फैटी लिवर होने पर सबको अपनी डाइट का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ऐसी किसी चीज का सेवन नहीं करना चाहिए, जिससे लिवर के आसपास फैट अधिक मात्रा में जमा हो और लिवर की सूजन बढ़ जाए। कई लोग फैटी लिवर में वसा को कम करने के लिए घर का बना खाना खाने को प्राथमिकता देते हैं, वहीं कुछ लोग सलाद और फलों को ज्यादा से ज्यादा अपनी डाइट में शामिल करते हैं। कुछ नॉन-वेजिटेरियन लोग फैटी लिवर होने के बावजूद मछली खाना पसंद करते हैं। ऐसे में यह सवाल जरूर हमारे मन में उठता है कि क्या फैटी लिवर में फिश खाना पूरी तरह सेफ होता है और इसे कितनी मात्रा में खाना चाहिए? सेक्टर 20, फरीदाबाद स्थित यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में Group Director - Gastroenterology डॉ. कपिल शर्मा ने खुद वैज्ञानिक तथ्यों की पुष्टि की है।
फैटी लिवर में मछली क्यों फायदेमंद मानी जाती है?
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फैटी लिवर में मछली खाई जा सकती है और यह पूरी तरह सुरक्षित मानी जाती है। यहां तक कि कई मामलों में फैटी लिवर में इसे फायदेमंद माना जाता है। डॉ. कपिल शर्मा बताते हैं, "मछली में ओमेगा-3 फैटी एसिड अच्छी मात्रा में पाया जाता है। फैटी लिवर के स्तर को कम करने में ओमेगा-3 फैटी एसिड काफी फायदेमंद होता है।" वे आगे कहते हैं कि ओमेगा-3 फैटी एसिड खाने से जीजीटी नामक लिवर एंजाइम के स्तर में कमी आती है। यह एंजाइम लिवर डैमेज का संकेत देता है। इसके अलावा, मछली में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है।
फैटी लिवर में कितनी मात्रा में मछली खानी चाहिए?
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वैसे तो मरीज को किस ग्रेड का फैटी लिवर है, यह बात जानना ज्यादा जरूरी है। मरीज की स्थिति पर यह निर्भर करता है कि उन्हें मछली खानी चाहिए या नहीं। हालांकि, मरीज को एल्कोहलिक फैटी लिवर हो या नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर। दोनों ही स्थिति में उन्हें कैलोरी काउंट और पोषक तत्वों की मात्रा का ध्यान रखना चाहिए। जहां तक सवाल इस बात का है कि फैटी लिवर के मरीज को कितनी मात्रा में मछली खानी चाहिए, डॉ. कपिल शर्मा के अनुसार, "फैटी लिवर होने पर सप्ताह में दो या इससे अधिक बार ऑयली फिश की सर्विंग्स यानि 280 ग्राम से 300 ग्राम खा सकते हैं। हर सर्विंग में 85 ग्राम पकी हुई मछली होनी चाहिए। यह लिवर के फैट और इंफ्लेमेशन को कम करने में फायदेमंद है।"
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फैटी लिवर में कैसी मछली खाएं?
2022 में The American Journal of Gastroenterology में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार के अनुसार फैटी लिवर होने पर सैल्मन, बंगड़ा, टूना, ट्राउट जैसी मछलियों को अपनी डाइट का हिस्सा बना सकते हैं। असल में फैटी लिवर के मरीज को ऐसी मछलियां चुननी चाहिए, जो ओमेगा-3 फैटी एसिड के अच्छे स्रोत हैं।
मछली में मरकरी: लिवर के लिए क्यों है नुकसानदायक?
मछली प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, लेकिन जिन मछलियों में Mercury की मात्रा ज्यादा होती है, वे लिवर के मरीजों के लिए स्लो पॉइजन की तरह काम कर सकती हैं। डॉ. कपिल शर्मा कहते हैं, "मरकरी एक प्रकार का हेवी मेटल है, जिसे बीमार लिवर आसानी से प्रोसेस नहीं कर सकता है। यह लिवर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाती है, जिससे लिवर की सूजन और भी बढ़ जाती है। इसलिए लिवर के मरीजों को हर तरह की मछली नहीं खानी चाहिए। बड़ी सुरमई, टाइलफिश, टूना जैसी मछलियों में काफी ज्यादा मात्रा में मरकरी होता है।"
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फैटी लिवर में मछली खाने के फायदे
- लिवर फैट के स्तर में कमीः ऑयली फिश ओमेगा-3 पॉलिअनसैचुरेटेड फैटी एसिड का अच्छा स्रोत है। इसका सेवन करने से लिवर के आसपास जमा फैट का स्तर कम होता है। असल में ओमेगा-3 पॉलिअनसैचुरेटेड फैटी एसिड लिवर में आए इंफ्लेमेशन को कम करता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी को इंप्रूव करता है। American Liver Foundation की मानें तो मछली खाने से सूजन में कमी आ सकती है।
- लिपिड प्रोफाइल में सुधारः मछली खाने से ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर सही तरह से रेगुलेट होता है। जानकारी के लिए बता दें कि ट्राइग्लिसराइड्स हमारे ब्लड में पाए जाने वाले एक प्रकार के फैट (वसा) होते हैं, जिनका उपयोग शरीर ऊर्जा के लिए करता है। बहरहाल, मछली खाने से लिवर के पास मौजूद वसा का जमाव कम होता है। Mayo Clinic के अनुसारकि मछली खाने से लिपिड प्रोफाइल में सुधार होता है।
- लीन प्रोटीन का अच्छा स्रोतः मछली में सेचुरेटेड फैट का स्तर कम होता है और यह लीन प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। यह कई तरह के प्रोसेस्ड मीट और रेड मीट की तुलना में बेहतर विकल्प है। फैटी लिवर होने पर मछली का सेवन करने से वजन को संतुलित करने में मदद मिलती है।
- पोषक तत्वों से भरपूरः मछली में विटामिन डी और बी, मिनरल्स जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। मछली एंटीऑक्सीडेंट्स का भी अच्छा स्रोत है। सीमित मात्रा में इसका सेवन करने से मेटाबॉलिक फंक्शन में सुधार होता है, जिससे फैटी लिवर में इसके फंक्शन में सुधार देखने को मिलता है।
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फैटी लिवर में मछली पकाने का सही तरीका अपनाएं
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Mayo Clinic के अनुसार, "फैटी लिवर में सही तरह से पकी हुई मछलियां ही खानी चाहिए। ऐसी मछलियां नहीं खानी चाहिए, जो अधपकी हों। विशेषज्ञों का कहना है कि फैटी लिवर में बेकिंग, ग्रिलिंग, भाप में पकी हुई मछलियां खाना सेफ होता है। इन्हें फ्राई करने के लिए ऑलिव ऑयल का उपयोग किया जा सकता है।" ध्यान रखें कि फैटी लिवर के मरीजों को डीप फ्राई और क्रीम से बनी हुई मछलियां खाने से बचना चाहिए। उन्हें मछली में अतिरिक्त वसा और हाई सोडियम युक्त सॉस का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस तरह की मछलियां खाने से लिवर में फैट बढ़ने का रिस्क रहता है।
फैटी लिवर में Fish Oil Supplements लें या नहीं?
कई लोग मछली खाने के बजाय फिश ऑयल सप्लीमेंट्स लेते हैं। ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि क्या फैटी लिवर में इसका सेवन किया जाना फायदेमंद होता है? फिश ऑयल सप्लीमेंट्स (Omega-3) फैटी लिवर के मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। दरअसल, ये लिवर में जमा अतिरिक्त चर्बी (Triglycerides) को कम करने और लिवर की सूजन को घटाने में मदद करते हैं। वास्तव में, ओमेगा-3 फैटी एसिड लिवर सेल्स को डैमेज होने से बचाते हैं और लिवर के फंक्शन में सुधार करते हैं। हालांकि फैटी लिवर के मरीज किस तरह के सप्लीमेंट चुन रहे हैं, ये बात मायने रखती है। फिश ऑयल सप्लीमेंट हमेशा एक्सपर्ट की सलाह पर ही लें, क्योंकि इसके सही डोज की जानकारी होना भी आवश्यक है।
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फैटी लिवर में डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए
अगर किसी को पहले से ही फैटी लिवर की समस्या है, तो उसे समय-समय पर अपनी जांच करवाते रहना चाहिए। इससे उन्हें अपने लिवर की कंडीशन का पता चलता रहेगा और उन्हें समझ आएगा कि उनका ट्रीटमेंट किस दिशा में चल रहा है। हां, अगर किसी को फैटी लिवर नहीं है, तो उसे कई तरह के लक्षणों पर गौर करना चाहिए। NHS के अनुसार अक्सर थकान और कमजोरी महसूस होना, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द होना और अचानक वजन कम होना इसके संभावित संकेत हो सकते हैं। हालांकि, शुरुआती चरण में इसके लक्षण अक्सर स्पष्ट रूप से नजर नहीं आते। एडवांस्ड स्टेज में पहुंचने पर त्वचा और आंखों का पीला पड़ जाना, पेट में सूजन आना, पेट में तरल पदार्थ का बनना और पैरों में सूजन आना शामिल हैं।’ इसमें आगे कहा गया है कि टाइप 2 डायबिटीज, ओवर वेट, हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल के मरीजों को भी फैटी लिवर का जोखिम रहता है। इसलिए, उन्हें भी समय-समय पर इसकी जांच करवाते रहना चाहिए।
निष्कर्ष
अगर किसी को फैटी लिवर है, तो वे निश्चित रूप से सही तरह से पकी हुई मछलियों का सेवन कर सकते हैं। मछली में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड लिवर में जमा वसा को कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अपनी डाइट में सिर्फ फिश शामिल की जाए। यह हमेशा बैलेंस्ड डाइट का हिस्सा होना चाहिए। जैसा कि हमने लेख में शुरू में भी इसका जिक्र किया है कि सप्ताह में सिर्फ दो सर्विंग काफी होती हैं। इसके अलावा, अगर आपको फैटी लिवर के साथ-साथ मछली से एलर्जी है तो इसका सेवन न करें। वहीं, अगर कोई महिला प्रेग्नेंट हैं, तो उन्हें मछली को डाइट का हिस्सा बनाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
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FAQ
फैटी लिवर में कौन सी मछली खानी चाहिए?
फैटी लिवर में ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मछलियों का सेवन करना चाहिए। इसमें टूना, सैल्मन, और ट्राउट जैसी मछलियां अच्छे विकल्प मानी जाती हैं। ऐसी मछलियों का सेवन न करें, जिनमें अस्वास्थ्यकर वसा ज्यादा हो और ओमेगा-3 फैटी एसिड की मात्रा कम हो। आप चाहें तो रोहू, कतला, हिल्सा भी सीमित मात्रा में खा सकते हैं।लिवर में सूजन होने पर क्या खाना चाहिए?
लिवर में सूजन होने पर अपनी डाइट का विशेष ध्यान रखना चाहिए। लिवर में सूजन होने पर ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन को डाइट में शामिल करना चाहिए। इसके साथ-साथ बॉडी को हाइड्रेटेड रखना भी जरूरी है। हाइड्रेटेड रहने से नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर के नए मामले बढ़ने का जोखिम कम होता है। इससे शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद मिलती है और मेटाबॉलिक फंक्शन बेहतर हो सकता है।फैटी लिवर के लिए मछली कैसे पकाते हैं?
फैटी लिवर के मरीजों को मछली बेक या ग्रिल करके खाना चाहिए। उन्हें अतिरिक्त वसा, क्रीम आदि का उपयोग मछली पकाते हुए नहीं करना चाहिए। साथ ही, मछली को कभी भी अधपका नहीं खाना चाहिए। खासकर, प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए यह नुकसानदायक हो सकता है।फैटी लिवर में क्या परहेज करना चाहिए?
फैटी लिवर में किसी भी तरह की अनहेल्दी चीजें जैसे सोडा, कैंडी, तला-भुना, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड फूड, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और रेड मीट का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, शराब और अन्य नशीले पदार्थों से भी दूरी बनाए रखनी चाहिए।
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Apr 03, 2026 18:31 IST
Modified By : Meera Tagore Apr 03, 2026 18:31 IST
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Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Kapil Sharma