कृत्रिम रोशनी का अधिक संपर्क दे सकता है मोटापा, डायबिटीज और कैंसर जैसे रोग

कृत्रिम रोशनी में अधिक वक्‍त गुजारने से आपको डायबिटीज, कैंसर और अवसाद जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। इससे बचने के लिए शोधकर्ताओं ने कई उपाय सुझाए हैं।

एजेंसी
लेटेस्टWritten by: एजेंसीPublished at: Oct 22, 2013Updated at: Oct 22, 2013
कृत्रिम रोशनी का अधिक संपर्क दे सकता है मोटापा, डायबिटीज और कैंसर जैसे रोग

कृत्रिम रोशनी का असरकृत्रिम रोशनी भले ही आपकी जिंदगी को 'रोशन' बनाने का काम करती हो, लेकिन वास्‍तविकता यह है कि इस प्रकार की रोशनी आपकी सेहत के लिहाज से बिल्‍कुल ठीक नहीं है। यह आपकी जेब और सेहत दोनों पर भारी पड़ती है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि कृत्रिम प्रकाश में अधिक समय बिताना मोटापा और डायबिटीज और अवसाद जैसी बीमारियां हो सकती हैं। इतना ही नहीं शोधकर्ता तो यह भी मानते हैं कि इससे कैंसर जैसा गंभीर रोग भी आपको अपना शिकार बना सकता है।

ब्रिटिश अखबार 'द डेली मेल' के मुताबिक, बीते साल यूरोपियन कमीशन की एक वैज्ञानिक रिपोर्ट में कहा गया है कि रात में अधिक देर तक कृत्रिम रोशनी में रहने से स्‍तन कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके साथ ही नींद, गैस, मूड और हृदय रोग आदि भी आपको परेशान कर सकते हैं।

इसके साथ ही बल्‍ब का रंग भी काफी मायने रखता है। न्‍यूरोसाइंस जर्नल ने हाल में प्रकाशित एक शोध में साबित किया कि नीली रोशनी अवसाद को बढ़ाने का काम करती है और वहीं लाल प्रकाश मूड पर सबसे कम प्रभाव डालता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इनसान अगर अच्‍छी नींद चाहता है, तो उसे अपने शयनकक्ष में लाल रोशनी वाला बल्‍ब लगाना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कृत्रिम रोशनी बुरी ही होती है। लेकिन, हमें इसे अलग प्रकार से इस्‍तेमाल करना चाहिए।

यूनिवर्सिटी ऑफ केनेटिकट हेल्‍थ सेंटर में कैंसर एपिडेमियालॉजिस्‍ट, प्रोफेसर रिचर्ड स्‍टीवन का कहना है कि रोशनी का मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर और शोध किये जाने की जरूरत है। तो, अभी आपको ज्‍यादा डरने की जरूरत नहीं है। स्‍टीवन का सुझाव है कि अपने घर में शाम के समय जितना हो सके धीमी रोशनी का उपयोग करें, विशेषकर सोने के कमरे में। और जहां तक लाल रोशनी की बात है शोधकर्ताओं का कहना है कि हमारे शरीर की कार्यप्रणाली पर इसका सबसे कम असर पड़ता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ सरे में न्‍यूरोंडोक्रिनोलॉजी के प्रोफेसर डेबरा स्‍केन का कहना है कि अगर आप सुबह दफ्तर जाते समय अलर्ट महसूस करना चाहते हैं तो आपके लिए अच्‍छा रहेगा कि आप फ्लूरोसेंट की तेज रोशनी का इस्‍तेमाल करें। शोधकर्ता दिन भर में आपको मिलने वाले कृत्रिम प्रकाश को लगातार बदलते रहने की सलाह देते हैं। लेकिन, शाम के समय जब आप सचेत और उत्‍साहपूर्ण नहीं रहना चाहते, तो उस समय आपको मद्धम रोशनी वाले बल्‍बों का इस्‍तेमाल करना चाहिए। आपको ऐसी रोशनी इस्‍तेमाल करनी चाहिए जिसमें नीला प्रकाश बेहद कम हो।

ऑक्‍सर्फोड यूनिवर्सिटी में सरकेडियन न्‍यूरोसाइंस के प्रोफेसर रसेल फोस्‍टर भी सूरज ढलने के बाद धीमी रोशनी इस्‍तेमाल करने की वकालत करते हैं। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार की तेज रोशनी हमारे शरीर की जैविक घड़ी पर प्रभाव डालने के लिए काफी है। उनकी सलाह है कि बिस्‍तर पर जाने के कम से कम तीस मिनट पहले आपको मद्धम रोशनी में जले जाना चाहिए। आपको अपने बेडरूम में तेज प्रकाश इस्‍तेमाल करने से बचना ही चाहिए।

प्रोफेसर फोस्‍टर आगे कहते हैं कि सर्दियों में सूरज की रोशनी में रहना बेहद जरूरी है। विशेषकर सुबह के समय, क्‍योंकि इसी समय हमारी बॉडी क्‍लॉक सबसे अधिक संवेदनशील होती है। अपना नाश्‍ता भी रोशनी में कीजिए। खिड़की के पास बैठकर या बरामदे में। मौसम को दरकिनार कर बाहर कुछ वक्‍त जरूर गुजारिये।

 

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