समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों को सेहत से जुड़ी बीमारियां होने का रिस्क बढ़ सकता है। इसमें आंखों से जुड़ी समस्या भी शामिल है। प्रीमैच्योर बच्चों की आंखों से जुड़ी समस्या को रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) कहा जाता है। यह बीमारी आमतौर पर कम वजन या ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने वाले शिशुओं में देखी जा सकती है। अगर इस बीमारी का समय पर इलाज न हो, तो शिशु के आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है। इस बारे में जानने के लिए हमने Dr. Purendra Bhasin, Opthamologist, Founder & Director, Ratan Jyoti Netralaya, Gwalior से बात की। उन्होंने बताया कि ROP में आंख के पीछे मौजूद रेटिना की ब्लड वेसल्स का विकास असामान्य तरीके से होने लगता है।
प्रिमैच्योर शिशुओं को रैटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) क्यों होता है?
Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “रेटिना आंख की सबसे सेंसेटिव परत होती है और प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में रेटिना की ब्लड वेसल्स पूरी तरह से बनती है। जब किसी शिशु का जन्म समय से पहले हो जाता है, तो रेटिना की ब्लड वेसल्स पूरी तरह से नहीं बन पाती। जन्म के बाद नई ब्लड वेसल्स अनियमित और कमजोर रूप से बनने लगती है। इस वजह से रेटिना पर खिंचाव पड़ सकता है और गंभीर मामलों में ब्लीडिंग भी हो सकती है। ऐसे में अगर समय पर इलाज न हो, तो शिशु की आंखों को स्थायी नुकसान भी हो सकता है।”
रैटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी का रिस्क किन शिशुओं को रहता है?
Dr. Purendra Bhasin के मुताबिक, “समय से पहले जन्मे शिशुओं को सबसे ज्यादा ROP का रिस्क रहता है। इसके अलावा, जिन शिशुओं का जन्म कम वजन के साथ हुआ है, NICU में लंबे समय तक भर्ती शिशु, ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत वाले शिशु और जिन बच्चों को जन्म के साथ ही गंभीर समस्याएं होती है। हालांकि, नवजात को ऑक्सीजन थेरेपी जरूरी होती है, लेकिन कुछ मामलों में ROP होने का रिस्क हो सकता है।”

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ROP की स्क्रीनिंग क्यों जरूरी है?
Dr. Purendra Bhasin का कहना है कि ROP की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआत में इस बीमारी का पता ही नहीं चलता और इस वजह से पैरेंट्स को शिशु की आंखों में होने वाली बीमारी काफी देर से पता चलती है। इसलिए प्रीमैच्योर और कम वजन वाले बच्चों की आंखों की स्क्रीनिंग कराना बहुत जरूरी है। स्क्रीनिंग में शिशु के रेटिना की जांच होती है और चेक किया जाता है कि उसकी ब्लड वेसल्स सामान्य है या नहीं।
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निष्कर्ष
Dr. Purendra Bhasin ने बताया कि अगर शिशु का जन्म समय से पहले या वजन कम है, तो डॉक्टर के सुझाव पर आंखों की जांच जरूर कराए। रेगुलर फॉलो-अप और समय पर स्क्रीनिंग कराने से ROP की पहचान की जा सकती है और समय पर इलाज किया जा सकता है।
FAQ
क्या एनआईसीयू (NICU) में दी जाने वाली ऑक्सीजन भी इसका एक कारण है?
समय से पहले जन्मे कमजोर बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते, इसलिए उन्हें बचाने के लिए हाई-फ्लो ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। यह जीवन रक्षक तो है, लेकिन ऑक्सीजन के स्तर में अचानक बदलाव होने से आंख की नसों का विकास गड़बड़ा जाता है और आरओपी ट्रिगर हो सकता है।माता-पिता बाहर से देखकर बच्चे की आंख में ROP को कैसे पहचान सकते हैं?
बाहर से देखकर इसे पहचानना नामुमकिन है। शुरुआती चरणों में आरओपी के कोई बाहरी लक्षण, आंख में लालपन या दर्द नहीं होता। बच्चा सामान्य दिखता है। जब बीमारी अंतिम चरण में पहुंचती है, तब आंख की पुतली के अंदर सफेद धब्बा दिख सकता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
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Jun 18, 2026 17:24 IST
Modified By : Aneesh Rawat Jun 18, 2026 17:24 IST
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Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Purendra Bhasin