Science Behind Eye Color Change In Children: आंखों की पुतली (Pupil) के चारों ओर मौजूद रंगीन हिस्से को आइरिस (Iris) कहते हैं। बच्चे के जन्म के बाद भी आइरिस का विकास होता रहता है इसलिए समय के साथ उसकी आंखों का रंग बदल सकता है। आंखों का रंग मुख्य रूप से मेलेनिन (Melanin) नाम के प्राकृतिक पिगमेंट पर निर्भर करता है। यह पिगमेंट मेलानोसाइट्स नाम की कोशिकाओं द्वारा बनाया जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि बच्चों की आंखों का रंग क्यों और कब बदलता है? बेहतर जानकारी के लिए हमने Dr. Raman Boddula, Senior Consultant Endocrinologist At Yashoda Hospitals, Hyderabad से बात की।
ज्यादातर लोगों की आंखों का रंग बचपन से लेकर बुढ़ापे तक एक जैसा रहता है। हालांकि, जीवन के शुरुआती महीनों में शिशुओं की आंखें नीली-ग्रे दिखाई दे सकती हैं और आंखों में पिगमेंट बनने के साथ इनका रंग गहरा हो सकता है। American Academy Of Ophthalmology के मुताबिक, ज्यादातर शिशुओं की आंखों का रंग लगभग 9 महीने की उम्र तक तय हो जाता है और आगे चलकर वही बना रहता है। हालांकि, कुछ कारणों से किसी भी उम्र में आंखों का रंग बदल सकता है। अगर आपको अपनी किसी भी आंख के रंग में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
नवजात शिशुओं की आंखों का रंग किस उम्र तक बदल सकता है?
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- नवजात शिशुओं की आंखों का रंग जन्म के बाद कुछ महीनों तक बदल सकता है।
- ज्यादातर बच्चों में आंखों के रंग में बदलाव 3 से 9 महीने की उम्र के बीच देखने को मिलता है।
- आमतौर पर बच्चे की आंखों का रंग पहले जन्मदिन तक काफी हद तक तय हो जाता है।
- हालांकि, कुछ बच्चों में 2 से 3 साल की उम्र तक भी हल्का बदलाव हो सकता है।
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जेनेटिक्स तय करते हैं आंखों का रंग
आंखों का रंग तय करने में जेनेटिक्स की भी अहम भूमिका होती है। OCA2 और HERC2 दो ऐसे जीन हैं, जो आइरिस में बनने और जमा होने वाले मेलेनिन की मात्रा को प्रभावित करते हैं।
मेलेनिन की भूमिका: आंखों का रंग कैसे तय होता है?
नीली या ग्रे रंग की आंखें
जन्म के समय कई बच्चों के आइरिस में मेलेनिन की मात्रा कम होती है, इसलिए उनकी आंखें नीली, ग्रे या हल्के रंग की दिखाई देती हैं।
नीली आंखें
नीली आंखों में नीला पिगमेंट नहीं होता, बल्कि आइरिस में मेलेनिन कम होने के कारण रोशनी बिखरती है और आंखें नीली दिखाई देती हैं।
हरे या भूरे रंग की आंखें
रोशनी के संपर्क में आने के बाद धीरे-धीरे मेलेनिन का उत्पादन बढ़ सकता है। इसके कारण बच्चे की आंखों का रंग हरा, हेजल (भूरा-हरा) या भूरा हो सकता है।
आंखों का गहरा रंग
मेलेनिन की मात्रा ज्यादा होने पर आमतौर पर आंखों का रंग गहरा होता है, जबकि इसकी मात्रा कम होने पर आंखें हल्के रंग की होती हैं।
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क्या आंखों का रंग बदलना किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत है?
- आंख में चोट लगने, सूजन या कुछ अन्य बीमारियों के कारण आइरिस के रंग में बदलाव आ सकता है।
- इसके अलावा, कुछ दुर्लभ स्थितियों में एक आंख का रंग दूसरी आंख से अलग हो सकता है। इसे
- हेटेरोक्रोमिया (Heterochromia) कहते हैं। यह समस्या जन्म से भी हो सकती है और बाद में भी हो सकती है।
डॉक्टर की सलाह: बच्चे की आंखों के रंग में बदलाव को कब गंभीरता से लें?
- अगर बच्चे की आंखों का रंग अचानक बदल जाए,
- एक आंख का रंग दूसरी से अलग हो जाए
- आंखों में दर्द, रेडनेस और देखने में परेशानी हो, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
निष्कर्ष:
आंखों की पुतली के चारों ओर मौजूद रंगीन हिस्से को आइरिस कहते हैं। बच्चे के जन्म के बाद भी आइरिस का विकास होता रहता है इसलिए समय के साथ उसकी आंखों का रंग बदल सकता है। आंखों का रंग मुख्य रूप से मेलेनिन नाम के प्राकृतिक पिगमेंट पर निर्भर करता है। नवजात शिशुओं की आंखों का रंग जन्म के बाद कुछ महीनों तक बदल सकता है। ज्यादातर बच्चों में आंखों के रंग में बदलाव 3 से 9 महीने की उम्र के बीच देखने को मिलता है। बच्चे की आंखों का रंग पहले जन्मदिन तक काफी हद तक तय हो जाता है। कुछ बच्चों में 2 से 3 साल की उम्र तक भी हल्का बदलाव हो सकता है। जेनेटिक्स भी बच्चों की आंखों का रंग तय करते हैं। अगर बच्चे की आंखों का रंग अचानक बदल जाए या एक आंख का रंग दूसरी से अलग हो जाए, तो डॉक्टर से संपर्क करें।
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FAQ
क्या सभी बच्चों की आंखों का रंग जन्म के बाद बदलता है?
नहीं, सभी बच्चों की आंखों का रंग नहीं बदलता। कुछ बच्चों की आंखों का रंग जन्म के समय जैसा होता है, वैसा ही जीवनभर बना रहता है।क्या जन्म के समय नीली आंखों वाले बच्चे की आंखें भूरी हो सकती हैं?
हां, ऐसा संभव है। जन्म के समय कम मेलेनिन होने के कारण बच्चे की आंखें नीली दिखाई दे सकती हैं। कुछ महीनों बाद मेलेनिन की मात्रा बढ़ने पर आंखों का रंग हरा या भूरा हो सकता है।
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Oct 30, 2026 19:45 IST
Published By : Yashaswi Mathur
Reviewed By : Dr Raman Boddula
