आजकल समय से पहले जन्मे शिशुओं (प्री-मैच्योर) को जन्म लेते ही सांस लेने, शरीर का तापमान बनाए रखने या इंफेक्शन से लड़ने में दिक्कत से बचाने के लिए तुरंत NICU (Neonatal Intensive Care Unit) में भर्ती किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब दुनिया के अस्पतालों ने NICU जैसी सुविधा अपनाने से साफ इंकार कर दिया था।
ऐसे स्थिति में वैज्ञानिक ने भी एक अजीबोगरीब तरीका निकाला था, जिससे समय से पहले जन्मे शिशुओं का इलाज किया जा सके। NICU के अविष्कार से लेकर अस्पतालों के अपनाने तक की कहानी काफी दिलचस्प है, जिसे जानकर आपको बहुत हैरानी होगी।
फ्रांस में युद्ध के बाद नवजात शिशुओं की देखभाल
NICU की कहानी 1870-71 में फ्रांको-प्रशियन युद्ध के बाद शुरू हुई थी। इस युद्ध के बाद पूरे फ्रांस में अकाल पड़ गया और लोगों की बड़ी संख्या में मौत हो गई और ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती जन्म लेने वाले शिशुओं को जीवित रखने की थी। इसी दौरान फ्रांसीसी गाइनोकलॉजिस्ट डॉ. एटियेन स्टेफेन टार्नियर का चिड़ियाघर के दौरे ने शिशुओं को जीवित रखने की दिशा ही बदल दी।
मुर्गियों के अंडों से मिला इंक्यूबेटर का आइडिया
डॉ. टार्नियर पेरिस के चिड़ियाघर में घूम रहे थे और तब उन्होंने देखा कि समय से पहले निकले चूजों को गर्म रखने के लिए खासतौर पर गर्म बॉक्स यानी पोल्ट्री इंक्यूबेटरका इस्तेमाल किया जा रहा है। यह देखकर उनके दिमाग में आया कि कुछ ऐसी ही तकनीक से समय से पहले जन्मे शिशुओं को क्यों नहीं रखा जा सकता।
बस दिमाग में यह आइडिया लेकर उन्होंने लकड़ी का एक खास बॉक्स तैयार कराया, जिसमें कांच का ढक्कन और गर्म पानी की मदद से तापमान को नियंत्रित रखा जाता था। यह दुनिया के पहला बेबी इंक्यूबेटर था, जिसका इस्तेमाल 1880 के दशक में पेरिस के L'Hôpital Maternité में किया गया।
इंक्यूबेटर को अस्पतालों ने मानने से इंकार किया
डॉ. टार्नियर के साथ काम करने वाले डॉ. पियरे बुडिन ने बेबी इंक्यूबेटर में कई बदलाव किए। उन्होंने नवजात शिशुओं की देखभाल पर कई रिसर्च प्रकाशित किए और बताया कि सही तापमान, ब्रेस्टफीड और इंफेक्शन से बचाव के जरिए समय से पहले जन्मे बच्चों की मृत्यु दर को काफी कम किया जा सकता है।
उन्होंने इंक्यूबेटर में कई बदलाव किए, लेकिन उस दौर की मेडिकल कम्युनिटी ने इस पर भरोसा ही नहीं किया। कई अस्पतालों को तो लगता था कि यह तकनीक बहुत महंगी है, तो कुछ अस्पतालों को लगा कि यह मेडिकल सेक्टर का हिस्सा नहीं बन सकता। जब किसी भी अस्पताल ने इंक्यूबेटर को नहीं लिया, तो उसका नतीजा यह हुआ कि हजारों प्री-मैच्योर शिशुओं को इलाज नहीं मिला।
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Image Credit:nicuawareness.org
मेले का लिया गया सहारा
इसी दौरान डॉ. पियरे बुडिन ने अपने सहयोगी डॉ. मार्टिन कूनी की मदद लेने का फैसला लिया। डॉ. मार्टिन कूनी ने 1896 में बर्लिन की विश्व प्रदर्शनी में इंक्यूबेटर के साथ प्री-मैच्योर शिशुओं को प्रदर्शित किया। शुरुआत में लोगों को यह अजीब लगा, लेकिन जब इन बच्चों की हालत में सुधार दिखा, तो लोगों का नजरिया बदलने लगा। इसके बाद डॉ. मार्टिन अमेरिका के न्यूयार्क के प्रसिद्ध कोनी आइलैंड गए और वहां उन्होंने ‘इंक्यूबेटर बेबी शो’ शुरू किया।
इस शो की खास बात यह थी कि लोग 25 सेंट का टिकट खरीदकर इन छोटे-छोटे बच्चों को देखने आते थे। इस टिकट से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल डॉक्टर, नर्स, दवाओं और इंक्यूबेटर चलाने में किया जाता था। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि जिन शिशुओं के बचने की उम्मीद लगभग खत्म मानी जा रही थी, उनमें से काफी शिशु स्वस्थ होकर अपने घर लौट गए।
इस शो ने इंक्यूबेटर को दुनिया में पहचान दी और लोगों को इस तकनीक पर विश्वास होने लगा कि इससे प्री-मैच्योर शिशुओं को बचाया जा सकता है।
इंक्यूबेटर को आधुनिक बनाने की पहल हुई
20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जूलियस हेस ने एक ऐसा इंक्यूबेटर विकसित किया, जिसमें न सिर्फ गर्माहट थी, बल्कि नमी और ऑक्सीजन की सुविधा भी जोड़ी गई। इससे कमजोर फेफड़ों वाले नवजात बच्चों को सांस लेने में मदद मिलने लगी।
इसके बाद इंक्यूबेटर के डिजाइन में भी बदलाव किया गया। अब लकड़ी की जगह पारदर्शी प्लास्टिक का इस्तेमाल होने लगा, जिससे डॉक्टर और नर्स बिना बच्चे को बाहर निकाले उसकी निगरानी कर सकते थे। हालांकि, यह बदलाव शुरुआत में छोटा लग रहा था, लेकिन यह नवजात शिशुओं में बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ।
पहली बार NICU बनने की कहानी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मेडिकल क्षेत्र में तेजी से कई बदलाव हुए। इस समय डॉक्टरों ने महसूस किया कि अगर प्री-मैच्योर शिशु को नियंत्रित तापमान, पर्याप्त ऑक्सीजन और विशेष निगरानी मिले, तो उनकी जान बचाई जा सकती है। इसके बाद यहीं से अस्पतालों में स्पेशल केयर बेबी यूनिट बनने लगी और समय के साथ इन्होंने मॉडर्न NICU का रूप ले लिया। इन सुविधाओं से कई लाखों बच्चों को जीवनदान मिला।
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NICU का आधुनिकीकरण हुआ
हालांकि, शुरुआती दौर में NICU का पूरा फोकस मशीनों और इलाज पर था। ऐसे में पेरेंट्स को मिलने के लिए बहुत ही कम समय मिलता था, लेकिन 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि सिर्फ दवाएं ही नहीं, बल्कि पेरेंट्स का स्पर्श भी शिशु की ग्रोथ के लिए जरूरी है।
इसी तर्क को देखते हुए Newborn Individualized Developmental Care and Assessment Program (NIDCAP) जैसी नई तकनीके आई, जिनमें हर शिशु की जरूरत के अनुसार देखभाल पर जोर दिया गया। धीरे-धीरे अस्पतालों ने पेरेंट्स खासतौर पर पिता को भी NICU में ज्यादा समय बिताने की परमिशन देना शुरू कर दिया।
निष्कर्ष
पिछले कई दशकों में NICU तकनीक में कई बदलाव आए और अब भी NICU को और बेहतर करने के लिए वैज्ञानिक लगातार प्रयोग कर रहे हैं। मॉडर्न NICU के जरिए अब अस्पतालों में 23 या 24 हफ्ते में जन्मे शिशुओं का भी सफल इलाज हो जाता है। अब NICU में वेंटिलेटर, सर्फैक्टेंट थेरेपी, न्यूट्रिशन, इंफेक्शन को कंट्रोल करने की तकनीक और लगातार मॉनिटरिंग से कई प्री-मैच्योर शिशुओं की जान बचाई जा रही है।
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Aug 03, 2026 19:47 IST
Modified By : Aneesh Rawat Aug 03, 2026 19:47 IST
Published By : Aneesh Rawat