प्लेसेंटा के बारे में हम सभी जानते हैं। यह गर्भ में पल रहे शिशु को सभी तरह के पोषण और ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। इसे अस्थायी अंग भी कहा जाता है, क्योंकि डिलीवरी के तुरंत बाद यह गर्भाशय से बाहर निकाल दिया जाता है। बहरहाल, प्रेग्नेंसी के सफर में प्लेसेंटा का स्वस्थ होना जरूरी है। कुछ महिलाओं में एजिंग प्लेसेंटा की समस्या हो जाती है, जिससे प्रेग्नेंसी में दिक्कतें आ सकती हैं। आइए, वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता से जानते हैं कि क्या यह क्या है और ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है?
एजिंग प्लेसेंटा क्या है?
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Aging of the placenta के अनुसार, एजिंग प्लेसेंटा का मतलब होता है कि गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा यानी गर्भनाल का सामान्य से अधिक बूढ़ा होना। आमतौर पर डिलीवरी के समय प्लेसेंटा का बूढ़ा होना सामान्य होता है, क्योंकि इसकी वजह से प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार से आसानी से अलग हो पाता है और डिलीवरी सामान्य तरीके से हो जाती है। वहीं, अगर समय से पहले ही प्लेसेंटा बूढ़ा हो जाता है यानी सख्त या कमजोर हो जाता है, तो इससे शिशु के विकास में बाधा आ सकती है।
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एजिंग प्लेसेंटा की समस्या होने के कारण
धूम्रपान और नशीले पदार्थों का सेवन
प्रेग्नेंसी में धूम्रपान करना या नशीले पदार्थों का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इसे डाॅक्टर काफी ज्यादा खतरनाक और घातक मानते हैं। सिगरेट में मौजूद निकोटीन और अन्य नशीले पदार्थ रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ देते हैं, जिससे गर्भनाल पर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ जाता है, जिससे प्लेसेंटा की उम्र समय से पहले बढ़ जाती है। साल 2019 में जर्नल्स में प्रकाशित रिसर्च Oxidative Medicine And Cellular Longevity के अनुसार ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ने से गर्भनाल की उम्र भी तेजी से बढ़ रही होती है, जो कि सही नहीं है।
पुरानी बीमारियां
डॉ. शोभा गप्ता बताती हैं, जब महिलाएं लंबे समय से किसी तरह की मेडिकल कंडीशन, जैसे हाई ब्लड प्रेशर, प्री-एकलैम्प्सिया और जेस्टेशनल डायबिटीज का शिकार होती हैं, तो उनमें समय से पहले प्लेसेंटा कमजोर होने लगता है।
महिला की अधिक उम्र
जब महिलाएं 35 साल की उम्र के बाद कंसीव करती हैं, तो उनमें पहले से ही कई तरह की शारीरिक समस्याएं हो जाती हैं और रक्त वाहिकाओं तथा मेटाबॉलिज्म भी प्राकृतिक रूप से कमजोर हो जाता है। ऐसे में प्लेसेंटा की उम्र का प्रभावित होना भी स्वाभाविक होता है।
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प्री-एकलैम्प्सिया
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गर्भनाल का समय से पहले बूढ़ा होना शरीर में बढ़ते ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से संबंध रखता है। आपने देखा होगा कि जिन महिलाओं को प्रेग्नेंसी में बीपी की समस्या हो जाती है, उनकी नसें कमजोर हो जाती हैं। इसका बुरा प्रभाव प्लेसेंटा पर भी पड़ता है।
अन्य मेडिकल कंडीशन
अगर किसी महिला को डायबिटीज, ऑटो इम्यून डिजीज, मोटापा जैसी कोई समस्या है, तो उनमें भी एजिंग प्लेसेंटा की दिक्कत हो सकती है। जैसे डायबिटीज की बात करें, तो इस कंडीशन में ऑक्सडेटिव स्ट्रेस बढ़ जाता है। ऐसे में प्लेसेंटा की कार्यक्षमता प्रभावित हो जाती है।
तनाव का असर
American Journal Of Obstetrics & Gynecology Maternal-Fetal Medicine में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ। इससे पता चलता है कि जो महिलाएं अपनी गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में डिप्रेशन से पीड़ित थीं या जिनका डिप्रेशन पहली और दूसरी तिमाही दोनों में लगातार बना रहा, उनके प्लेसेंटा की उम्र सामान्य महिलाओं के मुकाबले औसतन 0.41 से 0.72 हफ्ते ज्यादा तेजी से बढ़ी। इसका मतलब स्पष्ट है कि जो महिलाएं प्रेग्नेंसी में अधिक तनाव में रहती हैं, उनके प्लेसेंटा की उम्र तेजी से बढ़ती है।
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एजिंग प्लेसेंटा का शिशु की सेहत पर असर
अगर किसी महिला को एजिंग प्लेसेंटा की समस्या हो जाती है यानी गर्भावस्था के दौरान उनकी गर्भनाल समय से पहले बूढ़ी हो जाती है, तो शिशु के स्वास्थ्य पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है, जैसे-
- पोषण और ऑक्सीजन की कमीः गर्भनाल का मुख्य काम शिशु तक जरूरी पोषक तत्व और ऑक्सीजन पहुंचाना है। जब यह समय से पहले बूढ़ी होने लगती है, तो इसके टिश्यूज सख्त और कमजोर हो जाते हैं, जिससे इसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। ऐसे में बच्चे तक जरूरी सप्लाई नहीं हो पाती है।
- शिशु के विकास में बाधाः जब बूढ़ी हो चुकी गर्भनाल के कारण शिशु को आवश्यक पोषक तत्व और ऑक्सीजन सप्लाई नहीं हो पाती है, तो ऐसे में शिशु का विकास सही तरह से नहीं हो पाता है या धीमा हो जाता है। नतीजतन, जन्म के समय शिशु असामान्य रूप से छोटा रह जाता है।
- मृत जन्म का जोखिमः अगर गर्भनाल सही तरह से काम नहीं करता है, जिसकी वजह से शिशु के शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। अगर मामला गंभीर हुआ तो शिशु की जान जोखिम में पड़ सकती है। यहां तक गर्भ में ही उसकी मृत्यु होने का खतरा भी बढ़ जाता है।
निष्कर्ष
प्लेसेंटा की उम्र का बढ़ना पूरी तरह सामान्य है। आमतौर पर 9वें महीने में प्लेसेंटा पूरी तरह बूढ़ा हो जाता है और डिलीवरी के समय यह गर्भाशय की दीवार को छोड़ देता है। इस तरह डिलीवरी पूरी तरह नॉर्मल हो जाती है। हालांकि, स्वास्थ्य समस्याएं, खराब जीवनशैली की आदतें और प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली मेडिकल कंडीशन्स भी प्लेसेंटा की उम्र को प्रभावित करती हैं। इसलिए, प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
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FAQ
प्लेसेंटा में कैल्सीफिकेशन क्या है?
प्लेसेंटा के बूढ़े होने की प्रक्रिया के दौरान उस पर कैल्शियम के कई छोटे-छोटे कण जमा होने लगते हैं, जिसे हम कैल्सीफिकेशन कहते हैं। इसी वजह से प्लेसेंटा के कुछ हिस्से कड़े और कमजोर हो जाते हैं, जिससे ब्लड फ्लो बाधित होता है।क्या फल या सप्लीमेंट की मदद से एजिंग प्लेसेंटा को रिवर्स किया जा सकता है?
नहीं, अगर एक बार प्लेसेंटा के टिश्यूज सख्त या कैल्सीफाइड हो जाएं, तो उन्हें इसे दोबारा नॉर्मल नहीं किया जा सकता है।
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Jul 16, 2026 14:35 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Shobha Gupta