ग्लूकोमा (काला मोतियाबिंद) को हमेशा बुजर्गों की बीमारी माना जाता है, लेकिन काला मोतियाबिंद बच्चों को भी हो सकता है। बच्चों में ग्लूकोमा को पैडियाट्रिक ग्लूकोमा (Pediatric Glaucoma) कहा जाता है। अगर किसी शिशु को जन्म के समय या शुरुआती उम्र में हो जाए, तो इसे प्राइमरी कनजेनिटल ग्लूकोमा कहा जाता है। बच्चों को ग्लूकोमा होने के लक्षणों की पहचान करना बहुत जरूरी है। बच्चों के ग्लूकोमा के लक्षणों को जानने के लिए हमने Dr. Purendra Bhasin, Opthamologist, Founder & Director, Ratan Jyoti Netralaya, Gwalior से बात की।
उन्होंने बताया कि आंखों के अंदर एक तरल पदार्थ (एक्वियस ह्यूमर) हमेशा बनता रहता है। जब यह बाहर नहीं निकल पाता, तो आंखों में दबाव बढ़ सकता है और इससे आंखों को नुकसान पहुंच सकता है।
बच्चों में ग्लूकोमा की पहचान के 5 लक्षण
Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “आमतौर पर छोटे बच्चों को समझ नहीं आता कि उन्हें धुंधला दिखाई दे रहा है, रोशनी चुभ रही है या आंख में दर्द हो रहा है। इसलिए पेरेंट्स को बच्चों की आंखों में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। अगर बच्चे की आंखों में कुछ भी बदलाव दिख रहा है, तो इग्नोर नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे बच्चे की आंखों पर असर पड़ सकता है।”
आंखों से लगातार पानी आना
Dr. Purendra Bhasin का कहना है, “अगर किसी नवजात को जन्म से ग्लूकोमा की समस्या है, तो उसकी आंखों से लगातार पानी आता रहता है। खास बात यह है कि यह पानी जरूरी नहीं है कि किसी पस या डिस्चार्ज के साथ बाहर निकले। इसके साथ अगर बच्चा तेज रोशनी में आंखें बंद करने लगे या रोशनी में असहज महसूस करे, तो तुरंत शिशु को डॉक्टर को दिखाएं।”
American Association for Pediatric Ophthalmology and Strabismus के अनुसार, प्राइमरी जन्मजात ग्लूकोमा में शिशु को तेज रोशनी में दर्द या असहजता महसूस हो सकत है। इसलिए अगर शिशु रोशनी में आंखों में दर्द महसूस करता है, तो डॉक्टर से आंखों की चेकअप जरूर करानी चाहिए।
बच्चे की आंखें सामान्य से बड़ी दिखना
Dr. Purendra Bhasin ने कहा, “जब आंखों के अंदर प्रेशर पड़ता है, तो आंखों की संरचना में बदलाव हो सकता है। इस वजह से कई बार बच्चों की आंखें सामान्य से ज्यादा बड़ी दिखाई दे सकती है। इस कंडीशन को बुफ्थैल्मोस (Buphthalmos) कहा जाता है। अगर पेरेंट्स को लगे कि बच्चे की एक आंख दूसरी आंख से बड़ी है या दोनों ही आंखें उम्र के हिसाब से बड़ी दिखाई दे रही हैं, तो आंखों का चेकअप जरूर कराएं।”

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आंखों का सफेद हिस्सा धुंधला दिखना
Dr. Purendra Bhasin ने बताया कि अगर बच्चे का कॉर्निया यानी आंख के सामने का पारदर्शी हिस्सा धुंधला, सफेद या हल्का नीला दिखाई दे, तो भी यह ग्लूकोमा का कारण हो सकता है। इसलिए आंखों में सफेद भाग कुछ ऐसा दिखे, तो इसे नजरअंदाज न करें।
बड़े बच्चों में सिरदर्द और धुंधला दिखना
Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “टीनएजर्स में भी ग्लूकोमा के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। अगर उसे बार-हार सिरदर्द, आंखों में दर्द, धुंधला दिखाई दे या पढ़ने में परेशानी हो, चिंता की बात हो सकती है। कुछ बच्चों में चश्मे के नंबर में लगातार बदलाव भी देखने को मिल सकता है। हालांकि, सिरदर्द या चश्मे का नंबर बदलना अपने आप में ग्लूकोमा का लक्षण नहीं है, लेकिन अगर इनके साथ देखने में लगातार परेशानी या दूसरे असामान्य बदलाव भी हों, तो आंखों की जांच जरूरी है।”
बच्चे की आंखों का बार-बार मलना
Dr. Purendra Bhasin ने बताया कि ग्लूकोमा के लक्षण हर बच्चे में एक जैसे नहीं होते, लेकिन अगर बच्चे का बार-बार अपनी आंखें मलना, आंखों में जलन या असहज महससू करना, किसी चीज पर ठीक से फोकस न करना और देखने में परेशानी होने पर चिड़चिड़ा होने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि, ये लक्षण सिर्फ ग्लूकोमा के नहीं होते, बल्कि कई बार दूसरी समस्याएं भी हो सकते हैं, लेकिन सही कारण जानना बहुत जरूरी होता है, ताकि आंखों का इलाज समय पर हो सके।
ग्लूकोमा का खतरा किन बच्चों को ज्यादा हो सकता है?
Dr. Purendra Bhasin ने कहा कि बच्चों में ग्लूकोमा का खतरा जन्मजात, जेनेटिक कारण, आंखों में चोट, सूजन या कुछ दवाओं का इस्तेमाल करने से हो सकता है। अगर परिवार में ग्लूकोमा की हिस्ट्री है, तो डॉक्टर को जरूर बताएं। समय से पहले जन्म लेने वाले कुछ शिशुओं को ग्लूकोमा का रिस्क हो सकता है।
American Academy of Ophthalmology के मुताबिक, पीडियाट्रिक ग्लूकोमा बच्चों में अंधेपन के 5% मामलों के लिए जिम्मेदार है और दुनिया भर में तीन लाख से ज्यादा बच्चे इस बीमारी से प्रभावित हैं। अगर शिशु को जन्मजात ग्लूकोमा है, तो आमतौर पर शिशुओं की आंखें सामान्य से बड़ी होती है।
सेकेंडरी ग्लूकोमा में बच्चों को जन्म के बाद होने वाली समस्याओं जैसे चोट लगना या किसी ट्रॉमा के कारण हो सकता है। कई बार बच्चों में मोतियाबिंद की सर्जरी के बाद भी ग्लूकोमा हो सकता है।
भारत के हैदराबाद में 275 बच्चों पर किए गए अध्ययन में जन्मजात ग्लूकोमा के मामले ज्यादा देखने को मिले। स्टेरॉयड या चोट के कारण होने वाला ग्लूकोमा सेकेंडरी ग्लूकोमा के मुख्य कारण पाए गए।
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बच्चों में ग्लूकोमा की जांच कैसे होती है?
Dr. Purendra Bhasin के अनुसार, बच्चों में ग्लूकोमा की जांच सिर्फ आंखों का दबाव देखकर नहीं कर सकते। हमेशा बच्चे की उम्र और उसकी मेडिकल कंडीशन को देखते हुए चेकअप किया जाता सकता है। इसमें ये फैक्टर्स शामिल हैं।
- आंखों का दबाव
- कॉर्निया का आकार
- ऑप्टिक नर्व की जांच
- आंख के ड्रेनेज एंगल की जांच
- जरूरत पड़ने पर OCT
- आंख की लंबाई और संरचना की जांच
- बहुत छोटे बच्चों की Examination Under Anesthesia (EUA) की मदद से जांच की जा सकती है।
निष्कर्ष
Dr. Purendra Bhasin कहते हैं कि जिन बच्चों को जन्म से ग्लूकोमा होता है, उनकी सर्जरी की जाती है। कुछ बच्चों में गोनियोटॉमी और ट्रैबेकुलोटॉमी जैसी सर्जरी आंख के अंदर मौजूद तरल पदार्थ के बाहर निकलने का रास्ता बेहतर बनाने के लिए की जाती हैं। सबसे जरूरी है कि पेरेंट्स को बच्चों की आंखों से जुड़ी किसी भी समस्या को टालना नहीं चाहिए।
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FAQ
क्या बच्चों में ग्लूकोमा से आंखों की रोशनी जा सकती है?
अगर आंख के बढ़े हुए दबाव को लंबे समय तक नियंत्रित न किया जाए, तो ऑप्टिक नर्व और आंख की दूसरी संरचनाओं को स्थायी नुकसान हो सकता है। इससे दृष्टि कमजोर हो सकती है और गंभीर मामलों में बच्चों की आंखों की रोशनी भी जा सकती है।क्या आई-ड्रॉप्स से बच्चों का ग्लूकोमा पूरी तरह ठीक हो सकता है?
आई-ड्रॉप्स केवल अस्थाई रूप से आंख का दबाव कम करने का काम करती हैं। जन्मजात ग्लूकोमा को जड़ से ठीक करने और तरल पदार्थ के बहाव का रास्ता खोलने के लिए सर्जरी ही प्राथमिक और सबसे असरदार इलाज माना जाता है।
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Aug 11, 2026 15:49 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Purendra Bhasin