नशीले पदार्थों के सेवन से आप ही नहीं आपके परिवार का भी बिगड़ता है मानसिक स्वास्थ्य, डॉक्टर से जानें कैसे

लंबे समय और अधिक मात्रा में नशे का सेवन करने से साइकोसिस और हैलुसनेशन जैसी मानसिक बीमारियां होती हैं। नशा छोड़ना ही ठीक है।

Meena Prajapati
Written by: Meena PrajapatiPublished at: Jun 07, 2021
नशीले पदार्थों के सेवन से आप ही नहीं आपके परिवार का भी बिगड़ता है मानसिक स्वास्थ्य, डॉक्टर से जानें कैसे

परिवार में अगर एक व्यक्ति भी नशा करना शुरू करता है तो पूरे परिवार पर उसका प्रभाव पड़ता है। भारत में ऐसी खबरों की और आंकड़ों की कमी नहीं है जिसमें यह बताया जाता है कि ‘’पति ने नशे में पत्नी की ली जान।’’ ऐसी हेडिंग्स हम आए दिन पढ़ते हैं। नशे को लेकर कोई क्लास नहीं है। यह हर वर्ग के लोग करते हैं। पर जब नशा एक आदत बन जाता है और उसके न मिलने पर पीड़ित व्यक्ति के हाथ कांपने से लेकर आपा खोने तक की आशंका होती है, ऐसी परिस्थिति में ये लोग खुद के लिए और परिवार के लिए खतरनाक हो जाते हैं।

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जब किसी घर में कोई नशे का आदी पेशेंट होता है तो उसके परिवार के सदस्यों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। घर में किसी एक के नशे के आदी होने से परिवार भी डिप्रेशन में आ जाता है, इसको गुरुग्राम के अवेकनिंग रिहैब में मनोवैज्ञानिक डॉ. प्रज्ञा मलिक ने कोडिपेंडेंट पैटर्न्स कहा बताया है। इसमें पेशेंट के ट्रीटमेंट के साथ-साथ फैमिली को भी ट्रीटमेंट दिया जाता है। 

कोरोना में नशीले पदार्थों का सेवन और बढ़ा है। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफोर्मेशन (NCBI) की मानें तो कोरोना के दौरान लोगों में डर, चिंता, तनाव, बेरोजगारी आदि 75,000 “deaths of despair’’ का कारण बन सकता है। यह आंकड़ा नशे का सेवन करने में वालों में ज्यादा बढ़ा। आज के इस लेख में मनोवैज्ञानिक डॉ. प्रज्ञा मलिके से जानेंगे कि आखिर यह नशे की लत नशा करने वाले और परिवार के मानसिक स्वास्थ्य पर कैसे प्रभाव डालती है। इस आदत से कैसे बचा जा सकता है, इसके बारे में भी डॉक्टर से जानेंगे। 

नशे के प्रकार

  • ओपियोड्स (सूखा नशा)
  • मेथमफेटामाइन (Methamphetamines)
  • एल्कोहल
  • निकोटिन

नेशनल ड्रग डेपेन्डेंस ट्रीटमेंट सेंटर, एम्स के मुताबिक भारत में 2018 में 2.3 ओपियोड्स के उपभोक्ता थे जो 14 सालों में पांच गुना और बढ़ गए। इन उपभोक्ताओं में 10-75 वर्ष वालों की उम्र ज्यादा है। इन सभी नशों में ओपियोड्स का सेवन ज्यादा बढ़ रहा है। 

क्या है ओपियोड्स

ओपियोड्स के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. प्रज्ञा मलिक कहती हैं कि ओपियोड्स कैनाबीस नामक पौधे से बनता है। इस पौधे के अलग-अलग पार्ट्स अलग ड्रग्स को बनाने में काम आते हैं। भांग के रूप में कैनाबीस का प्रयोग भारत में वैध हैं, पर चरस और गांजा इलीगल हैं। 

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ओपियोड्स शरीर में क्या करते हैं?

सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर सीधे असर

डॉक्टर प्रज्ञा मलिक का कहना है कि ओपियोड्स सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर डालते हैं जो सीधे हमारे ब्रेन और बॉडी पर असर डालता है।  ओपियोड्स में कोकेन और हेरोइन शामिल है। जब इन पदार्थों का सेवन किया जाता है, तब हमारे ब्रेन से गामा रिसेप्टर निकलते हैं। ये हमारे दर्द के सेंसेशन से जुड़े होते हैं। इन ओपियोड्स का प्रयोग जब दवाओं के रूप में किया जाता है, तब ये दर्द को कम करते हैं। लेकिन अधिक मात्रा में सेवन और गैर जरूरी सेवन शरीर को बीमार बना देते हैं। 

डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि इन ओपियोड्स को एक्युट पेन या क्रोनिक पेन के लिए दो तरह प्रयोग में किया जाता है। जब इनका प्रयोग किया जाता है, तब ये दर्द को कम कर देते हैं। इन दवाओं का प्रयोग कैंसर में भी किया जाता है। लेकिन ये सभी दवाएं डॉक्टर की सलाह से दवा के रूप में दी जाती हैं। यह दवा दर्द को कम करती है और तनाव को कम करती है। ओपियोड्स को सीमित मात्रा से ज्यादा लिया जाता है तो इसे ओपियोड्स डिपेंडेंट डिसऑर्डर कहा जाता है। 

ओपियोड्स डिपेंडेंट डिसऑर्डर की पहचान?

  • लंबे समय तक ओवरडोज लेना। 
  • ओपियोड्स लेने की डियाजर।
  • ओपियोड्स की इच्छा को नियंत्रित नहीं कर पाना।
  • ब्रेन हाइजेक हो जाना।

नशीले पदार्थों के सेवन का मानसिक स्वास्थ्य पर असर?

डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि ऐसा देखा गया है कि सूखा नशा शराब से ज्यादा घातक होता है। डॉक्टर का कहना है कि इन नशीले पदार्थों का नुकसान इस पर निर्भर करता है कि इन्हें कितनी मात्रा में और कितने समय में लिया जा रहा है।

साइकोसिस की आशंका

डॉक्टर प्रज्ञा मलिक का कहना है कि कोई व्यक्ति जब जरूरत से ज्यादा इन नशीले पदार्थों का सेवन करता है तो उन्हें साइकोसिस होने की संभावना ज्यादा होती है। इसके अधिक सेवन और मात्रा पर यह बीमारी निर्भर करती है। नशे के सेवन से मानसिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। 

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हैलुसलेशन

हैलुसनेशन एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति को किसी तरह की आवाजें और छवियां दिखाई देती हैं। ये कंडीशन भी ज्यादा नशा करने की वजह बनती है। नशीले पदार्थों के सेवन के अन्य दुष्प्रभाव भी हैं, वे इस प्रकार हैं। 

प्रोडक्टिविट पर असर

डॉक्टर प्रज्ञा मलिक का कहना है कि ओपियोड्स का अधिक सामाजिक और निजी दोनों रूपों में बुरा असर डालता है। इनका अधिक सेवन करने से वर्किंग लाइफ डिस्टर्ब रहती है। काम पर ध्यान नहीं लगता। इसके अलावा निम्न लक्षण दिखाई देते हैं। 

  • छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ाहट, गुस्सा आना
  • जरूरत पूरी नहीं होने पर घर में ही चोरी करना
  • घर वालों की पिटाई करना

डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि ओपियोड्स का अधिक सेवन प्रोडक्टिविटी पर असर डालता है। जिस वजह से मानसिक तनाव बढ़ता है। 

लोगों से मिलने का मन नहीं करना

डॉ. प्रज्ञा का कहना है कि ऐेसे लोगो जो नशे के आदि होते हैं वे अगर नशे की लत से पहले लोगों से मिलते जुलते थे, लेकिन नशे के बाद नहीं मिलते ते इसका उनकी सोशल इंटरेक्शन पर असर पड़ता है। ऐसे लोग खुद को अकेला कर लेते हैं। किसी से मिलने का मन नहीं करता।

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कैपिसिटी पर असर

ज्यादा नशा करने से मेंटल और फिजिकल दोनों स्थितियों पर असर पड़ता है। इस वजह से व्यक्ति की काम करने की क्षमता कम होती है। उदाहरण के लिए अगर वह पहले 10 घंटे काम करता था तो अब 7 घंटे ही करता है। कई बार परेशानियों को हल नहीं कर पाता। खुद पर कंट्रोल नहीं रहता। 

आर्थिक स्थिति पर असर

कोई व्यक्ति जो एक दिन में एक गिलास शराब पी रहा है था थोड़े दिनों में उसका उपभोग 1 बोतल तक पहुंच जाता है। जिस वजह से उसकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ता है। ऐसे लोगों को फिजिकली या मेंटली विड्रोल करना पड़ता है। जिन्हें कम करने के लिए इन्हें दोबारा नशा करना पड़ता है। ऐसे लोगों को मिर्गी के दौड़े भी बढ़ जाते हैं।

इलाज

दवाएं

ऐसे मरीजों को मनोचिकित्सक देखते हैं। इन मरीजों का दवाओं से इलाज किया जाता है।

साइकोथेरेपी

इस थेरेपी में डॉक्टर मरीज को तैयार करते हैं ताकि वे खुद खुद को हैंडिल कर लें। ग्रूप थेरेपी और रिलैक्स प्रिविंशेन किया जाता है। 

काउंसलिंग

मरीज की काउंसलिंग की जाती है। ताकि वे खुद उस नशे को छोड़ने को तैयार हों। उन्हें जिंदगी को लेकर मोटिवेट करना होता है। 

फैमिली काउंसलिंग

मरीजों के परिजनों को बताया जाता है कि जब मरीज ठीक हो रहा है या जब उसकी दवाओं चल रही हैं तो उन्हें उससे क्या बातें करनी है। डॉक्टर कहती हैं कि जब किसी घर में कोई पेशेंट होता है तो उसके परिवार पर भी असर पड़ता है। ऐसे में परिवार भी डिप्रेशन में आ जाता है, इसको कोडिपेंडेंट पैटर्न कहा जाता है। इसमें पेशेंट के ट्रीटमेंट के साथ-साथ फैमिला को भी ट्रीटमेंट दिया जाता है। जिसमें उनकी खुद की कोपिंग स्किल्स को इंप्रूव करने के साथ-साथ एक डायरेक्शन दिया जाता है जिसमें यह बताया जाता है कि जब पेशेंट नॉर्मल होगा तब उससे क्या बात करनी है। 

डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि कोरोना ने नशीले पदार्थों के सेवन को और बढ़ावा दिया है। डॉक्टर मानना है कि ऐसे केसिस में 20 फीसद वृद्धि हुई है। तो वहीं, नशा छोड़ना ही सेहत के लिए सही है। इससे आप और आपका परिवार दोनों सुरक्षित रह सकते हैं। 

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