Fri Sep 11, 2026 | 06:54 PM IST

Medically Reviewed by Dr Purendra Bhasin , Ophthalmologist

क्या प्रीमेच्योर बच्चों को ROP के कारण कम उम्र में लग सकता है चश्मा? डॉक्टर से जानें

जो बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं, उनमें आंखों से जुड़ी समस्या ROP होने का रिस्क काफी ज्यादा होता है। ऐसे बच्चों को कम उम्र में चश्मा लगने का रिस्क कितना होता है और पेरेंट्स को क्या करना चाहिए? ये सभी जानकारी विस्तार से इस लेख में दी गई है।

समय से पहले जन्मे बच्चों में सेहत से जुड़ी कुछ समस्याएं होने का रिस्क हो सकता है और इसमें आंखों से जुड़ी समस्या रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) भी शामिल है। यह बीमारी आमतौर पर प्रीमैच्योर और कम वजन वाले शिशुओं में हो सकती है और उनकी आंखों की रोशनी पर असर डाल सकती है। कई पेरेंट्स को लगता है कि ROP वाले बच्चों को कम उम्र में ही चश्मा लग सकता है। इस बारे में हमने Dr. Purendra Bhasin, Opthamologist, Founder & Director और Dr. Priyamvada Bhasin, Medical Director, Specialist Comprehensive Ophthalmology, Squint & Vitreo-Retinal Specialist in Ratan Jyoti Netralaya, Gwalior से बात की। उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में ऐसा संभव है, क्योंकि ROP का समय पर इलाज होने के बावजूद कुछ बच्चों में आगे चलकर नजर से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं, जिनके लिए चश्मे की जरूरत पड़ सकती है।

ROP के बाद बच्चों को चश्मे की जरूरत क्यों पड़ सकती है?

Dr. Priyamvada Bhasin कहती हैं, “रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी में आंख की रेटिना में मौजूद ब्लड वेसल्स की ग्रोथ सामान्य तरीके से नहीं हो पाती। इसकी वजह शिशु का समय से पहले जन्म लेना है ऐसे शिशुओं में रेटिना की ब्लड वेसल्स में असामान्य बदलाव हो सकते हैं। इस कारण कुछ बच्चों को भविष्य में रिफ्रैक्टिव एरर यानी नजर संबंधी दोष बन सकता है। इसमें मायोपिया (पास देखने की रोशनी कमजोर होना), हाइपरोपिया (दूर की चीजें देखने में मुश्किल होना) और एस्टिग्मैटिज्म शामिल हो सकते हैं। ऐसी कंडीशन में कम उम्र में ही चश्मा लगाने की सलाह दी जा सकती है, ताकि उनकी आंखों की रोशनी बेहतर बनी रहे।”

क्या हर ROP शिशु को चश्मा लगता है?

Dr. Priyamvada Bhasin के मुताबिक, “नहीं, ROP से प्रभावित हर बच्चे को चश्मा लगे, यह जरूरी नहीं है। चश्मा लगना इस बात पर निर्भर करता है कि ROP की गंभीरता कितनी थी, बीमारी का समय पर इलाज हुआ या नहीं और आंखों के विकास पर कितना असर पड़ा है। कुछ बच्चों की दृष्टि सामान्य रह सकती है, जबकि कुछ को विजन करेक्शन की जरूरत पड़ सकती है।”

early glasses in rop babies

पेरेंट्स को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

Dr. Priyamvada Bhasin ने पेरेंट्स को सलाह दी है कि कई पेरेंट्स ROP का इलाज हो जाने के बाद यह मान लेते हैं कि आंखें ठीक है और इसलिए रेगुलर चेकअप नहीं कराते। इलाज के बाद बच्चों की आई चेकअप बहुत जरूरी है। इसके अलावा, पेरेंट्स को इन खास बातों का भी ध्यान रखना चाहिए।

  1. रेगुलर चेकअप न होने से एम्ब्लायोपिया यानी लेजी आई हो सकता है। इसमें बच्चे की एक आंख से देखने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
  2. जिन बच्चों को ROP था, उनकी रेगुलर आई स्क्रीनिंग कराना जरूरी है।
  3. बच्चे की देखने की क्षमता में किसी भी बदलाव पर नजर रखें।
  4. चश्मे की सलाह मिलने पर उसे टालें नहीं।
  5. आंखों की जांच को बच्चे के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा मानें।

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निष्कर्ष
Dr. Priyamvada Bhasin कहती हैं कि आंखों की बीमारी ROP का असर सिर्फ जन्म के समय ही नहीं रहता, बल्कि इलाज के बाद भी बच्चों की आंखों का चेकअप बहुत जरूरी है। कई मामलों में कम उम्र के बच्चों को चश्मे की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, हर बच्चे में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन रेगुलर आई चेकअप से बच्चों की आंखों से जुड़ी समस्याओं का इलाज समय पर हो सकता है।

FAQ

  • प्रीमैच्योरिटी और ROP चश्मा लगने का कारण क्यों बनते हैं?

    समय से पहले जन्म लेने के कारण बच्चे की आंख के गोलक और लेंस का प्राकृतिक विकास अधूरा या असमान रह जाता है। इसके अलावा, आरओपी के कारण आंख के पर्दे और अंदरूनी बनावट में जो बदलाव आते हैं, उनकी वजह से रोशनी पर्दे पर सही जगह फोकस नहीं हो पाती और चश्मे की जरूरत पड़ती है।
  • आरओपी से ठीक हुए बच्चों में चश्मे का कौन सा नंबर सबसे आम है?

    ऐसे बच्चों में मायोपिया यानी दूर का धुंधला दिखने की समस्या सबसे ज्यादा देखी जाती है। इसे 'मायोपिया ऑफ प्रीमैच्योरिटी' भी कहते हैं। कई मामलों में बच्चों को बहुत हाई माइनस नंबर का चश्मा लगता है। इसके अलावा एस्टिगमैटिज्म का रिस्क भी रहता है।

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Aneesh Rawat

Aneesh Rawat

Chief Sub Editor

अनीश रावत को हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 16+ साल का अनुभव है। फिलहाल जागरण न्यू मीडिया के Onlymyhealth में चीफ सब एडिटर हैं। महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, मेडिटेशन और योग पर Research based, doctor verified और SEO फ्रेंडली लेख लिखने में विशेषज्ञ हैं। न्यूज 24, ऑल इंडिया रेडियो और ThinkRight मेडिटेशन ऐप जैसे भरोसेमंद platforms पर काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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