाए रखना आवश्यक है।
  • समय पूर्व जन्मे शिशु में प्रोटिन की अधिक आवश्यकता होती है। जो मां के दूध में सर्वोत्तम रूप में पाया जाता है। क्योंकि मां के दूध में प्रोटिन एवं अन्य तत्वों की मात्रा शिशु की आवश्यकता अनुसार घटती बढ़ती रहती है।
  • इस तरह के शिशु में कैल्सियम, फासफोरस, सोडियम, कॉपर, सेलेनियम, आयरन एवं जिंक की आवश्यकता होती है। जिसे अलग से दिया जाना चाहिए। विटामीन ए, बी, बी 2, बी 6, सी एवं डी शुरू में 0.3 एमएल रोज तथा बाद में 0.6 एमएल रोज देना चाहिए।
  • विटामिन के 0.5 मीलीग्राम, की सूई जन्म के समय अवश्य देनी चाहिए। ऐसे शिशु को पीलिया एवं संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है। इसलिए ऐसे बच्चों की देखभाल करने वाले को स्वयं संक्रमण रहित होना चाहिए।
  • प्रतिरक्षण के टीके सामान्य रूप से दिलाना चाहिए। समय पूर्व प्रसव के कई कारण है। जिनमें मुख्य रूप से मां की उम्र 18 वर्ष से कम होना, मां का कुपोषण, एनीमिया, उच्चरक्तचाप से ग्रसित होना, दीर्घकालीन संक्रमण, प्रसव पूर्व रक्तश्राव आदि है।

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