क्या कभी आपको लगा है कि जेब में रखा फोन वाइब्रेट हुआ है? आपने तुरंत फोन निकाला, स्क्रीन देखी, लेकिन वहां न कोई कॉल थी और न ही कोई मैसेज। कुछ देर बाद फिर ऐसा ही महसूस हुआ। कई बार तो इतनी साफ वाइब्रेशन महसूस होती है कि हमें पूरा यकीन होता है कि फोन जरूर बजा होगा लेकिन फोन चेक करने पर कुछ भी नहीं मिलता। अगर आपके साथ भी ऐसा अक्सर होता है, तो आप अकेले नहीं हैं। यशोदा हॉस्पिटल, हैदराबाद के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी के अनुसार, इस अनुभव को आमतौर पर फैंटम वाइब्रेशन कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को फोन के वाइब्रेट होने का एहसास होता है, जबकि वास्तव में फोन ने कोई संकेत नहीं दिया होता।
न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर भरत कुमार सुरिसेट्टी से जानिए कि फैंटम वाइब्रेशन के पीछे दिमाग और शरीर की सेंसेशन का क्या कनेक्शन है, किन लोगों में यह अनुभव ज्यादा देखने को मिल सकता है और कब बार-बार होने वाली ऐसी सेंसेशन को नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से बात करनी चाहिए।
ऐसा क्यों लगता है कि फोन वाइब्रेट हुआ लेकिन कॉल नहीं आई?
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक फोन को जेब, हाथ या शरीर के किसी हिस्से के पास रखता है, तो उसका दिमाग फोन से आने वाले संकेतों को पहचानने का आदी हो सकता है। धीरे-धीरे फोन की संभावित घंटी या वाइब्रेशन को लेकर हमारा ध्यान ज्यादा सेंसिटिव हो सकता है।
- न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर भरत कुमार सुरिसेट्टी के अनुसार, इस तरह का अनुभव दिमाग के संवेदी संकेतों (Sensory signals of the brain) और हमारी अपेक्षा के बीच संबंध से जुड़ा हो सकता है।
- स्किन और शरीर से मिलने वाले हल्के स्पर्श या मसल्स की एक्टिविटी जैसे संकेतों को दिमाग अलग-अलग तरीके से समझता है। कभी-कभी कोई सामान्य सेंसेशन भी फोन के वाइब्रेशन जैसी महसूस हो सकती है।
- कॉल, मैसेज या किसी दूसरे अलर्ट के लिए हम बार-बार फोन की ओर देखते हैं। इस लगातार दोहराए जाने वाले बिहेवियर से दिमाग फोन से जुड़े संकेतों को महत्व देना सीख सकता है।
- अगर किसी व्यक्ति को अक्सर फोन आने की उम्मीद रहती है या वह बार-बार फोन चेक करता है, तो उसका ध्यान शरीर में होने वाली छोटी-छोटी सेंसेशन पर भी जा सकता है।
- कपड़ों का स्किन से रगड़ना, मसल्स की हल्की एक्टिविटी जैसे सामान्य संकेत कभी-कभी वाइब्रेशन जैसे महसूस हो सकते हैं।
क्या यह किसी बीमारी का संकेत है?
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी का कहना है कि कभी-कभार फोन वाइब्रेट होने जैसा महसूस होना आमतौर पर अपने आप में किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं है। इसे कई बार फैंटम वाइब्रेशन या फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को लगता है कि फोन बजा या वाइब्रेट हुआ, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता है।
हालांकि, अगर शरीर में लगातार अलग-अलग तरह की असामान्य संवेदनाएं महसूस हों, सुन्नपन, झनझनाहट, कमजोरी, दर्द या दूसरे न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दें, तो इसे केवल फोन से जुड़ा अनुभव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना सही है।

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साल 2025 में Computers in Human Behavior Reports में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार-
- उम्र फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम (PVS) का एक प्रमुख कारण है। इस रिसर्च में पाया गया कि 20 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम होने की संभावना 20 वर्ष से कम उम्र वालों की तुलना में कम होती है।
- हालांकि, अन्य स्टडीज में अलग-अलग रिजल्ट सामने आए हैं, जैसे इटली की एक बड़ी स्टडी में बड़े छात्रों में इसकी दर ज्यादा पाई गई, जबकि अमेरिका की एक अन्य रिसर्च में 20 से 69 साल के लोग ज्यादा प्रभावित दिखे।
- एक्सपर्ट्स का मानना है कि लंबे समय तक तकनीक के उपयोग और संपर्क में रहने के कारण दिमाग संवेदी संकेतों (सेंसरी सिग्नल्स) को गलत समझ सकता है, जिससे उम्र के साथ इस कंफ्यूजन की स्थिति पर असर पड़ता है।
बार-बार ऐसा महसूस हो तो क्या करें?
न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर भरत कुमार सुरिसेट्टी सलाह देते हैं कि सबसे पहले फोन को कुछ समय के लिए शरीर से दूर रखने की कोशिश करें।
- अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना और हर कुछ मिनट में फोन चेक करने की आदत कम करना भी मददगार हो सकता है।
- दिन में कुछ समय बिना फोन के बिताने से आपका फोकस लगातार फोन से जुड़े संकेतों पर टिके रहने से बच सकता है।
- अगर आपको बार-बार ऐसा लगता है कि फोन वाइब्रेट हो रहा है, तो तुरंत फोन चेक करने के बजाय कुछ सेकंड रुककर देखें कि वास्तव में कोई कॉल या नोटिफिकेशन आया भी है या नहीं।
- इससे बार-बार होने वाले चेकिंग बिहेवियर को कम करने में मदद मिल सकती है।
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निष्कर्ष
फोन वाइब्रेट होने का एहसास लेकिन वास्तव में कोई कॉल या नोटिफिकेशन न आना कई बार दिमाग की संवेदनाओं को समझने की प्रोसेस से जुड़ा हो सकता है। फोन की आदत, किसी कॉल या मैसेज की अपेक्षा और शरीर से मिलने वाले हल्के संकेत मिलकर ऐसा अनुभव पैदा कर सकते हैं। कभी-कभार ऐसा होना चिंता की बात नहीं है, लेकिन यदि इसके साथ लगातार असामान्य शारीरिक संवेदनाएं (Abnormal physical sensations) या अन्य लक्षण हों, तो न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर रहेगा।
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एक दिन में वयस्कों को मोबाइल 2 से 3 घंटे और बच्चों को 1 घंटे से ज्यादा नहीं देखना चाहिए।सोते समय मोबाइल फोन कहां रखना चाहिए?
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Sep 17, 2026 13:25 IST
Published By : Akanksha Tiwari
Reviewed By : Dr Bharath Kumar Surisetti