Sat Oct 3, 2026 | 04:56 AM IST

Medically Reviewed by Dr Purendra Bhasin , Ophthalmologist

ग्लूकोमा का खतरा इन 7 तरह के लोगों को होता है ज्यादा, डॉक्टर से जानें हाई रिस्क ग्रुप

ग्लूकोमा यानी काला मोतियाबिंद के लक्षण काफी देर बाद पता चलते हैं। इस वजह से लोगों को ग्लूकोमा होने का पता ही नहीं चलता। ग्लूकोमा होने के रिस्क से बचने के लिए इन 7 तरह के लोगों को खास ध्यान रखना चाहिए और रेगुलर आंखों का टेस्ट कराते रहना चाहिए।
ग्लूकोमा का खतरा इन 7 तरह के लोगों को होता है ज्यादा, डॉक्टर से जानें हाई रिस्क ग्रुपग्लूकोमा का खतरा इन 7 तरह के लोगों को होता है ज्यादा, डॉक्टर से जानें हाई रिस्क ग्रुप

ग्लूकोमा यानी काला मोतियाबिंद के कारण लोगों की आंखों की रोशनी जा सकती है। हालांकि, शुरुआत में लोगों को कोई खास परेशानी नहीं होती, क्योंकि इससे जुड़े लक्षण ज्यादा महसूस नहीं होते। ग्लूकोमा में मरीज के ऑप्टिक नर्व को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचने लगता है और जब आंखों में बदलाव महसूस होता है, तब तक आंखों को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है। इसलिए जिन लोगों को ग्लूकोमा होने का रिस्क (risk factor of glaucoma) हो सकता है, उन्हें खास ध्यान रखना चाहिए। इस बारे में हमने Dr. Purendra Bhasin, Opthamologist, Founder & Director, Ratan Jyoti Netralaya, Gwalior से बात की।

ग्लूकोमा का खतरा किन लोगों को ज्यादा होता है?

Dr. Purendra Bhasin कहते हैं कि ग्लूकोमा से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बीमारी की वजह से आंखों की जितनी रोशनी जा चुकी है, उसे वापस लाना तो संभव नहीं होता। हालांकि, बीमारी का समय पर पता चल जाए और सही इलाज शुरू हो जाए तो आगे होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है। इसलिए जिन लोगों को ग्लूकोमा का खतरा होता है, उन्हें खास सावधानी बरतनी चाहिए।

1. उम्र बढ़ने पर ग्लूकोमा का रिस्क

Dr. Purendra Bhasin के अनुसार, ग्लूकोमा के सबसे रिस्क फैक्टर बढ़ती उम्र है। इसलिए खासतौर पर 40 साल की उम्र के बाद रेगुलर आंखों के चेकअप को लेकर ज्यादा सजग रहना चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ ग्लूकोमा का रिस्क बढ़ता जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि कम उम्र के लोगों को ग्लूकोमा नहीं हो सकता। कुछ लोगों में कम उम्र में भी यह बीमारी हो सकती है, अगर ग्लूकोमा की फैमिली हिस्ट्री हो।

2. ग्लूकोमा की फैमिली हिस्ट्री

Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “अगर पेरेंट्स या परिवार के किसी करीबी सदस्य को ग्लूकोमा है, तो रेगुलर आंखों की जांच कराना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए परिवार में किसी को ग्लूकोमा होने की जानकारी है, तो आंखों की जांच को नहीं टालना चाहिए।”
Ophthalmology Glaucoma के मुताबिक, प्राइमरी ग्लूकोमा के मरीजों के 30% से ज्यादा रिश्तेदारों में या तो ग्लूकोमा होता है य वे ग्लूकोमा का रिस्क रहा है। इसमें पेरेंट्स से होने वाला ग्लूकोमा 31.6% था, तो भाई-बहनों से 16.2% ग्लूकोमा होने का खतरा बढ़ सकता है।

3. डायबिटीज

Dr. Purendra Bhasin ने कहा, “डायबिटीज का असर सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक अनियंत्रित हाई ब्लड शुगर आंखों के साथ-साथ शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित कर सकती है। डायबिटीज के मरीजों को ग्लूकोमा होना का रिस्क काफी ज्यादा रहता है। इसलिए डायबिटीज के मरीजों को आंखों का रेगुलर चेकअप कराते रहना चाहिए, ताकि बीमारी का समय पर पता चल सके। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि डायबिटीज हर व्यक्ति को ग्लूकोमा होगा, लेकिन सजगता जरूरी है।”

European Journal of Cardiovascular Medicine में प्रकाशित जर्नल के अनुसार, डायबिटीज के कारण सेंट्रल कॉर्निया की मोटाई में बढ़ोतरी से इंट्राऑकुलर प्रेशर बढ़ सकता है। इस वजह से डायबिटीज को प्राइमरी ओपन एंगल ग्लूकोमा का कारण माना जाता है। डायबिटीज और बढ़ती उम्र दो ग्लूकोमा के महत्वपूर्ण रिस्क फैक्टर्स हो सकते हैं।

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4. मायोपिया या हाइपरोपिया

Dr. Purendra Bhasin ने बताया कि जिन लोगों को हाई मायोपिया यानी जिन लोगों की नजदीक की रोशनी बहुत ज्यादा कमजोर होती है, उनमें ग्लूकोमा होने का रिस्क बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, जिन लोगों को दूर की चीजें ज्यादा साफ दिखाई देती है और पास की चीजें देखने में बहुत परेशानी होती है, उन्हें कुछ खास कंडीशन में ग्लूकोमा का रिस्क बढ़ सकता है। इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ चश्मे का नंबर देखकर ग्लूकोमा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। आंखों की बनावट और ऑप्टिक नर्व की स्थिति भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

5. लंबे समय तक स्टेरॉयड लेना

American Academy of Ophthalmology के मुताबिक, स्टेरॉयड के इस्तेमाल से ग्लूकोमा होने का रिस्क हो सकता है। इसमें सबसे आम कारण स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स का लंबे समय तक इस्तेमाल करना है। इससे आंखों में दबाव बढ़ जाता है। इससे ग्लूकोमा होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए अगर संभव हो, तो स्टेरॉयड की दवाएं बंद करनी चाहिए। इसके अलावा, आंखों के दबाव को कम करने के लिए लेजर थेरेपी भी की जा सकती है।

6. आंख में चोट या सर्जरी होना

Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “अगर किसी को आंख में चोट लगी है या फिर पहले कभी चोट लगी थी, तो भी आंखों की चोट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह अगर आंख की सर्जरी हुई है, तो इससे होने वाली अन्य समस्याओं के कारण ग्लूकोमा का रिस्क बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी तरह की आंख की चोट या सर्जरी के बाद भी डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।”

7. आंखों में बार-बार सूजन होना

Dr. Purendra Bhasin बताते हैं कि आंख के अंदर होने वाली सूजन और कुछ मामलों में सेकेंडरी ग्लूकोमा से जुड़ी हो सकती है। सूजन के साथ-साथ इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाली स्टेरॉयड दवाएं भी आंखों के प्रेशर को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए अगर आंखों में बार-बार लालिमा, दर्द, रोशनी से परेशानी या सूजन की समस्या हो, तो इसे नॉर्मल समझकर छोड़ना ठीक नहीं है।

डॉक्टर की सलाह

Dr. Purendra Bhasin कहते हैं कि अक्सर लोग ग्लूकोमा को रोकने से जुड़े सवाल करते हैं, लेकिन इसे रोकना संभव नहीं है। अगर समय पर ग्लूकोमा की पहचान हो जाए, तो इसकी गति को धीमा किया जा सकता है। इसलिए बीमारी के शुरुआती स्टेज में इसका पता लगना बेहद जरूरी है। इसके लिए लोगों को रेगुलर आंखों की जांच और ऑप्टिक नर्व में होने वाले बदलावों को चेक कराते रहना चाहिए।

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निष्कर्ष
Dr. Purendra Bhasin लोगों को सलाह देते हैं कि उम्र बढ़ने, धुंधला दिखाई देने या आंखों में किसी भी तरह का बदलाव महसूस होने पर आंखों की जांच तुरंत करानी चाहिए। अगर किसी की फैमिली में ग्लूकोमा की हिस्ट्री है या स्टेरॉयड दवाएं ली जा रही है, तो ग्लूकोमा का रिस्क बढ़ सकता है।

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FAQ

  • क्या माइग्रेन या पतली कॉर्निया वाले लोगों को ग्लूकोमा का खतरा ज्यादा रहता है?

    हां, माइग्रेन के मरीजों में आंखों की नसों तक ब्लड फ्लो में समय-समय पर रुकावट हो सकती है। इससे ऑप्टिक नर्व डैमेज का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, पतली कॉर्निया वाले लोगों की नसों पर आई प्रेशर का असर ज्यादा आसानी से पड़ता है।
  • ग्लूकोमा के मरीजों को दैनिक जीवन में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

    मरीज को एक सांस में एक साथ बहुत सारा पानी नहीं पीना चाहिए, अनुलोम-विलोम जैसे हल्के प्राणायाम करने चाहिए, लेकिन शीर्षासन करने से बचें। साथ ही डॉक्टर की सलाह पर रोजाना समय पर आई-ड्रॉप्स डालें।

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Aneesh Rawat

Health & Lifestyle Journalist

अनीश रावत पिछले 16 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से 3 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में चीफ सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। यहां वह महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, योग और मेडिटेशन जैसे विषयों पर शोध आधारित लेख लिखते हैं। उनका फोकस स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को डेटा, रिसर्च और विशेषज्ञों की राय के आधार पर पाठकों तक पहुंचाना है। जिन लेखों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। OnlyMyHealth से पहले वह News 24, All India Radio और ThinkRight Meditation App के साथ काम कर चुके हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Aug 18, 2026 19:09 IST

    Published By : Aneesh Rawat
    Reviewed By : Dr Purendra Bhasin