आयुर्वेदिक तरीके से करें सोरायसिस का इलाज, जानें एक्‍सपर्ट की राय

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Feb 23, 2018
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Quick Bites

  • यह रोग आनु्‌वंशिक भी हो सकता है।
  • पर्यावरण भी एक बड़ा कारण माना जाता है।
  • यह बीमारी कभी भी और किसी को भी हो सकती है।

सोरायसिस चमड़ी पर होने वाली एक ऐसी बीमारी है जिसमें त्वचा पर एक मोटी परत जम जाती है। अलग शब्दों में कहें तो चमड़ी की सतही परत का अधिक बनना ही सोरायसिस है। त्वचा पर सोराइसिस की बीमारी सामान्यतः हमारी त्वचा पर लाल रंग की सतह के रूप में उभरकर आती है और स्केल्प (सिर के बालों के पीछे) हाथ-पांव अथवा हाथ की हथेलियों, पांव के तलवों, कोहनी, घुटनों और पीठ पर अधिक होती है। हालांकि यह रोग केवल 1-2 प्रतिशत लोगों में ही पाया जाता है।

यह रोग आनु्‌वंशिक भी हो सकता है। आनु्‌वंशिकता के अलावा इसके होने के लिए पर्यावरण भी एक बड़ा कारण माना जाता है। यह बीमारी कभी भी और किसी को भी हो सकती है। कई बार इलाज के बाद इसे ठीक हुआ समझ कर लोग निश्चिंत हो जाते हैं, लेकिन यह बीमारी दोबारा हो सकती है। सर्दियों के मौसम में यह बीमारी ज्यादा होती है।

आयुर्वेद के अनुसार, सोरायसिस एक गैर-संक्रामक त्वचा रोग है। सोरायसिस में शरीर में वात व पित्त की अधिकता के कारण त्वचा के टिश्यूज में विषैले तत्व फैल जाते हैं, जो कालांतर में सोरायसिस की समस्या पैदा करते हैं। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्‍यम से वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. प्रताप चौहान द्वारा बताए गए सोरायसिस के कारण, लक्षण और उपचार की विस्‍तृत जानकारी दे रहे हैं। अगर आप इस बीमारी से परेशान हैं तो आपको इस लेख से समाधान मिल सकता है।

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जब दिखे ऐसे लक्षण

सोरायसिस के कारण त्वचा में जलन, खुजली, त्वचा का लाल पडऩा और सूजन आना जैसे लक्षण प्रकट होते हैं।

सोरायसिस होने की वजह  

  • सोरायसिस होने का कारण आनुवांशिक भी हो सकता है।
  • यदि माता-पिता दोनों इससे ग्रस्त हैं, तो बच्चे को भी सोरायसिस होने की संभावना 60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
  • इसके अलावा प्राकृतिक वेगों (मल व पेशाब) को कई बार रोकना भी कालांतर में इस रोग का कारण बन सकता है।
  • इसी प्रकार मसालेदार, तैलीय, चिकनाईयुक्त व जंक फूड्स खाने, चाय काफी और शराब का सेवन व धूम्रपान भी सोरायसिस के कारण बन सकते हैं।

इसे भी पढ़ें: सोरायसिस के 7 प्रकारों की आपको होनी चाहिए जानकारी

सोरायसिस का उपचार

  • स्व-चिकित्सा (सेल्फ मेडिकेशन) से दूर रहें। अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लेने के बाद ही उपचार शुरू करें।
  • पानी में साबुत अखरोट उबालकर और इसे हल्का ठंडाकर त्वचा के प्रभावित अंगों पर लगाएं। प्रभावित अंग को ताजे केले के पत्ते से ढक दें।
  • 15 से 20 तिल के दाने एक गिलास पानी में भिगोकर पूरी रात रखें। सुबह खाली पेट इनका सेवन करें।
  • पांच से छह महीने तक प्रात: 1 से 2 कप करेले का रस पिएं। यदि यह रस अत्यधिक कड़वा लगे, तो एक बड़ी चम्मच नींबू का रस इसमें डाल सकते हैं।
  • खीरे का रस, गुलाब जल व नींबू के रस को समान मात्रा में मिलाएं। त्वचा को धोने के बाद इसे रातभर के लिए लगाएं।
  • आधा चम्मच हल्दी चूर्ण को पानी के साथ दिन में दो बार लें।
  • घृतकुमारी का ताजा गूदा त्वचा पर लगाया जा सकता है या इस गूदे का प्रतिदिन एक चम्मच दिन में दो बार सेवन करें।
  • यदि आपको उपर्युक्त उपचार विधियों से राहत नहीं मिलती है, तो आयुर्वेद चिकित्सक से सलाह अवश्य लें। आयुर्वेद चिकित्सा के माध्यम से सर्वप्रथम रक्त व टिश्यूज की शुद्धि की जाती है। फिर यह पद्धति पाचन तंत्र को मजबूत कर त्वचा के टिश्यूज को सशक्त करती है।
  • सुबह टहलें और नियमित रूप से पेट साफ रखें।

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